विन्ध्येश्वरी चालीसा — अर्थ सहित

विन्ध्येश्वरी चालीसा माँ विन्ध्यवासिनी की स्तुति है, जिनका प्रसिद्ध धाम उत्तर प्रदेश में मिर्ज़ापुर के पास विन्ध्याचल पर्वत पर है। इसमें देवी के अनेक नामों और रूपों का गुणगान है। नवरात्रि, शुक्रवार और अष्टमी को इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

38 चौपाई · लगभग 7 मिनट

॥ दोहा ॥

नमो नमो विन्ध्येश्वरी, नमो नमो जगदम्ब। सन्तजनों के काज में, करती नहीं विलम्ब॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय विन्ध्याचल रानी। आदि शक्ति जग विदित भवानी॥

॥ चौपाई ॥

सिंहवाहिनी जै जग माता। जै जै जै त्रिभुवन सुखदाता॥

॥ चौपाई ॥

कष्ट निवारिनि जै जग देवी। जै जै सन्त असुर सुर सेवी॥

॥ चौपाई ॥

महिमा अमित अपार तुम्हारी। शेष सहस मुख वर्णत हारी॥

॥ चौपाई ॥

दीनन के दुःख हरत भवानी। नहिं देख्यो तुम सम कोउ दानी॥

॥ चौपाई ॥

सब कर मनसा पुरवत माता। महिमा अमित जगत विख्याता॥

॥ चौपाई ॥

जो जन ध्यान तुम्हारो लावै। सो तुरतहि वांछित फल पावै॥

॥ चौपाई ॥

तुम्हीं वैष्णवी तुम्हीं रुद्रानी। तुम्हीं शारदा अरु ब्रह्मानी॥

॥ चौपाई ॥

रमा राधिका श्यामा काली। तुम्हीं मातु सन्तन प्रतिपाली॥

॥ चौपाई ॥

उमा माधवी चण्डी ज्वाला। बेगि मोहि पर होहु दयाला॥

॥ चौपाई ॥

तुम्हीं हिंगलाज महारानी। तुम्हीं शीतला अरु विज्ञानी॥

॥ चौपाई ॥

दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता। तुम्हीं लक्ष्मी जग सुख दाता॥

॥ चौपाई ॥

तुम्हीं जाह्नवी अरु रुद्रानी। हेमावती अम्ब निर्वानी॥

॥ चौपाई ॥

अष्टभुजी वाराहिनि देवी। करत विष्णु शिव जाकर सेवी॥

॥ चौपाई ॥

चौंसट्ठी देवी कल्यानी। गौरि मंगला सब गुन खानी॥

॥ चौपाई ॥

पाटन मुम्बा दन्त कुमारी। भद्रकालि सुनु विनय हमारी॥

॥ चौपाई ॥

वज्रधारिणी शोक नाशिनी। आयु रक्षिणी विन्ध्यवासिनी॥

॥ चौपाई ॥

जया और विजया बैताली। मातु सुगन्धा अरु विकराली॥

॥ चौपाई ॥

नाम अनन्त तुम्हार भवानी। बरनैं किमि मानुष अज्ञानी॥

॥ चौपाई ॥

जापर कृपा मातु तव होई। तो वह करै चहै मन जोई॥

॥ चौपाई ॥

कृपा करहु मो पर महारानी। सिद्ध करहु अम्बे मम बानी॥

॥ चौपाई ॥

जो नर धरै मातु कर ध्याना। ताकर सदा होय कल्याना॥

॥ चौपाई ॥

विपति ताहि सपनेहु नहिं आवै। जो देवी कर जाप करावै॥

॥ चौपाई ॥

जो नर कहँ ऋण होय अपारा। सो नर पाठ करै शत बारा॥

॥ चौपाई ॥

निश्चय ऋण मोचन होइ जाई। जो नर पाठ करै मन लाई॥

॥ चौपाई ॥

अस्तुति जो नर पढ़ै पढ़ावै। या जग में सो बहु सुख पावै॥

॥ चौपाई ॥

जाको व्याधि सतावै भाई। जाप करत सब दूरि पराई॥

॥ चौपाई ॥

जो नर अति बन्दी महँ होई। बार हजार पाठ करि सोई॥

॥ चौपाई ॥

निश्चय बन्दी ते छुटि जाई। सत्य बचन मम मानहु भाई॥

॥ चौपाई ॥

जापर जो कछु संकट होई। निश्चय देबिहि सुमिरै सोई॥

॥ चौपाई ॥

जा कहँ पुत्र होय नहिं भाई। सो नर या विधि करै उपाई॥

॥ चौपाई ॥

पाँच वर्ष सो पाठ करावै। नौरातर महँ विप्र जिमावै॥

॥ चौपाई ॥

निश्चय होहिं प्रसन्न भवानी। पुत्र देहिं ता कहँ गुन खानी॥

॥ चौपाई ॥

ध्वजा नारियल आनि चढ़ावै। विधि समेत पूजन करवावै॥

॥ चौपाई ॥

नित प्रति पाठ करै मन लाई। प्रेम सहित नहिं आन उपाई॥

॥ चौपाई ॥

यह श्री विन्ध्याचल चालीसा। रंक पढ़त होवै अवनीसा॥

॥ चौपाई ॥

यह जनि अचरज मानहु भाई। कृपा दृष्टि तापर होइ जाई॥

॥ चौपाई ॥

जै जै जै जग मातु भवानी। कृपा करहु मो पर जन जानी॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विन्ध्येश्वरी चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

इसे रोज़ सुबह या शाम पूजा के समय पढ़ सकते हैं। परंपरा से चैत्र और शारदीय नवरात्रि, शुक्रवार और अष्टमी तिथि पर इसका पाठ शुभ माना जाता है।

माँ विन्ध्येश्वरी कौन हैं?

माँ विन्ध्येश्वरी या विन्ध्यवासिनी आदिशक्ति दुर्गा का रूप हैं, जो विन्ध्य पर्वत पर निवास करती हैं। मिर्ज़ापुर के विन्ध्याचल धाम में उनका प्रसिद्ध शक्तिपीठ है।

चालीसा में सौ बार पाठ की बात क्यों है?

चालीसा में कहा गया है कि संकट में पड़ा व्यक्ति सौ बार पाठ करे। भक्त इसे एकाग्र भक्ति का संकल्प मानते हैं; एक बार भी मन से पढ़ना काफ़ी है।

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