भज गोविन्दम् (मोहमुद्गर) — अर्थ सहित
भज गोविन्दम् आदि शंकराचार्य की प्रसिद्ध रचना है, जिसे 'मोहमुद्गर' (मोह तोड़ने वाला हथौड़ा) भी कहते हैं। कथा है कि काशी में एक बूढ़े व्यक्ति को व्याकरण रटते देखकर उन्होंने यह उपदेश दिया। सरल शब्दों में यह धन, देह और मोह की नश्वरता बताकर भगवान की भक्ति और आत्म-ज्ञान की ओर बुलाता है।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते । सम्प्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥ १ ॥
मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् । यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ २ ॥
नारीस्तनभरनाभीदेशं दृष्ट्वा मागा मोहावेशम् । एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥ ३ ॥
नलिनीदलगतजलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् । विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥ ४ ॥
यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः । पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥ ५ ॥
यावत्पवनो निवसति देहे तावत्पृच्छति कुशलं गेहे । गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥ ६ ॥
बालस्तावत्क्रीडासक्तः तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः । वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥ ७ ॥
का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः । कस्य त्वं कः कुत आयातः तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥ ८ ॥
सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम् । निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥ ९ ॥
वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः । क्षीणे वित्ते कः परिवारः ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥ १० ॥
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं हरति निमेषात्कालः सर्वम् । मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥ ११ ॥
दिनयामिन्यौ सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः । कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥ १२ ॥
द्वादशमञ्जरिकाभिरशेषः कथितो वैयाकरणस्यैषः । उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः श्रीमच्छङ्करभगवच्चरणैः ॥
का ते कान्ता धनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता । त्रिजगति सज्जनसङ्गतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका ॥ १३ ॥
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः काषायाम्बरबहुकृतवेषः । पश्यन्नपि च न पश्यति मूढो ह्युदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥ १४ ॥
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् । वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम् ॥ १५ ॥
अग्रे वह्निः पृष्ठे भानुः रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः । करतलभिक्षस्तरुतलवासः तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥ १६ ॥
कुरुते गङ्गासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम् । ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं न भजति जन्मशतेन ॥ १७ ॥
सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः शय्या भूतलमजिनं वासः । सर्वपरिग्रहभोगत्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः ॥ १८ ॥
योगरतो वा भोगरतो वा सङ्गरतो वा सङ्गविहीनः । यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दत्येव ॥ १९ ॥
भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवकणिका पीता । सकृदपि येन मुरारिसमर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ॥ २० ॥
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् । इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे ॥ २१ ॥
रथ्याचर्पटविरचितकन्थः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः । योगी योगनियोजितचित्तो रमते बालोन्मत्तवदेव ॥ २२ ॥
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः । इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥ २३ ॥
त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः । भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम् ॥ २४ ॥
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ । सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥ २५ ॥
कामं क्रोधं लोभं मोहं त्यक्त्वाऽऽत्मानं भावय कोऽहम् । आत्मज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥ २६ ॥
गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् । नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥ २७ ॥
सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः । यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥ २८ ॥
अर्थमनर्थं भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम् । पुत्रादपि धनभाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ॥ २९ ॥
प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्यविवेकविचारम् । जाप्यसमेतसमाधिविधानं कुर्ववधानं महदवधानम् ॥ ३० ॥
गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्तः संसारादचिराद्भव मुक्तः । सेन्द्रियमानसनियमादेवं द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थं देवम् ॥ ३१ ॥
अर्थ
पद 1
भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते । सम्प्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥ १ ॥
हे भोले मन, गोविंद को भजो, गोविंद को भजो। जब मृत्यु का समय पास आएगा, तब व्याकरण के नियम (जैसे 'डुकृञ् करणे') तुम्हें नहीं बचाएँगे।
पद 2
मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् । यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ २ ॥
हे मूर्ख, धन जमा करने की प्यास छोड़ो; मन में अच्छे विचार और संतोष लाओ। अपने कर्म से जो धन मिले, उसी से मन को प्रसन्न रखो।
पद 3
नारीस्तनभरनाभीदेशं दृष्ट्वा मागा मोहावेशम् । एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥ ३ ॥
शरीर के सौंदर्य को देखकर मोह में मत बहो। बार-बार सोचो कि यह शरीर मांस और चर्बी का ही एक रूप है।
पद 4
नलिनीदलगतजलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् । विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥ ४ ॥
कमल के पत्ते पर पड़ी पानी की बूँद जैसे डगमगाती है, वैसे ही जीवन बहुत अस्थिर है। जान लो कि सारा संसार रोग, अहंकार और शोक से घिरा है।
पद 5
यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः । पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥ ५ ॥
जब तक तुम कमाते हो, तब तक परिवार तुमसे लगाव रखता है। बाद में जब शरीर बूढ़ा और कमज़ोर हो जाता है, तो घर में कोई हाल भी नहीं पूछता।
पद 6
यावत्पवनो निवसति देहे तावत्पृच्छति कुशलं गेहे । गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥ ६ ॥
जब तक शरीर में साँस है, तब तक घर वाले कुशल पूछते हैं। साँस निकल जाने पर पत्नी भी उसी शरीर से डरती है।
पद 7
बालस्तावत्क्रीडासक्तः तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः । वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥ ७ ॥
बचपन खेल में, जवानी प्रेम-आकर्षण में और बुढ़ापा चिंताओं में बीत जाता है। परम ब्रह्म (भगवान) में कोई भी मन नहीं लगाता।
पद 8
का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः । कस्य त्वं कः कुत आयातः तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥ ८ ॥
कौन तुम्हारी पत्नी है, कौन तुम्हारा पुत्र? यह संसार बहुत विचित्र है। हे भाई, सोचो — तुम किसके हो, कौन हो, कहाँ से आए हो — इसी सत्य पर विचार करो।
पद 9
सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम् । निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥ ९ ॥
सज्जनों की संगति से आसक्ति छूटती है, आसक्ति छूटने से मोह मिटता है। मोह मिटने से मन सत्य में स्थिर होता है, और उस स्थिरता से जीते-जी मुक्ति मिलती है।
पद 10
वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः । क्षीणे वित्ते कः परिवारः ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥ १० ॥
उम्र ढलने पर काम-वासना कहाँ? पानी सूखने पर तालाब कहाँ? धन घटने पर परिवार कहाँ? और सत्य जान लेने पर संसार का बंधन कहाँ?
पद 11
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं हरति निमेषात्कालः सर्वम् । मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥ ११ ॥
धन, लोगों और जवानी का घमंड मत करो; समय पल भर में सब छीन लेता है। इस मायामय संसार का मोह छोड़कर, सत्य को जानकर ब्रह्म-पद में प्रवेश करो।
पद 12
दिनयामिन्यौ सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः । कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥ १२ ॥
दिन और रात, शाम और सुबह, सर्दी और वसंत बार-बार आते हैं। समय खेलता है, आयु बीतती जाती है, फिर भी इच्छाओं की हवा पीछा नहीं छोड़ती।
पद 13
द्वादशमञ्जरिकाभिरशेषः कथितो वैयाकरणस्यैषः । उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः श्रीमच्छङ्करभगवच्चरणैः ॥
यह संपूर्ण उपदेश बारह पदों के गुच्छे के रूप में एक व्याकरण-पाठी को विद्या में निपुण पूज्य श्री शंकर भगवत्पाद ने दिया।
पद 14
का ते कान्ता धनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता । त्रिजगति सज्जनसङ्गतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका ॥ १३ ॥
हे पगले, पत्नी और धन की इतनी चिंता क्यों? क्या तुम्हारा कोई मार्गदर्शक नहीं? तीनों लोकों में संसार-सागर पार कराने वाली नाव केवल सज्जनों की संगति है।
पद 15
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः काषायाम्बरबहुकृतवेषः । पश्यन्नपि च न पश्यति मूढो ह्युदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥ १४ ॥
कोई जटा रखता है, कोई सिर मुँड़ाता है, कोई बाल नोचता है, कोई गेरुए वस्त्र पहनता है। ऐसा मूर्ख देखकर भी सत्य नहीं देखता; ये सारे वेश केवल पेट भरने के लिए हैं।
पद 16
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् । वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम् ॥ १५ ॥
शरीर ढल गया, सिर के बाल सफ़ेद हो गए, मुँह में दाँत नहीं रहे। बूढ़ा व्यक्ति लाठी लेकर चलता है, फिर भी इच्छाओं की गठरी नहीं छोड़ता।
पद 17
अग्रे वह्निः पृष्ठे भानुः रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः । करतलभिक्षस्तरुतलवासः तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥ १६ ॥
सामने आग, पीठ पर धूप, रात को ठुड्डी घुटनों पर टिकाकर बैठना, हथेली में भिक्षा और पेड़ के नीचे रहना — फिर भी इच्छाओं का फंदा नहीं छूटता।
पद 18
कुरुते गङ्गासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम् । ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं न भजति जन्मशतेन ॥ १७ ॥
कोई गंगासागर की यात्रा करे, व्रत रखे या दान करे, पर यदि आत्म-ज्ञान नहीं है तो सब मतों के अनुसार सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं मिलती।
पद 19
सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः शय्या भूतलमजिनं वासः । सर्वपरिग्रहभोगत्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः ॥ १८ ॥
मंदिर में या पेड़ के नीचे रहना, धरती पर सोना, मृगछाला पहनना, सब संग्रह और भोग त्याग देना — ऐसा वैराग्य किसे सुख नहीं देता?
पद 20
योगरतो वा भोगरतो वा सङ्गरतो वा सङ्गविहीनः । यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दत्येव ॥ १९ ॥
कोई योग में लगा हो या भोग में, लोगों के बीच हो या अकेला — जिसका मन ब्रह्म में रमता है, वही आनंदित है, आनंदित है, सचमुच आनंदित है।
पद 21
भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवकणिका पीता । सकृदपि येन मुरारिसमर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ॥ २० ॥
जिसने भगवद्गीता थोड़ी भी पढ़ी, गंगाजल की एक बूँद भी पी, और एक बार भी मुरारि (श्रीकृष्ण) की सच्ची पूजा की, उससे यमराज विवाद नहीं करते — ऐसा शंकराचार्य कहते हैं।
पद 22
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् । इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे ॥ २१ ॥
फिर जन्म, फिर मृत्यु, फिर माँ के गर्भ में सोना — यह संसार पार करना बहुत कठिन है। हे मुरारि, अपनी असीम कृपा से मेरी रक्षा करो।
पद 23
रथ्याचर्पटविरचितकन्थः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः । योगी योगनियोजितचित्तो रमते बालोन्मत्तवदेव ॥ २२ ॥
सड़क के चिथड़ों से बनी गुदड़ी ओढ़े, पुण्य-पाप से परे मार्ग पर चलने वाला योगी, जिसका मन योग में लगा है, बालक या मस्त व्यक्ति की तरह आनंद में रहता है।
पद 24
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः । इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥ २३ ॥
तुम कौन हो, मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरी माँ कौन, मेरे पिता कौन? इस पर विचार करो, संसार को सपने जैसा सारहीन समझकर उसका मोह छोड़ो।
पद 25
त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः । भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम् ॥ २४ ॥
तुममें, मुझमें और हर जगह एक ही विष्णु हैं; तुम व्यर्थ ही मुझ पर अधीर होकर क्रोध करते हो। यदि जल्दी ही विष्णु-भाव पाना चाहते हो, तो हर जगह समान दृष्टि रखो।
पद 26
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ । सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥ २५ ॥
शत्रु, मित्र, पुत्र या रिश्तेदार से लड़ने या मेल करने में ज़्यादा मत उलझो। सबमें एक ही आत्मा देखो और हर जगह भेदभाव वाली अज्ञानता छोड़ दो।
पद 27
कामं क्रोधं लोभं मोहं त्यक्त्वाऽऽत्मानं भावय कोऽहम् । आत्मज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥ २६ ॥
काम, क्रोध, लोभ और मोह छोड़कर अपने भीतर विचार करो: 'मैं कौन हूँ?' जो आत्म-ज्ञान से रहित मूढ़ हैं, वे दुख रूपी नरक में फँसकर तपते रहते हैं।
पद 28
गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् । नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥ २७ ॥
गीता और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करो, लक्ष्मीपति विष्णु के रूप का सदा ध्यान करो। मन को सज्जनों की संगति में ले जाओ और ज़रूरतमंदों को धन दान करो।
पद 29
सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः । यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥ २८ ॥
मनुष्य आसानी से भोग-विलास में डूब जाता है, पर बाद में, हाय, शरीर में रोग आ जाता है। यद्यपि संसार में अंत में मृत्यु ही आनी है, फिर भी वह बुरे आचरण नहीं छोड़ता।
पद 30
अर्थमनर्थं भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम् । पुत्रादपि धनभाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ॥ २९ ॥
धन को सदा अनर्थ का कारण समझो; सच में उससे ज़रा भी स्थायी सुख नहीं मिलता। धनवानों को अपने पुत्र से भी डर लगता है — हर जगह यही रीति देखी जाती है।
पद 31
प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्यविवेकविचारम् । जाप्यसमेतसमाधिविधानं कुर्ववधानं महदवधानम् ॥ ३० ॥
प्राणायाम, इंद्रियों को भीतर मोड़ना (प्रत्याहार), नित्य और अनित्य का विवेक, और जप के साथ ध्यान-समाधि — इन्हें बहुत सावधानी और ध्यान से करो।
पद 32
गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्तः संसारादचिराद्भव मुक्तः । सेन्द्रियमानसनियमादेवं द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थं देवम् ॥ ३१ ॥
गुरु के चरण-कमलों के पूर्ण भक्त बनकर जल्दी ही संसार के बंधन से मुक्त हो जाओ। इंद्रियों और मन को संयम में रखकर तुम अपने ही हृदय में बसे भगवान के दर्शन करोगे।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भज गोविन्दम् किसने लिखा?
भज गोविन्दम् आदि शंकराचार्य की रचना है। परंपरा के अनुसार पहले बारह श्लोक (द्वादशमंजरिका) उन्होंने कहे, और बाकी श्लोक उनके शिष्यों ने जोड़े।
इसे 'मोहमुद्गर' क्यों कहते हैं?
'मुद्गर' का अर्थ है हथौड़ा। यह स्तोत्र धन, शरीर, परिवार और इच्छाओं के प्रति मोह को तोड़कर मन को भगवान की ओर मोड़ता है, इसलिए इसे मोहमुद्गर कहते हैं।
क्या भज गोविन्दम् केवल संन्यासियों के लिए है?
नहीं। यह हर किसी के लिए है — युवा, गृहस्थ और बुजुर्ग सब। इसमें ईमानदारी से कमाने, सज्जनों की संगति करने, दान करने और गीता व सहस्रनाम पढ़ने जैसी व्यावहारिक सीख है।