शीतला माता चालीसा — अर्थ सहित

शीतला चालीसा माँ शीतला की स्तुति है, जिन्हें बच्चों की रक्षा करने वाली और शीतलता देने वाली देवी माना जाता है। हाथ में झाड़ू और कलश लिए, गधे पर सवार माँ की कथा इसमें है। चालीसा के अनुसार इसके कवि रामसुन्दर हैं। शीतला अष्टमी, शीतला सप्तमी और बसोड़ा पर इसका पाठ होता है।

39 चौपाई · लगभग 7 मिनट

॥ दोहा ॥

जय-जय माता शीतला, तुमहिं धरै जो ध्यान। होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुद्धि बल ज्ञान॥

॥ चौपाई ॥

जय-जय-जय शीतला भवानी। जय जग जननि सकल गुणखानी॥

॥ चौपाई ॥

गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित। पूरण शरदचन्द्र सम साजित॥

॥ चौपाई ॥

विस्फोटक से जलत शरीरा। शीतल करत हरत सब पीरा॥

॥ चौपाई ॥

मातु शीतला तव शुभनामा। सबके गाढ़े आवहिं कामा॥

॥ चौपाई ॥

शोकहरी शंकरी भवानी। बाल-प्राणरक्षी सुखदानी॥

॥ चौपाई ॥

शुचि मार्जनी कलश कर राजै। मस्तक तेज सूर्य सम राजै॥

॥ चौपाई ॥

चौंसठ योगिन संग में गावैं। वीणा ताल मृदंग बजावैं॥

॥ चौपाई ॥

नृत्य नाथ भैरौं दिखरावैं। सहज शेष शिव पार न पावैं॥

॥ चौपाई ॥

धन्य-धन्य धात्री महारानी। सुरनर मुनि तव सुयश बखानी॥

॥ चौपाई ॥

ज्वाला रूप महा बलकारी। दैत्य एक विस्फोटक भारी॥

॥ चौपाई ॥

घर-घर प्रविशत कोई न रक्षत। रोग रूप धरि बालक भक्षत॥

॥ चौपाई ॥

हाहाकार मच्यो जग भारी। सक्यो न जब संकट टारी॥

॥ चौपाई ॥

तब मैया धरि अद्भुत रूपा। कर में लिये मार्जनी सूपा॥

॥ चौपाई ॥

विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्ह्यो। मुसल प्रहार बहुविधि कीन्ह्यो॥

॥ चौपाई ॥

बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा। मैया नहीं भल मैं कछु चीन्हा॥

॥ चौपाई ॥

अबनहिं मातु, काहुगृह जइहौं। जहँ अपवित्र सकल दुःख हरिहौं॥

॥ चौपाई ॥

भभकत तन, शीतल ह्वै जइहैं। विस्फोटक भयघोर नसइहैं॥

॥ चौपाई ॥

श्री शीतलहिं भजे कल्याना। वचन सत्य भाषे भगवाना॥

॥ चौपाई ॥

विस्फोटक भय जिहि गृह भाई। भजै देवि कहँ यही उपाई॥

॥ चौपाई ॥

कलश शीतला का सजवावै। द्विज से विधिवत पाठ करावै॥

॥ चौपाई ॥

तुम्हीं शीतला, जग की माता। तुम्हीं पिता जग की सुखदाता॥

॥ चौपाई ॥

तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी। नमो नमामि शीतले देवी॥

॥ चौपाई ॥

नमो सुक्खकरणी दुःखहरणी। नमो-नमो जगतारणि तरणी॥

॥ चौपाई ॥

नमो-नमो त्रैलोक्य वन्दिनी। दुखदारिद्रादिक निकन्दिनी॥

॥ चौपाई ॥

श्री शीतला, शेढ़ला, महला। रुणलीह्युणनी मातु मंदला॥

॥ चौपाई ॥

हो तुम दिगम्बर तनुधारी। शोभित पंचनाम असवारी॥

॥ चौपाई ॥

रासभ, खर बैशाख सुनन्दन। गर्दभ दुर्वाकंद निकन्दन॥

॥ चौपाई ॥

सुमिरत संग शीतला माई। जाहि सकल दुख दूर पराई॥

॥ चौपाई ॥

गलका, गलगण्डादि जु होई। ताकर मंत्र न औषधि कोई॥

॥ चौपाई ॥

एक मातु जी का आराधन। और नहिं कोई है साधन॥

॥ चौपाई ॥

निश्चय मातु शरण जो आवै। निर्भय मन इच्छित फल पावै॥

॥ चौपाई ॥

कोढ़ी, निर्मल काया धारै। अन्धा, दृग निज दृष्टि निहारै॥

॥ चौपाई ॥

वन्ध्या नारि पुत्र को पावै। जन्म दरिद्र धनी होइ जावै॥

॥ चौपाई ॥

मातु शीतला के गुण गावत। लखा मूक को छन्द बनावत॥

॥ चौपाई ॥

यामे कोई करै जनि शंका। जग में मैया का ही डंका॥

॥ चौपाई ॥

भनत रामसुन्दर प्रभुदासा। तट प्रयाग से पूरब पासा॥

॥ चौपाई ॥

पुरी तिवारी मोर निवासा। ककरा गंगा तट दुर्वासा॥

॥ चौपाई ॥

अब विलम्ब मैं तोहि पुकारत। मातु कृपा कौ बाट निहारत॥

॥ चौपाई ॥

पड़ा द्वार तव आस लगाई। रक्षा करहु शीतला माई॥

॥ दोहा ॥

घट-घट वासी शीतला, शीतल प्रभा तुम्हार। शीतल छइयाँ में झुलई, मइया पलना डार॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शीतला चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

परंपरा से होली के बाद चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतला अष्टमी या बसोड़ा) और शीतला सप्तमी पर इसका पाठ होता है। कई भक्त हर सोमवार या शुक्रवार को भी पढ़ते हैं।

शीतला अष्टमी पर बासी भोजन क्यों चढ़ाते हैं?

माँ शीतला को ठंडक प्रिय है, इसलिए परंपरा में एक दिन पहले बना भोजन (बसोड़ा) चढ़ाया जाता है और उस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता।

माँ शीतला का वाहन और रूप कैसा है?

माँ शीतला गधे पर सवार रहती हैं और उनके हाथों में झाड़ू, सूप और जल का कलश होता है — ये स्वच्छता और शीतलता के प्रतीक माने जाते हैं। भक्त उनसे रक्षा की प्रार्थना करते हैं, और बीमारी में डॉक्टर की सलाह भी ज़रूरी है।

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