आरती कुंजबिहारी की — अर्थ सहित

'आरती कुंजबिहारी की' श्रीकृष्ण की सबसे प्रिय आरती है। 'कुंजबिहारी' यानी वृंदावन के कुंजों में विहार करने वाले कृष्ण। इसमें उनकी मुरली, मोर मुकुट, राधा जी की शोभा और वृंदावन की छवि का मधुर वर्णन है। जन्माष्टमी, एकादशी और रोज़ की पूजा में यह गाई जाती है।

5 पद · लगभग 5 मिनट

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला। श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला। गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली। लतन में ठाढ़े बनमाली; भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक; ललित छवि श्यामा प्यारी की॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं। गगन सों सुमन रासि बरसै; बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग; अतुल रति गोप कुमारी की॥

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्रीगंगा। स्मरन ते होत मोह भंगा; बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच; चरन छवि श्रीबनवारी की॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू। चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू; हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद; टेर सुन दीन दुखारी की॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आरती कुंजबिहारी की कब गाई जाती है?

रोज़ की कृष्ण पूजा के अंत में, और विशेष रूप से जन्माष्टमी की आधी रात के जन्मोत्सव, एकादशी और बुधवार को। वृंदावन और ब्रज के मंदिरों में यह बहुत गाई जाती है।

'कुंजबिहारी' का क्या अर्थ है?

'कुंज' यानी पेड़-लताओं से घिरा बगीचा और 'बिहारी' यानी घूमने-खेलने वाला। वृंदावन के कुंजों में लीला करने वाले कृष्ण को कुंजबिहारी कहते हैं।

हर पद के अंत में क्या दोहराया जाता है?

हर पद के बाद टेक 'श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की, आरती कुंजबिहारी की' दोहराई जाती है।

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