जयति जय गायत्री माता आरती — अर्थ सहित
गायत्री माता को वेदों की माता और गायत्री मंत्र की देवी माना जाता है। यह आरती उन्हें आदिशक्ति, सावित्री, सरस्वती और लक्ष्मी — सबके रूप में पुकारती है और बुरे भाव मिटाकर सच्चे रास्ते पर चलाने की प्रार्थना करती है। गायत्री परिवार के यज्ञों और घर की उपासना में यह बहुत गाई जाती है।
जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता। सत् मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥
आदि शक्ति तुम अलख निरंजन, जग पालन कर्त्री। दुःख शोक भय क्लेश कलह, दारिद्र्य दैन्य हर्त्री॥
ब्रह्मरूपिणी प्रणत पालिनी, जगत धातृ अम्बे। भव भयहारी जन हितकारी, सुखदा जगदम्बे॥
भयहारिणी भवतारिणी अनघे, अज आनन्द राशी। अविकारी अघहरी अविचलित, अमले अविनाशी॥
कामधेनु सत चित आनन्दा, जय गंगा गीता। सविता की शाश्वती शक्ति, तुम सावित्री सीता॥
ऋग यजु साम अथर्व प्रणयिनी, प्रणव महामहिमे। कुण्डलिनी सहस्रार सुषुम्ना, शोभा गुण गरिमे॥
स्वाहा स्वधा शची ब्रह्माणी, राधा रुद्राणी। जय सतरूपा वाणी विद्या, कमला कल्याणी॥
जननी हम हैं दीन हीन, दुःख दारिद के घेरे। यदपि कुटिल कपटी कपूत, तऊ बालक हैं तेरे॥
स्नेहसनी करुणामयि माता, चरण शरण दीजै। बिलख रहे हम शिशु सुत तेरे, दया दृष्टि कीजै॥
काम क्रोध मद लोभ दम्भ, दुर्भाव द्वेष हरिये। शुद्ध बुद्धि निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये॥
तुम समर्थ सब भाँति तारिणी, तुष्टि पुष्टि त्राता। सत मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥
अर्थ
पद 1
जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता। सत् मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥
हे गायत्री माता, आपकी जय हो। हमें सच्चे रास्ते पर चलाइए, जो सुख देने वाला है।
पद 2
आदि शक्ति तुम अलख निरंजन, जग पालन कर्त्री। दुःख शोक भय क्लेश कलह, दारिद्र्य दैन्य हर्त्री॥
आप आदिशक्ति हैं, अदृश्य और निर्मल हैं, जगत का पालन करती हैं। आप दुख, शोक, भय, क्लेश, झगड़े, गरीबी और दीनता को हरती हैं।
पद 3
ब्रह्मरूपिणी प्रणत पालिनी, जगत धातृ अम्बे। भव भयहारी जन हितकारी, सुखदा जगदम्बे॥
हे अम्बे, आप ब्रह्म का रूप हैं, शरण में आए लोगों की रक्षक हैं और जगत को धारण करती हैं। हे जगदम्बे, आप संसार का भय हरती हैं, सबका भला करती हैं और सुख देती हैं।
पद 4
भयहारिणी भवतारिणी अनघे, अज आनन्द राशी। अविकारी अघहरी अविचलित, अमले अविनाशी॥
आप भय हरने वाली, संसार से पार लगाने वाली, निष्पाप, अजन्मा और आनंद का भंडार हैं। आप बिना विकार की, पाप हरने वाली, अटल, निर्मल और अविनाशी हैं।
पद 5
कामधेनु सत चित आनन्दा, जय गंगा गीता। सविता की शाश्वती शक्ति, तुम सावित्री सीता॥
आप कामधेनु हैं, सत्-चित्-आनंद हैं; आप ही गंगा और गीता हैं। आप सूर्य (सविता) की सनातन शक्ति हैं; आप ही सावित्री और सीता हैं।
पद 6
ऋग यजु साम अथर्व प्रणयिनी, प्रणव महामहिमे। कुण्डलिनी सहस्रार सुषुम्ना, शोभा गुण गरिमे॥
आप ऋग्, यजु, साम और अथर्व — चारों वेदों की जननी हैं, और ॐ (प्रणव) की महान महिमा हैं। आप कुंडलिनी, सहस्रार और सुषुम्ना की शोभा हैं, गुणों की गरिमा हैं।
पद 7
स्वाहा स्वधा शची ब्रह्माणी, राधा रुद्राणी। जय सतरूपा वाणी विद्या, कमला कल्याणी॥
आप ही स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा और रुद्राणी हैं। हे शतरूपा, वाणी, विद्या, कमला और कल्याण करने वाली, आपकी जय हो।
पद 8
जननी हम हैं दीन हीन, दुःख दारिद के घेरे। यदपि कुटिल कपटी कपूत, तऊ बालक हैं तेरे॥
हे माँ, हम दीन-हीन हैं और दुख-गरीबी से घिरे हैं। भले ही हम टेढ़े, कपटी और बुरे बेटे हैं, फिर भी हैं तो आपके ही बच्चे।
पद 9
स्नेहसनी करुणामयि माता, चरण शरण दीजै। बिलख रहे हम शिशु सुत तेरे, दया दृष्टि कीजै॥
हे स्नेह से भरी, करुणामयी माँ, हमें अपने चरणों की शरण दीजिए। आपके छोटे बच्चे बिलख रहे हैं, हम पर दया की नज़र कीजिए।
पद 10
काम क्रोध मद लोभ दम्भ, दुर्भाव द्वेष हरिये। शुद्ध बुद्धि निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये॥
हमारी कामना, क्रोध, घमंड, लालच, दिखावा, बुरे भाव और द्वेष हर लीजिए। हमें शुद्ध बुद्धि और पापरहित हृदय दीजिए, मन को पवित्र कीजिए।
पद 11
तुम समर्थ सब भाँति तारिणी, तुष्टि पुष्टि त्राता। सत मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥
आप हर तरह से समर्थ हैं, पार लगाने वाली हैं, संतोष और पोषण देने वाली रक्षक हैं। हमें सच्चे रास्ते पर चलाइए, जो सुख देने वाला है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गायत्री माता की आरती कब गाई जाती है?
रोज़ की संध्या-उपासना या गायत्री मंत्र जप के बाद, यज्ञ के अंत में, और गायत्री जयंती पर।
गायत्री माता कौन हैं?
गायत्री माता गायत्री मंत्र की देवी हैं और 'वेदमाता' कहलाती हैं। उन्हें सविता (सूर्य) की शक्ति माना जाता है।
इस आरती में क्या माँगा गया है?
धन या चमत्कार नहीं, बल्कि शुद्ध बुद्धि, पवित्र मन और सच्चे रास्ते पर चलने की शक्ति — यही इसकी मुख्य प्रार्थना है।