जय गणेश जय गणेश देवा — अर्थ सहित
हर शुभ काम की शुरुआत गणेश जी से होती है। बुधवार, गणेश चतुर्थी और हर पूजा की शुरुआत में यह आरती गाई जाती है।
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी। माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया। बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी। कामना को पूर्ण करो, जाऊं बिलहारी॥
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अर्थ
पद 1
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
हे गणेश देव, आपकी जय हो; आपकी माता पार्वती और पिता महादेव हैं।
पद 2
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी। माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
एक दाँत वाले, दयालु, चार भुजाओं वाले; माथे पर सिंदूर सजता है और चूहा आपकी सवारी है।
पद 3
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
आपको पान, फूल और मेवे चढ़ाए जाते हैं, लड्डुओं का भोग लगता है और संत आपकी सेवा करते हैं।
पद 4
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया। बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
आप अंधों को आँखें, रोगियों को स्वस्थ शरीर, निःसंतानों को संतान और निर्धनों को धन देते हैं।
पद 5
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी। कामना को पूर्ण करो, जाऊं बिलहारी॥
हे शिव-पुत्र, दीन-हीनों की लाज रखो और मेरी कामना पूर्ण करो — मैं आपका दास हूँ।
पद 6
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
सूरदास आपकी शरण में आए हैं — उनकी सेवा सफल कीजिए।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गणेश जी की आरती पहले क्यों की जाती है?
गणेश जी को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य माना जाता है, इसलिए हर शुभ काम और पूजा उन्हीं से शुरू होती है।
गणेश जी को कौन सा भोग प्रिय है?
मोदक और लड्डू, जैसा आरती में भी कहा गया है।