विष्णु चालीसा — अर्थ सहित

विष्णु चालीसा भगवान विष्णु की चालीस चौपाइयों वाली लोकप्रिय स्तुति है। इसमें उनके राम, वराह, मत्स्य, कूर्म और मोहिनी जैसे रूपों और भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। भक्त इसे गुरुवार और एकादशी को विशेष रूप से पढ़ते हैं।

40 चौपाई · लगभग 7 मिनट

॥ दोहा ॥

विष्णु सुनिए विनय, सेवक की चितलाय। कीरत कुछ वर्णन करूँ, दीजै ज्ञान बताय॥

॥ चौपाई ॥

नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥

॥ चौपाई ॥

प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥

॥ चौपाई ॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥

॥ चौपाई ॥

तन पर पीताम्बर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत॥

॥ चौपाई ॥

शंख चक्र कर गदा बिराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥

॥ चौपाई ॥

सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥

॥ चौपाई ॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥

॥ चौपाई ॥

सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन॥

॥ चौपाई ॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥

॥ चौपाई ॥

करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण॥

॥ चौपाई ॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा॥

॥ चौपाई ॥

भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा॥

॥ चौपाई ॥

आप वराह रूप बनाया। हिरण्याक्ष को मार गिराया॥

॥ चौपाई ॥

धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया॥

॥ चौपाई ॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥

॥ चौपाई ॥

देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छवि से बहलाया॥

॥ चौपाई ॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया। मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया॥

॥ चौपाई ॥

शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया॥

॥ चौपाई ॥

वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबन्ध उन्हें ढुंढवाया॥

॥ चौपाई ॥

मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया॥

॥ चौपाई ॥

असुर जलन्धर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥

॥ चौपाई ॥

हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई॥

॥ चौपाई ॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी॥

॥ चौपाई ॥

तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥

॥ चौपाई ॥

देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥

॥ चौपाई ॥

हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी॥

॥ चौपाई ॥

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे॥

॥ चौपाई ॥

गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥

॥ चौपाई ॥

हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥

॥ चौपाई ॥

देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥

॥ चौपाई ॥

चहत आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥

॥ चौपाई ॥

जानूं नहीं योग्य जप पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥

॥ चौपाई ॥

शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥

॥ चौपाई ॥

करहुं आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण॥

॥ चौपाई ॥

करहुं प्रणाम कौन विधि सुमिरण। कौन भांति मैं करहु समर्पण॥

॥ चौपाई ॥

सुर मुनि करत सदा सेवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई॥

॥ चौपाई ॥

दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥

॥ चौपाई ॥

पाप दोष संताप नशाओ। भव बन्धन से मुक्त कराओ॥

॥ चौपाई ॥

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥

॥ चौपाई ॥

निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विष्णु चालीसा किस दिन पढ़नी चाहिए?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा से गुरुवार (बृहस्पतिवार) और एकादशी का दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए विशेष शुभ माना जाता है।

विष्णु चालीसा का पाठ कैसे करें?

सुबह या शाम स्नान के बाद भगवान विष्णु के चित्र के सामने दीपक जलाएँ, पीले फूल या तुलसी दल चढ़ाएँ और शांत मन से पाठ करें। अंत में आरती 'ॐ जय जगदीश हरे' गाई जा सकती है।

विष्णु चालीसा पढ़ने का क्या महत्व है?

भक्तों की मान्यता है कि इसके पाठ से मन शांत होता है, भक्ति बढ़ती है और जीवन में सुख-शांति आती है। चालीसा भगवान विष्णु के अवतारों और भक्तों पर उनकी कृपा को याद कराती है।

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