श्री गोवर्धन महाराज आरती — अर्थ सहित
गोवर्धन पर्वत को ब्रज में 'गिरिराज जी' कहकर स्वयं श्रीकृष्ण का रूप माना जाता है, क्योंकि कृष्ण ने इसे उँगली पर उठाकर ब्रजवासियों को इंद्र की वर्षा से बचाया था। यह ब्रज भाषा की लोक-आरती दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा, अन्नकूट और सात कोस की परिक्रमा में गाई जाती है।
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रह्यो॥
तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़े, तोपे चढ़े दूध की धार॥
तेरी सात कोस की परिकम्मा, और चकलेश्वर विश्राम॥
तेरे गले में कण्ठा साज रह्यो, ठोड़ी पे हीरा लाल॥
तेरे कानन कुण्डल चमक रह्यो, तेरी झाँकी बनी विशाल॥
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण, करो भक्त का बेड़ा पार॥
अर्थ
पद 1
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रह्यो॥
हे श्री गोवर्धन महाराज, आपके माथे पर मुकुट शोभा दे रहा है।
पद 2
तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़े, तोपे चढ़े दूध की धार॥
आप पर पान चढ़ते हैं, फूल चढ़ते हैं और दूध की धार चढ़ाई जाती है।
पद 3
तेरी सात कोस की परिकम्मा, और चकलेश्वर विश्राम॥
आपकी परिक्रमा सात कोस की है, और चकलेश्वर (महादेव) पर भक्त विश्राम करते हैं।
पद 4
तेरे गले में कण्ठा साज रह्यो, ठोड़ी पे हीरा लाल॥
आपके गले में कंठहार सजा है और ठोड़ी पर हीरा और लाल (माणिक) चमक रहे हैं।
पद 5
तेरे कानन कुण्डल चमक रह्यो, तेरी झाँकी बनी विशाल॥
आपके कानों में कुंडल चमक रहे हैं और आपकी झाँकी बहुत भव्य सजी है।
पद 6
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण, करो भक्त का बेड़ा पार॥
हे गिरिराज को धारण करने वाले प्रभु, हम आपकी शरण में हैं; अपने भक्त की नाव पार लगाइए।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गोवर्धन पूजा कब होती है?
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, यानी दिवाली के अगले दिन। इस दिन अन्नकूट का भोग भी लगता है।
गोवर्धन परिक्रमा कितनी लंबी है?
आरती के अनुसार सात कोस, जो लगभग 21 किलोमीटर है। भक्त इसे नंगे पैर पैदल पूरा करते हैं।
गोवर्धन को गिरिराज जी क्यों कहते हैं?
'गिरिराज' यानी पर्वतों के राजा। ब्रज में मान्यता है कि गोवर्धन पर्वत स्वयं श्रीकृष्ण का रूप है, इसलिए उसे आदर से गिरिराज जी कहते हैं।