वैष्णो देवी चालीसा — अर्थ सहित

वैष्णो देवी चालीसा जम्मू के त्रिकुटा पर्वत पर विराजमान माँ वैष्णो देवी की स्तुति है। इसमें माँ की तपस्या, भक्त श्रीधर का भंडारा, भैरों का पीछा, अर्धकुंवारी गुफा और पिंडी रूप की कथा है। अंतिम चौपाई में कवि 'शर्मा' का नाम आता है। नवरात्रि में इसका पाठ विशेष होता है।

40 चौपाई · लगभग 7 मिनट

॥ दोहा ॥

गरुड़ वाहिनी वैष्णवी, त्रिकुटा पर्वत धाम। काली, लक्ष्मी, सरस्वती, शक्ति तुम्हें प्रणाम॥

॥ चौपाई ॥

नमो नमो वैष्णो वरदानी। कलि काल में शुभ कल्याणी॥

॥ चौपाई ॥

मणि पर्वत पर ज्योति तुम्हारी। पिंडी रूप में हो अवतारी॥

॥ चौपाई ॥

देवी देवता अंश दियो है। रत्नाकर घर जन्म लियो है॥

॥ चौपाई ॥

करी तपस्या राम को पाऊँ। त्रेता की शक्ति कहलाऊँ॥

॥ चौपाई ॥

कहा राम मणि पर्वत जाओ। कलियुग की देवी कहलाओ॥

॥ चौपाई ॥

विष्णु रूप से कल्की बनकर। लूँगा शक्ति रूप बदलकर॥

॥ चौपाई ॥

तब तक त्रिकुटा घाटी जाओ। गुफा अंधेरी जाकर पाओ॥

॥ चौपाई ॥

काली-लक्ष्मी-सरस्वती माँ। करेंगी शोषण-पार्वती माँ॥

॥ चौपाई ॥

ब्रह्मा, विष्णु, शंकर द्वारे। हनुमत भैरों प्रहरी प्यारे॥

॥ चौपाई ॥

रिद्धि सिद्धि चँवर डुलावें। कलियुग-वासी पूजत आवें॥

॥ चौपाई ॥

पान सुपारी ध्वजा नारियल। चरणामृत चरणों का निर्मल॥

॥ चौपाई ॥

दिया फलित वर माँ मुस्काई। करन तपस्या पर्वत आई॥

॥ चौपाई ॥

कलि काल की भड़की ज्वाला। इक दिन अपना रूप निकाला॥

॥ चौपाई ॥

कन्या बन नगरोटा आई। योगी भैरों दिया दिखाई॥

॥ चौपाई ॥

रूप देख सुन्दर ललचाया। पीछे-पीछे भागा आया॥

॥ चौपाई ॥

कन्याओं के साथ मिली माँ। कौल-कंदौली तभी चली माँ॥

॥ चौपाई ॥

देवा माई दर्शन दीना। पवन रूप हो गई प्रवीणा॥

॥ चौपाई ॥

नवरात्रों में लीला रचाई। भक्त श्रीधर के घर आई॥

॥ चौपाई ॥

योगिन को भण्डारा दीना। सबने रुचिकर भोजन कीना॥

॥ चौपाई ॥

मांस, मदिरा भैरों माँगी। रूप पवन कर इच्छा त्यागी॥

॥ चौपाई ॥

बाण मारकर गंगा निकाली। पर्वत भागी हो मतवाली॥

॥ चौपाई ॥

चरण रखे आ एक शिला जब। चरण-पादुका नाम पड़ा तब॥

॥ चौपाई ॥

पीछे भैरों था बलकारी। छोटी गुफा में जाय पधारी॥

॥ चौपाई ॥

नौ माह तक किया निवासा। चली फोड़कर किया प्रकाशा॥

॥ चौपाई ॥

आद्या शक्ति-ब्रह्म कुमारी। कहलाई माँ आद कुँवारी॥

॥ चौपाई ॥

गुफा द्वार पहुँची मुस्काई। लांगुर वीर ने आज्ञा पाई॥

॥ चौपाई ॥

भागा-भागा भैरों आया। रक्षा हित निज शस्त्र चलाया॥

॥ चौपाई ॥

पड़ा शीश जा पर्वत ऊपर। किया क्षमा जा दिया उसे वर॥

॥ चौपाई ॥

अपने संग में पुजवाऊँगी। भैरों घाटी बनवाऊँगी॥

॥ चौपाई ॥

पहले मेरा दर्शन होगा। पीछे तेरा सुमिरन होगा॥

॥ चौपाई ॥

बैठ गई माँ पिण्डी होकर। चरणों में बहता जल झर-झर॥

॥ चौपाई ॥

चौंसठ योगिनी-भैरों बरवन। सप्तऋषि आ करते सुमिरन॥

॥ चौपाई ॥

घंटा ध्वनि पर्वत पर बाजे। गुफा निराली सुन्दर लागे॥

॥ चौपाई ॥

भक्त श्रीधर पूजन कीना। भक्ति सेवा का वर लीना॥

॥ चौपाई ॥

सेवक ध्यानूँ तुमको ध्याया। ध्वजा व चोला आन चढ़ाया॥

॥ चौपाई ॥

सिंह सदा दर पहरा देता। पंजा शेर का दुःख हर लेता॥

॥ चौपाई ॥

जम्बू द्वीप महाराज मनाया। सर सोने का छत्र चढ़ाया॥

॥ चौपाई ॥

हीरे की मूरत संग प्यारी। जगे अखंड इक जोत तुम्हारी॥

॥ चौपाई ॥

आश्विन चैत्र नवराते आऊँ। पिण्डी रानी दर्शन पाऊँ॥

॥ चौपाई ॥

सेवक 'शर्मा' शरण तिहारी। हरो वैष्णो विपत हमारी॥

॥ दोहा ॥

कलियुग में महिमा तेरी, है माँ अपरम्पार। धर्म की हानि हो रही, प्रगट हो अवतार॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वैष्णो देवी चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

इसे रोज़ पूजा में पढ़ सकते हैं। परंपरा से चैत्र और आश्विन नवरात्रि, अष्टमी, शुक्रवार और वैष्णो देवी यात्रा के समय इसका पाठ शुभ माना जाता है।

माँ वैष्णो देवी पिंडी रूप में क्यों हैं?

परंपरा के अनुसार भैरों का अंत करने के बाद माँ गुफा में तीन पिंडियों के रूप में स्थित हो गईं, जो महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का रूप मानी जाती हैं।

भैरों घाटी के दर्शन क्यों किए जाते हैं?

चालीसा के अनुसार माँ ने क्षमा माँगने पर भैरों को वर दिया कि पहले माँ के दर्शन होंगे और फिर उसका स्मरण होगा। इसलिए यात्री माँ के दर्शन के बाद भैरों घाटी जाते हैं।

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