अन्नपूर्णा चालीसा — अर्थ सहित

अन्नपूर्णा चालीसा काशी की अधीश्वरी, अन्न देने वाली माँ अन्नपूर्णा की स्तुति है, जो माँ पार्वती का ही रूप हैं। इसमें सती के देह-त्याग, पार्वती के जन्म, उनकी कठोर तपस्या और शिव को पति रूप में पाने की कथा है। अन्नपूर्णा जयंती और शुक्रवार को इसका पाठ होता है।

40 चौपाई · लगभग 8 मिनट

॥ दोहा ॥

विश्वेश्वर पदपदम की, रज निज शीश लगाय। अन्नपूर्णे! तव सुयश, बरनौं कवि मतिलाय॥

॥ चौपाई ॥

नित्य आनन्द करिणी माता। वर अरु अभय भाव प्रख्याता॥

॥ चौपाई ॥

जय! सौंदर्य सिन्धु जग जननी। अखिल पाप हर भव-भय हरनी॥

॥ चौपाई ॥

श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि। सन्तन तुव पद सेवत ऋषिमुनि॥

॥ चौपाई ॥

काशी पुराधीश्वरी माता। माहेश्वरी सकल जग त्राता॥

॥ चौपाई ॥

वृषभारूढ़ नाम रुद्राणी। विश्व विहारिणि जय! कल्याणी॥

॥ चौपाई ॥

पतिदेवता सुतीत शिरोमणि। पदवी प्राप्त कीन्ह गिरि नंदिनि॥

॥ चौपाई ॥

पति विछोह दुख सहि नहिं पावा। योग अग्नि तब बदन जरावा॥

॥ चौपाई ॥

देह तजत शिव चरण सनेहू। राखेहु जात हिमगिरि गेहू॥

॥ चौपाई ॥

प्रकटी गिरिजा नाम धरायो। अति आनन्द भवन महँ छायो॥

॥ चौपाई ॥

नारद ने तब तोहिं भरमायहु। ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु॥

॥ चौपाई ॥

ब्रह्मा वरुण कुबेर गनाये। देवराज आदिक कहि गाये॥

॥ चौपाई ॥

सब देवन को सुजस बखानी। मति पलटन की मन महँ ठानी॥

॥ चौपाई ॥

अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या। कीन्ही सिद्ध हिमाचल कन्या॥

॥ चौपाई ॥

निज कौ तब नारद घबराये। तब प्रण पूरण मंत्र पढ़ाये॥

॥ चौपाई ॥

करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ। सन्त बचन तुम सत्य परेखेहु॥

॥ चौपाई ॥

गगनगिरा सुनि टरी न टारे। ब्रह्मा तब तुव पास पधारे॥

॥ चौपाई ॥

कहेउ पुत्रि वर माँगु अनूपा। देहुँ आज तुव मति अनुरूपा॥

॥ चौपाई ॥

तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी। कष्ट उठायहु अति सुकुमारी॥

॥ चौपाई ॥

अब संदेह छाँड़ि कछु मोसों। है सौगंध नहीं छल तोसों॥

॥ चौपाई ॥

करत वेद विद ब्रह्मा जानहु। वचन मोर यह साँचा मानहु॥

॥ चौपाई ॥

तजि संकोच कहहु निज इच्छा। देहौं मैं मनमानी भिक्षा॥

॥ चौपाई ॥

सुनि ब्रह्मा की मधुरी बानी। मुख सों कछु मुसुकाय भवानी॥

॥ चौपाई ॥

बोलीं तुम का कहहु विधाता। तुम तो जग के स्रष्टाधाता॥

॥ चौपाई ॥

मम कामना गुप्त नहिं तोंसों। कहवावा चाहहु का मोंसों॥

॥ चौपाई ॥

दक्ष यज्ञ महँ मरती बारा। शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा॥

॥ चौपाई ॥

सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये। कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये॥

॥ चौपाई ॥

तब गिरिजा शंकर तव भयऊ। फल कामना संशयो गयऊ॥

॥ चौपाई ॥

चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा। तव आनन महँ करत निवासा॥

॥ चौपाई ॥

माला पुस्तक अंकुश सोहै। कर महँ अपर पाश मन मोहै॥

॥ चौपाई ॥

अन्नपूर्णे! सदापूर्णे। अज अनवद्य अनन्त पूर्णे॥

॥ चौपाई ॥

कृपा सागरी क्षेमंकरि माँ। भव विभूति आनन्द भरी माँ॥

॥ चौपाई ॥

कमल विलोचन विलसित भाले। देवि कालिके चण्डि कराले॥

॥ चौपाई ॥

तुम कैलास माँहि ह्वै गिरिजा। विलसी आनन्द साथ सिन्धुजा॥

॥ चौपाई ॥

स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी। मर्त्य लोक लक्ष्मी पद पायी॥

॥ चौपाई ॥

विलसी सब महँ सर्व सरूपा। सेवत तोहिं अमर पुर भूपा॥

॥ चौपाई ॥

जो पढ़िहहिं यह तव चालीसा। फल पइहहिं शुभ साखी ईसा॥

॥ चौपाई ॥

प्रात समय जो जन मन लायो। पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अधिकायो॥

॥ चौपाई ॥

स्त्री कलत्र पति मित्र पुत्र युत। परमैश्वर्य लाभ लहि अद्भुत॥

॥ चौपाई ॥

राज विमुख को राज दिवावै। जस तेरो जन सुजस बढ़ावै॥

॥ चौपाई ॥

पाठ महा मुद मंगल दाता। भक्त मनोवांछित निधि पाता॥

॥ दोहा ॥

जो यह चालीसा सुभग, पढ़ि नावहिंगे माथ। तिनके कारज सिद्ध सब, साखी काशी नाथ॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अन्नपूर्णा चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

इसे रोज़ सुबह पढ़ सकते हैं, कई लोग रसोई में भोजन बनाने से पहले भी पढ़ते हैं। परंपरा से अन्नपूर्णा जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) और शुक्रवार विशेष शुभ माने जाते हैं।

माँ अन्नपूर्णा कौन हैं?

माँ अन्नपूर्णा माँ पार्वती का वह रूप हैं जो संसार को अन्न देती हैं। काशी में उनका प्रसिद्ध मंदिर है, और भक्त मानते हैं कि वे भगवान शिव को भी भिक्षा देती हैं।

इस चालीसा में कौन सी कथा है?

इसमें सती के योग-अग्नि में देह त्यागने, हिमालय के घर गिरिजा के रूप में जन्म, नारद की परीक्षा, कठोर तपस्या और ब्रह्मा जी से शिव को पाने के वर की कथा है।

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