देवी कवच (दुर्गा कवच) — अर्थ सहित
देवी कवच, जिसे दुर्गा कवच या चंडी कवच भी कहते हैं, दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले पढ़ा जाता है। इसमें ब्रह्मा जी मार्कंडेय ऋषि को नवदुर्गा के नाम बताते हैं और शरीर के हर अंग व हर दिशा की रक्षा के लिए देवी के अलग-अलग रूपों से प्रार्थना करते हैं। नवरात्रि में इसका पाठ विशेष रूप से होता है।
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः। ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्। यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥
ब्रह्मोवाच अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्। देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना। ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना। लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना। ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः। नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः। शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी। ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना। जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता। शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी। त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका। अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका। घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला। ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी। स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च। नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी। हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा। पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥३०॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥३१॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी। पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी। रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती। अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा। ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा। अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्। वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी। यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके। पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा। राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः। कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्। परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः। त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्। यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः। जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥४७॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः। स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले। भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥४९॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा। अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥५०॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः। ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥५१॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले। जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्। प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥५६॥ ॐ॥ इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।
अर्थ
मंत्र
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः। ॐ नमश्चण्डिकायै॥
यह विनियोग है: इस चंडी कवच के ऋषि ब्रह्मा, छंद अनुष्टुप् और देवता चामुंडा हैं। जगदंबा की प्रसन्नता के लिए, दुर्गा सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसका जप किया जाता है। चंडिका देवी को नमस्कार।
पद 1
मार्कण्डेय उवाच ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्। यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥
मार्कंडेय ऋषि बोले — हे पितामह ब्रह्मा जी, संसार में जो परम गुप्त साधन मनुष्यों की हर प्रकार से रक्षा करता है और जो आपने अब तक किसी को नहीं बताया, वह मुझे बताइए।
पद 2
ब्रह्मोवाच अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्। देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥
ब्रह्मा जी बोले — हे विप्र, एक अत्यंत गुप्त साधन है जो सब प्राणियों का भला करता है। वह देवी का पवित्र कवच है; हे महामुनि, उसे सुनो।
पद 3
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥
देवी का पहला रूप शैलपुत्री, दूसरा ब्रह्मचारिणी, तीसरा चंद्रघंटा और चौथा कूष्मांडा है।
पद 4
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥
पाँचवाँ रूप स्कंदमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ महागौरी है।
पद 5
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥
नौवाँ रूप सिद्धिदात्री है — ये नवदुर्गा कहलाती हैं। ये नाम स्वयं महात्मा ब्रह्मा ने बताए हैं।
पद 6
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
जो आग में जल रहा हो, युद्ध में शत्रुओं से घिरा हो, या किसी कठिन और दुर्गम संकट में हो — ऐसे भयभीत लोग जो देवी की शरण में जाते हैं,
पद 7
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥
उनका युद्ध के संकट में भी कोई अनिष्ट नहीं होता। ब्रह्मा जी कहते हैं — मैं उन पर कोई आपत्ति नहीं देखता, न उन्हें शोक, दुख या भय होता है।
पद 8
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥
जो भक्ति से देवी का स्मरण करते हैं, उनकी निश्चय ही उन्नति होती है। हे देवेश्वरी, जो आपको याद करते हैं, आप उनकी रक्षा करती हैं — इसमें कोई संदेह नहीं।
पद 9
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना। ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
चामुंडा शव पर विराजती हैं, वाराही भैंसे पर, ऐन्द्री हाथी पर और वैष्णवी गरुड़ पर सवार हैं।
पद 10
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना। लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥
माहेश्वरी बैल पर और कौमारी मोर पर सवार हैं। हरि की प्रिया लक्ष्मी देवी कमल पर बैठी हैं और उनके हाथ में कमल है।
पद 11
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना। ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥
ईश्वरी देवी श्वेत रूप वाली हैं और बैल पर सवार हैं। सब आभूषणों से सजी ब्राह्मी हंस पर विराजती हैं।
पद 12
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः। नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥
ये सभी माताएँ हर योग-शक्ति से युक्त हैं। वे तरह-तरह के गहनों और रत्नों से सुशोभित हैं।
पद 13
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः। शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥
ये देवियाँ (दुष्टों पर) क्रोध से भरी, रथों पर सवार दिखाई देती हैं। वे शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल धारण करती हैं।
पद 14
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥
साथ ही ढाल, तोमर, फरसा, पाश, भाला, त्रिशूल और श्रेष्ठ शार्ङ्ग धनुष भी धारण करती हैं।
पद 15
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥
ये देवियाँ दैत्यों के नाश के लिए, भक्तों को निर्भय करने के लिए और देवताओं के हित के लिए ये अस्त्र धारण करती हैं।
पद 16
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
हे अत्यंत उग्र रूप वाली, भयानक पराक्रम वाली, महाबली और महान उत्साह वाली देवी, बड़े से बड़े भय को मिटाने वाली माँ, आपको नमस्कार।
पद 17
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
हे देवी, जिन्हें शत्रु देख भी नहीं पाते और जो शत्रुओं का भय बढ़ाती हैं, मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री और आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) में अग्नि-शक्ति मेरी रक्षा करें।
पद 18
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥
दक्षिण में वाराही, नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) में खड्ग धारण करने वाली, पश्चिम में वारुणी और वायव्य (उत्तर-पश्चिम) में मृग पर सवार देवी मेरी रक्षा करें।
पद 19
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी। ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥
उत्तर में कौमारी, ईशान (उत्तर-पूर्व) में त्रिशूलधारिणी, ऊपर ब्रह्माणी और नीचे वैष्णवी मेरी रक्षा करें।
पद 20
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना। जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥
इसी तरह शव पर सवार चामुंडा दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें। जया आगे से और विजया पीछे से मेरी रक्षा करें।
पद 21
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता। शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥
बाईं ओर अजिता और दाईं ओर अपराजिता रक्षा करें। उद्योतिनी मेरी चोटी की और सिर पर विराजमान उमा मेरे मस्तक की रक्षा करें।
पद 22
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी। त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥
माथे की रक्षा मालाधरी और भौंहों की यशस्विनी करें। भौंहों के बीच त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघंटा रक्षा करें।
पद 23
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥
आँखों के बीच शंखिनी, कानों की द्वारवासिनी, गालों की कालिका और कानों की जड़ की शांकरी रक्षा करें।
पद 24
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका। अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥
नाक की सुगंधा, ऊपरी होंठ की चर्चिका, निचले होंठ की अमृतकला और जीभ की सरस्वती रक्षा करें।
पद 25
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका। घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥
दाँतों की कौमारी, कंठ की चंडिका, गले की घंटी की चित्रघंटा और तालु की महामाया रक्षा करें।
पद 26
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला। ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥
ठोड़ी की कामाक्षी, वाणी की सर्वमंगला, गर्दन की भद्रकाली और रीढ़ की धनुर्धरी रक्षा करें।
पद 27
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी। स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥
गले के बाहरी भाग की नीलग्रीवा, कंठनली की नलकूबरी, कंधों की खड्गिनी और भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करें।
पद 28
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च। नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥
हाथों की दंडिनी, उँगलियों की अंबिका, नाखूनों की शूलेश्वरी और पेट (कोख) की कुलेश्वरी रक्षा करें।
पद 29
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी। हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥
छाती की महादेवी, मन की शोकविनाशिनी, हृदय की ललिता देवी और उदर की शूलधारिणी रक्षा करें।
पद 30
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा। पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥३०॥
नाभि की कामिनी, गुप्त अंगों की गुह्येश्वरी, जननेंद्रिय की पूतना और कामिका, तथा गुदा की महिषवाहिनी रक्षा करें।
पद 31
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥३१॥
कमर की भगवती, घुटनों की विंध्यवासिनी और पिंडलियों की सब इच्छाएँ पूरी करने वाली महाबला रक्षा करें।
पद 32
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी। पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥
टखनों की नारसिंही, पैरों के ऊपरी भाग की तैजसी, पैर की उँगलियों की श्री और तलवों की तलवासिनी रक्षा करें।
पद 33
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी। रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥
नाखूनों की दंष्ट्राकराली, बालों की ऊर्ध्वकेशिनी, रोमछिद्रों की कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी रक्षा करें।
पद 34
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती। अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥
रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की पार्वती, आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करें।
पद 35
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा। ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥
हृदय-कमल की पद्मावती, कफ की चूड़ामणि, नाखूनों की चमक की ज्वालामुखी और सब जोड़ों की अभेद्या रक्षा करें।
पद 36
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा। अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥
हे ब्रह्माणी, मेरे वीर्य की रक्षा करो; छत्रेश्वरी मेरी छाया की रक्षा करें। धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करें।
पद 37
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्। वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥
वज्रहस्ता मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान — पाँचों प्राण-वायुओं की रक्षा करें। कल्याणशोभना मेरे जीवन की रक्षा करें।
पद 38
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
स्वाद, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श के अनुभव में योगिनी रक्षा करें। सत्त्व, रज और तम — तीनों गुणों की नारायणी सदा रक्षा करें।
पद 39
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी। यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥
वाराही मेरी आयु की और वैष्णवी मेरे धर्म की रक्षा करें। चक्रिणी मेरे यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्या की रक्षा करें।
पद 40
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके। पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥
इंद्राणी मेरे कुल की रक्षा करें; हे चंडिके, मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी मेरी संतान की और भैरवी मेरी पत्नी की रक्षा करें।
पद 41
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा। राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥
सुपथा मेरे रास्ते की और क्षेमकरी मेरी यात्रा की रक्षा करें। राजदरबार (सरकारी जगहों) में महालक्ष्मी और हर ओर विजया मेरी रक्षा करें।
पद 42
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥
हे देवी, जो स्थान इस कवच में छूट गया हो और रक्षा से रहित हो, हे पाप नाश करने वाली जयंती, उन सबकी आप रक्षा करें।
पद 43
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः। कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥
जो अपना भला चाहता है, वह इस कवच के बिना एक कदम भी न चले। जो इस कवच से सदा ढका रहता है, वह जहाँ-जहाँ जाता है,
पद 44
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्। परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥
वहाँ-वहाँ उसे लाभ और हर इच्छा पूरी करने वाली विजय मिलती है, ऐसा परंपरा कहती है। वह जो-जो शुभ कामना करता है, उसे पाता है, और इस धरती पर अतुलनीय ऐश्वर्य प्राप्त करता है।
पद 45
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः। त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥
इस कवच से ढका व्यक्ति निर्भय हो जाता है और संघर्षों में हारता नहीं। वह तीनों लोकों में सम्मान पाता है।
पद 46
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्। यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो व्यक्ति पवित्र होकर, श्रद्धा के साथ, रोज़ तीनों संध्याओं में इसका पाठ करता है,
पद 47
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः। जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥४७॥
उसे दिव्य शक्ति मिलती है और वह तीनों लोकों में अजेय रहता है। परंपरा के अनुसार वह अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष से भी अधिक जीता है।
पद 48
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः। स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥
कवच की महिमा बताते हुए कहा गया है कि मकड़ी के काटने, फोड़े आदि जैसे कष्ट, और पौधों, जीवों या बनाए गए विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है।
पद 49
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले। भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥४९॥
धरती पर किए गए सब बुरे टोने-टोटके और मंत्र-यंत्र, तथा धरती, आकाश और जल में रहने वाली और सिखाई हुई बुरी शक्तियाँ,
पद 50
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा। अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥५०॥
जन्म से या कुल से लगी बाधाएँ, डाकिनी, शाकिनी, और आकाश में घूमने वाली भयानक व बलवान डाकिनियाँ,
पद 51
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः। ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥५१॥
ग्रह-बाधा, भूत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्मांड और भैरव आदि (बुरी शक्तियाँ),
पद 52
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥
जिसके हृदय में यह कवच बसा है, उसे देखते ही ये सब भाग जाती हैं। उसे राजा से सम्मान मिलता है और यह कवच उसका तेज बढ़ाता है।
पद 53
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले। जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥
वह धरती पर यश और कीर्ति में बढ़ता है। इसलिए पहले कवच का पाठ करके फिर सप्तशती चंडी का पाठ करना चाहिए।
पद 54
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥
जब तक यह धरती पर्वतों, वनों और जंगलों को धारण किए रहेगी, तब तक ऐसे साधक का वंश — बेटे-पोते — धरती पर बना रहेगा, ऐसा कहा गया है।
पद 55
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्। प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥
शरीर छूटने पर महामाया की कृपा से वह उस परम और शाश्वत धाम को पाता है, जो देवताओं को भी कठिनाई से मिलता है।
पद 56
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥५६॥ ॐ॥ इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।
वह परम दिव्य रूप पाता है और भगवान शिव के साथ आनंद में रहता है। इस प्रकार देवी कवच पूरा हुआ।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा कवच का पाठ कब करना चाहिए?
परंपरा से इसे दुर्गा सप्तशती से पहले, अर्गला स्तोत्र और कीलक के साथ पढ़ा जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में और रोज़ सुबह-शाम भी बहुत से भक्त इसका पाठ करते हैं।
देवी कवच किसने कहा था?
कवच के अनुसार ब्रह्मा जी ने इसे मार्कंडेय ऋषि को सुनाया था, जब ऋषि ने मनुष्यों की रक्षा करने वाले सबसे गुप्त साधन के बारे में पूछा।
क्या देवी कवच का पाठ कोई भी कर सकता है?
हाँ। स्नान करके, शांत मन और श्रद्धा से कोई भी इसका पाठ कर सकता है। संस्कृत कठिन लगे तो धीरे-धीरे पढ़ें या अर्थ के साथ सुनें।