अर्गला स्तोत्र — अर्थ सहित
अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले पढ़े जाने वाले तीन अंगों (कवच, अर्गला, कीलक) में से दूसरा है। इसके ऋषि मार्कण्डेय द्वारा कहे गए श्लोकों में देवी की लीलाओं का स्मरण है और हर श्लोक में ‘रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि’ की प्रार्थना है।
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः। ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥१॥
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥२॥
मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥३॥
महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥४॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥५॥
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥६॥
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥७॥
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥८॥
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥९॥
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१०॥
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥११॥
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१२॥
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१३॥
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१४॥
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१५॥
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१६॥
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१७॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१८॥
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१९॥
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२०॥
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२१॥
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२२॥
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२३॥
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥२४॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः। स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥२५॥ इति देव्या अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम्।
अर्थ
पद 1
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः। ॐ नमश्चण्डिकायै॥
यह विनियोग है: इस स्तोत्र के ऋषि विष्णु, छंद अनुष्टुप् और देवता महालक्ष्मी हैं। जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसका जप होता है। चंडिका देवी को नमस्कार।
पद 2
मार्कण्डेय उवाच ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥१॥
मार्कण्डेय ऋषि बोले — हे चामुंडा देवी, आपकी जय हो! प्राणियों के कष्ट हरने वाली, आपकी जय हो! सर्वत्र व्याप्त देवी कालरात्रि, आपको नमस्कार।
पद 3
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥२॥
जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा — इन नामों वाली देवी, आपको नमस्कार।
पद 4
मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥३॥
मधु और कैटभ को भगाकर ब्रह्मा जी को वर देने वाली देवी, आपको नमस्कार। मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और मेरे शत्रुओं (भीतर के भी) का नाश करो।
पद 5
महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥४॥
महिषासुर का नाश करने वाली और भक्तों को सुख देने वाली देवी, आपको नमस्कार। मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 6
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥५॥
रक्तबीज का वध करने वाली और चंड-मुंड का विनाश करने वाली हे देवी! मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 7
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥६॥
शुम्भ, निशुम्भ और धूम्रलोचन को कुचलने वाली देवी! मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 8
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥७॥
हे देवी, जिनके दोनों चरणों की सब वंदना करते हैं और जो सब सौभाग्य देती हैं! मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 9
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥८॥
जिनका रूप और लीला कल्पना से परे है, और जो सब शत्रुओं का नाश करती हैं! मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 10
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥९॥
हे चंडिका, जो भक्ति से सदा झुकते हैं, उनके पाप और कष्ट आप दूर करती हैं। मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 11
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१०॥
हे चंडिका, भक्ति से आपकी स्तुति करने वालों के रोग आप दूर करती हैं। मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 12
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥११॥
हे चंडिका, जो इस संसार में भक्ति से आपकी सदा पूजा करते हैं — उन्हें, और मुझे, रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 13
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१२॥
मुझे सौभाग्य और अच्छा स्वास्थ्य दो, और परम सुख दो। रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 14
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१३॥
द्वेष करने वालों का नाश करो और मुझे भरपूर बल दो। रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 15
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१४॥
हे देवी, मेरा कल्याण करो और मुझे उत्तम समृद्धि दो। रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 16
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१५॥
हे अम्बिका, देवता और असुर जब आपको प्रणाम करते हैं, तो उनके मुकुटों के रत्न आपके चरणों को छूते हैं। मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 17
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१६॥
अपने भक्त को विद्वान, यशस्वी और समृद्ध बनाओ। रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 18
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१७॥
प्रचंड दैत्यों का घमंड तोड़ने वाली हे चंडिका, मैं आपके सामने झुका हूँ — मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 19
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१८॥
हे चार भुजाओं वाली परमेश्वरी, जिनकी चार मुख वाले ब्रह्मा स्तुति करते हैं! मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 20
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१९॥
हे देवी अम्बिका, भगवान विष्णु (कृष्ण) निरंतर भक्ति से आपकी स्तुति करते हैं। मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 21
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२०॥
हे परमेश्वरी, जिनकी हिमालय की पुत्री पार्वती के स्वामी शिव स्तुति करते हैं! मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 22
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२१॥
हे परमेश्वरी, जिनकी इंद्राणी के पति इंद्र सच्चे मन से पूजा करते हैं! मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 23
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२२॥
हे देवी, अपनी प्रचंड भुजाओं से दैत्यों का घमंड चूर करने वाली! मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 24
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२३॥
हे देवी अम्बिका, आप भक्तों को असीम आनंद देती हैं। मुझे रूप, विजय और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
पद 25
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥२४॥
मुझे ऐसी मनभावन जीवनसंगिनी दो, जो मन से मेल खाए, अच्छे कुल की हो और संसार के कठिन सागर से पार उतरने में साथ दे।
पद 26
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः। स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥२५॥ इति देव्या अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम्।
जो इस स्तोत्र को पढ़कर फिर महास्तोत्र (दुर्गा सप्तशती) पढ़ता है, उसे सप्तशती के श्लोकों की संख्या जितना उत्तम फल मिलता है, ऐसा कहा गया है। यहाँ देवी का अर्गला स्तोत्र पूरा होता है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अर्गला स्तोत्र का पाठ कब करें?
परंपरा से इसे दुर्गा सप्तशती पाठ से पहले, देवी कवच के बाद और कीलक से पहले पढ़ा जाता है। नवरात्रि में इसका पाठ सबसे अधिक होता है, पर इसे रोज़ अकेले भी पढ़ सकते हैं।
‘अर्गला’ का क्या अर्थ है?
अर्गला का अर्थ है दरवाज़े की कुंडी या चिटकनी। माना जाता है कि यह स्तोत्र साधना के मार्ग की रुकावटें हटाकर देवी की कृपा का द्वार खोलता है।
अर्गला स्तोत्र किस ग्रंथ से है?
यह दुर्गा सप्तशती के आरंभिक अंगों में छपता है, जिसे मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य के साथ पढ़ा जाता है। इसके वक्ता मार्कण्डेय ऋषि हैं।