संतोषी माता चालीसा — अर्थ सहित
माँ संतोषी भगवान गणेश की पुत्री और शुभता की देवी हैं। शुक्रवार को उनका व्रत रखने और इस चालीसा का पाठ करने से परिवार में सुख-शांति और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। व्रत में खट्टी चीज़ें वर्जित हैं।
॥ दोहा ॥
जय संतोषी माता जय, सुख-संतोष दाता। गणपति नंदिनी पावन, जग की माता॥
॥ दोहा ॥
शुक्रवार को जो व्रत करे। संतोषी माँ की कृपा भरे। खट्टा न खाए व्रत में कोई। मनोकामना पूर्ण हो सोई॥
॥ चौपाई ॥
जय संतोषी जय जग माता। भक्तों की पीड़ा हरो, दाता। गणेश-नंदिनी महा-पवित्री। शुभ-लक्षणा सौभाग्य-चरित्री॥
॥ चौपाई ॥
श्वेत वस्त्र धारण करती हो। हाथ में पुष्प-माला लेती हो। मुख पर दिव्य प्रकाश छाया। जग को देती सुख की माया॥
॥ चौपाई ॥
शुक्रवार को पूजन करते। गुड़ और चना भोग धरते। व्रत कथा सुनते ध्यान लगाते। संतोषी माँ की जय-जय गाते॥
॥ चौपाई ॥
सोलह शुक्रवार जो व्रत करे। संतोषी माँ की कृपा भरे। उद्यापन करके पाएं फल। घर में आए सुख का पहल॥
॥ चौपाई ॥
संतान सुख चाहे जो कोई। संतोषी माँ का व्रत धरे सोई। पुत्र-पुत्री सुखी करावें। घर में आनंद का बास लावें॥
॥ चौपाई ॥
व्यापार में जो बाधा आए। शुक्रवार व्रत से दूर हो जाए। नौकरी में आए उन्नति। संतोषी माँ की है यह कृपा-मति॥
॥ चौपाई ॥
विवाह में आए अड़चन जो। संतोषी माँ की पूजा धरो। शीघ्र विवाह होगा सुखकर। घर में आएगा सुख का पहर॥
॥ चौपाई ॥
रोगी को देती आरोग्य माँ। दुखी मन को देती संयोग माँ। भयभीत को देती अभय। संकट में करती निर्भय॥
॥ चौपाई ॥
गृहस्थी में सुख-शांति लाएं। दांपत्य में प्रेम बढ़ाएं। सास-बहू का झगड़ा मिटाएं। घर को स्वर्ग-समान बनाएं॥
॥ चौपाई ॥
देश के कोने-कोने में माँ। सम्बलपुर, मुंबई में माँ। कोलकाता और मद्रास में। विराजती संतोषी उजास में॥
॥ चौपाई ॥
संतोषी चालीसा जो गावे। माँ की कृपा मनचाही पावे। शुक्रवार को नित पाठ करे। उसके जीवन के दुख सब हरे॥
॥ दोहा ॥
जय संतोषी जय सदा, करो सदा कल्याण। भक्त के मनोरथ पूरे करो, देहु सुख-वरदान॥
अर्थ
दोहा
जय संतोषी माता जय, सुख-संतोष दाता। गणपति नंदिनी पावन, जग की माता॥
हे संतोषी माता, आपकी जय हो। सुख और संतोष देने वाली, गणपति की पुत्री, पावन, जगत की माता।
दोहा
शुक्रवार को जो व्रत करे। संतोषी माँ की कृपा भरे। खट्टा न खाए व्रत में कोई। मनोकामना पूर्ण हो सोई॥
जो शुक्रवार को व्रत रखे, संतोषी माँ की कृपा से भर जाता है। व्रत में खट्टा न खाएं — इस नियम से मनोकामना पूर्ण होती है।
चौपाई 1
जय संतोषी जय जग माता। भक्तों की पीड़ा हरो, दाता। गणेश-नंदिनी महा-पवित्री। शुभ-लक्षणा सौभाग्य-चरित्री॥
हे संतोषी, जगत-माता, जय हो। भक्तों की पीड़ा हरने वाली। गणेश-नंदिनी, महापवित्र, शुभ-लक्षणा, सौभाग्य-चरित्री।
चौपाई 2
श्वेत वस्त्र धारण करती हो। हाथ में पुष्प-माला लेती हो। मुख पर दिव्य प्रकाश छाया। जग को देती सुख की माया॥
आप श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और हाथ में पुष्पमाला लेती हैं। मुख पर दिव्य प्रकाश छाया हुआ है, जगत को सुख की माया देती हैं।
चौपाई 3
शुक्रवार को पूजन करते। गुड़ और चना भोग धरते। व्रत कथा सुनते ध्यान लगाते। संतोषी माँ की जय-जय गाते॥
शुक्रवार को पूजन करते हैं, गुड़ और चना का भोग लगाते हैं। व्रत-कथा सुनकर ध्यान लगाते हैं और संतोषी माँ की जय-जय गाते हैं।
चौपाई 4
सोलह शुक्रवार जो व्रत करे। संतोषी माँ की कृपा भरे। उद्यापन करके पाएं फल। घर में आए सुख का पहल॥
जो सोलह शुक्रवार का व्रत करे, संतोषी माँ की कृपा से भरपूर हो जाता है। उद्यापन करके फल पाएं, घर में सुख का पदार्पण हो।
चौपाई 5
संतान सुख चाहे जो कोई। संतोषी माँ का व्रत धरे सोई। पुत्र-पुत्री सुखी करावें। घर में आनंद का बास लावें॥
जो संतान का सुख चाहे, वह संतोषी माँ का व्रत रखे। वे पुत्र-पुत्री को सुखी करती हैं और घर में आनंद का वास कराती हैं।
चौपाई 6
व्यापार में जो बाधा आए। शुक्रवार व्रत से दूर हो जाए। नौकरी में आए उन्नति। संतोषी माँ की है यह कृपा-मति॥
व्यापार में जो बाधा आए, शुक्रवार व्रत से दूर हो जाती है। नौकरी में उन्नति मिलती है — यह संतोषी माँ की कृपा-बुद्धि है।
चौपाई 7
विवाह में आए अड़चन जो। संतोषी माँ की पूजा धरो। शीघ्र विवाह होगा सुखकर। घर में आएगा सुख का पहर॥
विवाह में जो अड़चन आए, संतोषी माँ की पूजा करें। शीघ्र सुखकर विवाह होगा और घर में सुख का समय आएगा।
चौपाई 8
रोगी को देती आरोग्य माँ। दुखी मन को देती संयोग माँ। भयभीत को देती अभय। संकट में करती निर्भय॥
माँ रोगी को आरोग्य देती हैं, दुखी मन को संयोग (समाधान) देती हैं। भयभीत को अभय और संकट में निर्भय बनाती हैं।
चौपाई 9
गृहस्थी में सुख-शांति लाएं। दांपत्य में प्रेम बढ़ाएं। सास-बहू का झगड़ा मिटाएं। घर को स्वर्ग-समान बनाएं॥
गृहस्थ जीवन में सुख-शांति लाएं, दांपत्य में प्रेम बढ़ाएं। सास-बहू के झगड़े मिटाएं और घर को स्वर्ग के समान बनाएं।
चौपाई 10
देश के कोने-कोने में माँ। सम्बलपुर, मुंबई में माँ। कोलकाता और मद्रास में। विराजती संतोषी उजास में॥
देश के कोने-कोने में माँ संतोषी विराजती हैं — संबलपुर, मुंबई, कोलकाता और मद्रास में — उनके मंदिर प्रकाशमान हैं।
चौपाई 11
संतोषी चालीसा जो गावे। माँ की कृपा मनचाही पावे। शुक्रवार को नित पाठ करे। उसके जीवन के दुख सब हरे॥
जो संतोषी चालीसा गाए, वह माँ की मनचाही कृपा पाए। शुक्रवार को नित्य पाठ करे तो उसके जीवन के सभी दुख हर जाते हैं।
दोहा
जय संतोषी जय सदा, करो सदा कल्याण। भक्त के मनोरथ पूरे करो, देहु सुख-वरदान॥
हे संतोषी माँ, सदा जय हो। सदा कल्याण करें, भक्त के सभी मनोरथ पूरे करें और सुख का वरदान दें।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
संतोषी माता का व्रत कैसे करें?
शुक्रवार को सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें, संतोषी माँ की पूजा करें, व्रत-कथा पढ़ें। खट्टी चीज़ें बिल्कुल न खाएं। गुड़-चना का प्रसाद बाँटें। सोलह शुक्रवार के व्रत के बाद उद्यापन करें।
संतोषी माता के व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए?
संतोषी माता के व्रत में खट्टी चीज़ें — नींबू, इमली, अमचूर, दही, आचार — बिल्कुल वर्जित हैं। परिवार के किसी सदस्य को भी उस दिन खट्टा नहीं खाना चाहिए।
संतोषी माता कौन हैं?
संतोषी माता भगवान गणेश की पुत्री और सिद्धि-बुद्धि की बहन मानी जाती हैं। वे संतोष और तृप्ति की देवी हैं। शुक्रवार उनका प्रिय दिन है।