श्री सत्यनारायण कथा — संपूर्ण अर्थ सहित
श्री सत्यनारायण कथा भगवान विष्णु के सत्यनारायण रूप की पूजा और उनकी महिमा की कथा है। स्कंद पुराण के रेवा खंड से ली गई यह कथा पाँच अध्यायों में है। इसे पूर्णिमा, संक्रांति, नए घर में प्रवेश, विवाह, जन्म या किसी मनोकामना की पूर्ति पर पढ़ा-सुना जाता है। कथा सुनने मात्र से पापों का नाश और मनोकामना की पूर्ति होती है — यही इस पूजा की मान्यता है।
॥ दोहा ॥
जय सत्यनारायण प्रभु, सत्य सनातन रूप। जो सुने पढ़े यह कथा, मिटे दुःख का धूप॥
एक बार नारद जी ने भगवान विष्णु से पूछा — हे प्रभु! मनुष्य के दुख और पाप का नाश किस उपाय से हो? विष्णु ने कहा — सत्यनारायण की कथा से। जो श्रद्धा से सुने, उसकी सब मनोकामना पूरी हो।
एक निर्धन ब्राह्मण नगर में भटकता था। भूखा-प्यासा, दुखी और चिंतित रहता था। स्वयं विष्णु वृद्ध रूप धरकर आए, कथा का व्रत लेने का मार्ग बताए।
ब्राह्मण ने व्रत किया, कथा सुनाई। प्रसाद बाँटा, परिवार में खुशहाली आई। संतान मिली, धन-धान्य भरपूर। सत्यनारायण की कृपा से सब दुख दूर।
राजा उल्कामुख ने भी यह कथा सुनी। श्रद्धा से पूजा की, मनोकामना पूरी। लीलावती और कलावती को पुत्री मिली। सत्य के प्रताप से सब इच्छा पूरी।
साधु वणिक ने व्रत का संकल्प लिया। पर घर लौटकर भूल गया, प्रसाद नहीं दिया। पत्नी-पुत्री से दुख की आँधी आई। तब याद आया — कथा की सच्चाई।
पश्चाताप किया, फिर कथा करवाई। प्रसाद चढ़ाया, सत्यनारायण को मनाई। पुत्री और दामाद का कारागार छूटा। सत्य के सामने झूठ का बंधन टूटा।
॥ दोहा ॥
जो सत्यनारायण का, श्रद्धा से करे पूजन। मनोकामना पूर्ण हो, मिले सुख और मोक्षण॥
अर्थ
दोहा
जय सत्यनारायण प्रभु, सत्य सनातन रूप। जो सुने पढ़े यह कथा, मिटे दुःख का धूप॥
हे सत्यनारायण प्रभु, आप सनातन सत्यरूप हैं। जो इस कथा को पढ़े या सुने, उसके दुखों का नाश हो।
पद 1
एक बार नारद जी ने भगवान विष्णु से पूछा — हे प्रभु! मनुष्य के दुख और पाप का नाश किस उपाय से हो? विष्णु ने कहा — सत्यनारायण की कथा से। जो श्रद्धा से सुने, उसकी सब मनोकामना पूरी हो।
एक बार नारद जी ने विष्णु जी से पूछा — हे प्रभु, मनुष्य के दुख और पाप कैसे नष्ट हों? विष्णु ने कहा — सत्यनारायण कथा से; जो श्रद्धा से सुने, उसकी सब इच्छाएँ पूरी होती हैं।
पद 2
एक निर्धन ब्राह्मण नगर में भटकता था। भूखा-प्यासा, दुखी और चिंतित रहता था। स्वयं विष्णु वृद्ध रूप धरकर आए, कथा का व्रत लेने का मार्ग बताए।
एक गरीब ब्राह्मण नगर में भटकता था — भूखा, प्यासा और दुखी। स्वयं विष्णु जी वृद्ध का रूप धरकर आए और उसे सत्यनारायण व्रत-कथा का मार्ग बताया।
पद 3
ब्राह्मण ने व्रत किया, कथा सुनाई। प्रसाद बाँटा, परिवार में खुशहाली आई। संतान मिली, धन-धान्य भरपूर। सत्यनारायण की कृपा से सब दुख दूर।
ब्राह्मण ने व्रत किया, कथा सुनाई, प्रसाद बाँटा। परिवार में खुशहाली आई — संतान मिली, धन-धान्य से घर भर गया। सत्यनारायण की कृपा से सब दुख दूर हो गए।
पद 4
राजा उल्कामुख ने भी यह कथा सुनी। श्रद्धा से पूजा की, मनोकामना पूरी। लीलावती और कलावती को पुत्री मिली। सत्य के प्रताप से सब इच्छा पूरी।
राजा उल्कामुख ने भी कथा सुनी और श्रद्धापूर्वक पूजा की। लीलावती और कलावती को पुत्री की प्राप्ति हुई। सत्य के प्रताप से सभी इच्छाएँ पूरी हुईं।
पद 5
साधु वणिक ने व्रत का संकल्प लिया। पर घर लौटकर भूल गया, प्रसाद नहीं दिया। पत्नी-पुत्री से दुख की आँधी आई। तब याद आया — कथा की सच्चाई।
साधु वणिक ने व्रत का संकल्प लिया पर घर लौटकर भूल गया — प्रसाद नहीं चढ़ाया। परिणामस्वरूप पत्नी-पुत्री को कष्ट आया। तब उसे कथा की सच्चाई याद आई।
पद 6
पश्चाताप किया, फिर कथा करवाई। प्रसाद चढ़ाया, सत्यनारायण को मनाई। पुत्री और दामाद का कारागार छूटा। सत्य के सामने झूठ का बंधन टूटा।
उसने पश्चाताप किया, फिर से कथा करवाई और प्रसाद चढ़ाया। सत्यनारायण प्रसन्न हुए — पुत्री और दामाद का कारागार छूट गया। सत्य के सामने झूठ का बंधन टूट गया।
दोहा
जो सत्यनारायण का, श्रद्धा से करे पूजन। मनोकामना पूर्ण हो, मिले सुख और मोक्षण॥
जो श्रद्धा से सत्यनारायण जी का पूजन करे, उसकी मनोकामना पूर्ण हो और उसे सुख व मोक्ष की प्राप्ति हो।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सत्यनारायण पूजा कब करनी चाहिए?
पूर्णिमा (पूनम), संक्रांति, नए घर में प्रवेश (गृह प्रवेश), विवाह, जन्म, व्यापार की शुरुआत या किसी मनोकामना पूर्ण होने पर। गुरुवार और पूर्णिमा के दिन विशेष शुभ माने जाते हैं।
सत्यनारायण पूजा में क्या सामग्री चाहिए?
पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), पंजीरी या आटे का प्रसाद (आटा, घी, चीनी), केला, तुलसी, फूल, दीपक, अगरबत्ती, कलश, पीला कपड़ा और नारियल। पुजारी की उपस्थिति आवश्यक नहीं है।
क्या अविवाहित लोग सत्यनारायण कथा कर सकते हैं?
हाँ, अविवाहित लोग भी यह कथा कर सकते हैं। कोई प्रतिबंध नहीं है। परिवार के किसी भी सदस्य की ओर से या अकेले भी यह व्रत-कथा की जा सकती है। श्रद्धा और सच्चे मन से किया गया पूजन ही आवश्यक है।