दुर्गे दुर्घट भारी आरती — अर्थ सहित

यह माँ दुर्गा की सबसे प्रसिद्ध मराठी आरती है। इसमें भक्त कहता है कि माँ के बिना संसार बहुत कठिन है, और जन्म-मरण के चक्र से छुड़ाने की प्रार्थना करता है। महाराष्ट्र में नवरात्रि और गणेशोत्सव की आरती में 'सुखकर्ता दुखहर्ता' और 'लवथवती विक्राळा' के साथ यह ज़रूर गाई जाती है।

4 पद · लगभग 3 मिनट

दुर्गे दुर्घट भारी तुजविण संसारी। अनाथनाथे अंबे करुणा विस्तारी॥ वारी वारी जन्ममरणांते वारी। हारी पडलों आतां संकट निवारी॥१॥

जय देवी जय देवी महिषासुरमथनी। सुरवरईश्वरवरदे तारक संजीवनी॥ धृ.॥

त्रिभुवनभुवनीं पाहतां तुज ऐसी नाहीं। चारी श्रमले परंतु न बोलवे कांहीं॥ साही विवाद करितां पडिले प्रवाहीं। ते तूं भक्तांलागीं पावसि लवलाहीं॥२॥

प्रसन्नवदने प्रसन्न होसी निजदासां। क्लेशांपासुनि सोडवीं तोडीं भवपाशा॥ अंबे तुजवांचून कोण पुरविल आशा। नरहरि तल्लिन झाला पदपंकजलेशा॥३॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'दुर्गे दुर्घट भारी' किसने लिखी?

अंतिम पंक्ति में 'नरहरि' नाम आता है, जिसे रचनाकार की छाप माना जाता है। लोक में इसे समर्थ रामदास की आरतियों के साथ भी जोड़ा जाता है।

यह आरती कब गाई जाती है?

नवरात्रि के नौ दिनों में, गणेशोत्सव की आरती में, और मंगलवार-शुक्रवार की देवी पूजा में।

'चारी' और 'साही' का क्या अर्थ है?

'चारी' यानी चार वेद और 'साही' यानी छह शास्त्र (दर्शन)। आरती कहती है कि ये भी माँ की महिमा का पूरा वर्णन नहीं कर पाए।

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