आरती श्री रामायण जी की — अर्थ सहित

यह आरती स्वयं रामायण ग्रंथ की है, यानी श्रीराम की कथा की। इसमें बताया गया है कि ब्रह्मा, नारद, वाल्मीकि, शिव-पार्वती और कागभुसुंडि जैसे सभी इस कथा को गाते हैं। अखंड रामायण या मानस पाठ पूरा होने पर, और सुंदरकांड के बाद भी, इसे भक्ति से गाया जाता है। अंतिम पंक्ति में तुलसीदास जी का नाम आता है।

5 पद · लगभग 3 मिनट

आरती श्री रामायण जी की। कीरति कलित ललित सिय पी की॥

गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद॥ सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥

गावत बेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस॥ मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस संमत सबही की॥

गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी॥ ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड़ के ही की॥

कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥ दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रामायण जी की आरती कब गाई जाती है?

रामचरितमानस का पाठ, अखंड रामायण या सुंदरकांड पूरा होने पर, श्रीराम की आरती के साथ यह आरती गाई जाती है।

यह आरती किसने लिखी?

आरती की अंतिम पंक्ति में तुलसीदास जी का नाम है, इसलिए परंपरा में इसे उन्हीं की रचना माना जाता है। यह गीता प्रेस के मानस संस्करणों में छपी मिलती है।

'घटसंभव' कौन हैं?

घटसंभव यानी घड़े से जन्मे — यह अगस्त्य मुनि का नाम है, जिन्होंने भगवान शिव से रामकथा सुनी थी।

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