संतोषी माता व्रत कथा — संपूर्ण अर्थ सहित
संतोषी माता भगवान गणेश की पुत्री और संतोष की देवी हैं। शुक्रवार के सोलह व्रत रखने और कथा सुनने से माता भक्त की सभी मनोकामनाएँ पूरी करती हैं। इस कथा में एक सेवक की पत्नी की कहानी है जो कठिन परिस्थितियों में भी माता पर श्रद्धा रखती है और अपने पति को वापस पाती है।
॥ दोहा ॥
जय संतोषी माता जय, गणनायक की लाड़। शुक्रवार व्रत जो करे, माँ करे बेड़ा पार॥
एक दरिद्र सेवक का घर था। पत्नी को सताती थीं ननद-सास। पति परदेस गया था काम खोजने। घर में दुख था, उम्मीद थी संतोषी माता पर।
पत्नी ने शुक्रवार का व्रत रखा। गुड़-चना माता को भोग लगाया। कथा सुनी, श्रद्धा से प्रार्थना की — हे माँ! मेरे पति को लौटा दो।
दूर परदेस में पति को माता ने जगाया। स्वप्न में घर की याद और पत्नी की छवि आई। माता की प्रेरणा से वह घर की ओर चला। सोलह व्रत में पत्नी की दुआ फली।
पति लौटा, घर में खुशी छाई। उद्यापन किया — माता की पूजा कराई। खट्टी चीज़ दूर रखी उस दिन सभी ने। संतोषी माता ने परिवार को एक किया।
॥ दोहा ॥
संतोषी माता की जय, शुक्रवार का व्रत लाए। गुड़-चना का भोग धरे, माँ मनोकामना पूर्ण कराए॥
अर्थ
दोहा
जय संतोषी माता जय, गणनायक की लाड़। शुक्रवार व्रत जो करे, माँ करे बेड़ा पार॥
हे संतोषी माता, आपकी जय हो — आप गणेश जी की लाड़ली हैं। जो शुक्रवार का व्रत रखे, माता उसका बेड़ा पार करें।
पद 1
एक दरिद्र सेवक का घर था। पत्नी को सताती थीं ननद-सास। पति परदेस गया था काम खोजने। घर में दुख था, उम्मीद थी संतोषी माता पर।
एक गरीब सेवक का घर था। उसकी पत्नी को ननद और सास सताती थीं। पति काम की तलाश में परदेस गया था। घर में दुख था पर पत्नी की उम्मीद संतोषी माता पर टिकी थी।
पद 2
पत्नी ने शुक्रवार का व्रत रखा। गुड़-चना माता को भोग लगाया। कथा सुनी, श्रद्धा से प्रार्थना की — हे माँ! मेरे पति को लौटा दो।
पत्नी ने शुक्रवार का व्रत रखा। गुड़-चना का भोग माता को लगाया। कथा सुनी और श्रद्धा से प्रार्थना की — हे माँ, मेरे पति को वापस लौटा दो।
पद 3
दूर परदेस में पति को माता ने जगाया। स्वप्न में घर की याद और पत्नी की छवि आई। माता की प्रेरणा से वह घर की ओर चला। सोलह व्रत में पत्नी की दुआ फली।
दूर परदेस में माता ने पति को जगाया। स्वप्न में घर और पत्नी की याद आई। माता की प्रेरणा से वह घर की ओर चल पड़ा। सोलह व्रत में पत्नी की दुआ फली।
पद 4
पति लौटा, घर में खुशी छाई। उद्यापन किया — माता की पूजा कराई। खट्टी चीज़ दूर रखी उस दिन सभी ने। संतोषी माता ने परिवार को एक किया।
पति लौटा, घर में खुशी छा गई। उद्यापन किया — माता की पूजा करवाई। उस दिन सभी ने खट्टी चीज़ से परहेज़ किया। संतोषी माता ने परिवार को एक कर दिया।
दोहा
संतोषी माता की जय, शुक्रवार का व्रत लाए। गुड़-चना का भोग धरे, माँ मनोकामना पूर्ण कराए॥
संतोषी माता की जय। शुक्रवार का व्रत रखो, गुड़-चना का भोग चढ़ाओ — माँ मनोकामना पूरी करती हैं।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
संतोषी माता का व्रत कैसे करें?
शुक्रवार को सूर्योदय से पहले उठें। स्नान करके संतोषी माता की पूजा करें। गुड़ और चने का भोग लगाएँ। कथा पढ़ें या सुनें। उस दिन खट्टी चीज़ें (नींबू, इमली, दही) न खाएँ और न खिलाएँ। शाम को प्रसाद बाँटें।
संतोषी माता के व्रत में खट्टा क्यों नहीं खाते?
कथा के अनुसार, जब भक्त ने खट्टा खाया तो माता नाराज़ हुईं और पति को फिर से जेल जाना पड़ा। इसलिए इस व्रत में खट्टी चीज़ वर्जित है। परिवार के किसी भी सदस्य को उस दिन खट्टा नहीं देना चाहिए।
संतोषी माता का उद्यापन कैसे होता है?
१६ शुक्रवार के व्रत के बाद उद्यापन करें। आठ लड़कों को भोजन कराएँ (खट्टे बिना)। हलवा-पूरी और चने बनाएँ। माता की पूजा, कथा और आरती करें। उद्यापन से व्रत का फल मिलता है और मनोकामना पूरी होती है।