संपूर्ण सुंदरकांड पाठ — अर्थ सहित
सुंदरकांड गोस्वामी तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस का पाँचवाँ कांड है। इसमें हनुमान जी का समुद्र लाँघना, सीता जी से मिलना, लंका दहन, विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और समुद्र से मार्ग पाने की कथा है। भक्त इसका पाठ विशेषकर मंगलवार और शनिवार को करते हैं।
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्। रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्॥1॥
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥2॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥3॥
॥ चौपाई ॥
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
॥ चौपाई ॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
॥ चौपाई ॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
॥ चौपाई ॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥
॥ चौपाई ॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
॥ चौपाई ॥
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
॥ चौपाई ॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
॥ चौपाई ॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥
॥ चौपाई ॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥
॥ दोहा ॥
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥
॥ चौपाई ॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
॥ चौपाई ॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥
॥ चौपाई ॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
॥ चौपाई ॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥
॥ चौपाई ॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
॥ चौपाई ॥
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥
॥ चौपाई ॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
॥ चौपाई ॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥
॥ चौपाई ॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
॥ चौपाई ॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
॥ चौपाई ॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
॥ चौपाई ॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥
॥ दोहा ॥
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥2॥
॥ चौपाई ॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
॥ चौपाई ॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥
॥ चौपाई ॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
॥ चौपाई ॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥
॥ चौपाई ॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
॥ चौपाई ॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥
॥ चौपाई ॥
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
॥ चौपाई ॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥
॥ चौपाई ॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
॥ चौपाई ॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥
॥ चौपाई ॥
अति उतंग जलनिधि चहुँ पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥
॥ दोहा ॥
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार। अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥3॥
॥ चौपाई ॥
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
॥ चौपाई ॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
॥ चौपाई ॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
॥ चौपाई ॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥
॥ चौपाई ॥
पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
॥ चौपाई ॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥
॥ चौपाई ॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
॥ चौपाई ॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥
॥ दोहा ॥
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥4॥
॥ चौपाई ॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
॥ चौपाई ॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
॥ चौपाई ॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
॥ चौपाई ॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥
॥ चौपाई ॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
॥ चौपाई ॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥
॥ चौपाई ॥
सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
॥ चौपाई ॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥
॥ दोहा ॥
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ। नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥5॥
॥ चौपाई ॥
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
॥ चौपाई ॥
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥
॥ चौपाई ॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
॥ चौपाई ॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥
॥ चौपाई ॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
॥ चौपाई ॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥
॥ चौपाई ॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
॥ चौपाई ॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥
॥ दोहा ॥
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम। सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥6॥
॥ चौपाई ॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
॥ चौपाई ॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥
॥ चौपाई ॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
॥ चौपाई ॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥
॥ चौपाई ॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
॥ चौपाई ॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
॥ चौपाई ॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
॥ चौपाई ॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥
॥ दोहा ॥
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥7॥
॥ चौपाई ॥
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
॥ चौपाई ॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥
॥ चौपाई ॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
॥ चौपाई ॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥
॥ चौपाई ॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
॥ चौपाई ॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥
॥ चौपाई ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
॥ चौपाई ॥
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥
॥ दोहा ॥
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन। परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥8॥
॥ चौपाई ॥
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
॥ चौपाई ॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥
॥ चौपाई ॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
॥ चौपाई ॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥
॥ चौपाई ॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
॥ चौपाई ॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
॥ चौपाई ॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
॥ चौपाई ॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥
॥ चौपाई ॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥
॥ दोहा ॥
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥9॥
॥ चौपाई ॥
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
॥ चौपाई ॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥
॥ चौपाई ॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
॥ चौपाई ॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥
॥ चौपाई ॥
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
॥ चौपाई ॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥
॥ चौपाई ॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
॥ चौपाई ॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥
॥ चौपाई ॥
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥
॥ दोहा ॥
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद। सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥10॥
॥ चौपाई ॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
॥ चौपाई ॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥
॥ चौपाई ॥
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
॥ चौपाई ॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥
॥ चौपाई ॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
॥ चौपाई ॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥
॥ चौपाई ॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
॥ चौपाई ॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥
॥ दोहा ॥
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥11॥
॥ चौपाई ॥
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
॥ चौपाई ॥
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई॥
॥ चौपाई ॥
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
॥ चौपाई ॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥
॥ चौपाई ॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
॥ चौपाई ॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
॥ चौपाई ॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला॥
॥ चौपाई ॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥
॥ चौपाई ॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
॥ चौपाई ॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
॥ चौपाई ॥
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
॥ चौपाई ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥
॥ दोहा ॥
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब। जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ॥12॥
॥ चौपाई ॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
॥ चौपाई ॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥
॥ चौपाई ॥
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
॥ चौपाई ॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
॥ चौपाई ॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
॥ चौपाई ॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥
॥ चौपाई ॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥
॥ चौपाई ॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥
॥ चौपाई ॥
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
॥ चौपाई ॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥
॥ चौपाई ॥
नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥
॥ दोहा ॥
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास। जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥13॥
॥ चौपाई ॥
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
॥ चौपाई ॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥
॥ चौपाई ॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
॥ चौपाई ॥
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥
॥ चौपाई ॥
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
॥ चौपाई ॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥
॥ चौपाई ॥
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
॥ चौपाई ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥
॥ चौपाई ॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
॥ चौपाई ॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥
॥ दोहा ॥
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर। अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥14॥
॥ चौपाई ॥
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
॥ चौपाई ॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥
॥ चौपाई ॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
॥ चौपाई ॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥
॥ चौपाई ॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
॥ चौपाई ॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
॥ चौपाई ॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
॥ चौपाई ॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
॥ चौपाई ॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥
॥ दोहा ॥
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु। जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥15॥
॥ चौपाई ॥
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
॥ चौपाई ॥
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की॥
॥ चौपाई ॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
॥ चौपाई ॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥
॥ चौपाई ॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
॥ चौपाई ॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥
॥ चौपाई ॥
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा॥
॥ चौपाई ॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥
॥ चौपाई ॥
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥
॥ दोहा ॥
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥16॥
॥ चौपाई ॥
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
॥ चौपाई ॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥
॥ चौपाई ॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
॥ चौपाई ॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
॥ चौपाई ॥
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
॥ चौपाई ॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥
॥ चौपाई ॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
॥ चौपाई ॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥
॥ चौपाई ॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥
॥ दोहा ॥
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु। रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥17॥
॥ चौपाई ॥
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
॥ चौपाई ॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥
॥ चौपाई ॥
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
॥ चौपाई ॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥
॥ चौपाई ॥
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
॥ चौपाई ॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥
॥ चौपाई ॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
॥ चौपाई ॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥
॥ दोहा ॥
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि। कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥18॥
॥ चौपाई ॥
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
॥ चौपाई ॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥
॥ चौपाई ॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
॥ चौपाई ॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥
॥ चौपाई ॥
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
॥ चौपाई ॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥
॥ चौपाई ॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
॥ चौपाई ॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥
॥ चौपाई ॥
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥
॥ दोहा ॥
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार। जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥19॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
॥ चौपाई ॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥
॥ चौपाई ॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
॥ चौपाई ॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥
॥ चौपाई ॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
॥ चौपाई ॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥
॥ चौपाई ॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
॥ चौपाई ॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥
॥ दोहा ॥
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद। सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥20॥
॥ चौपाई ॥
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
॥ चौपाई ॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥
॥ चौपाई ॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
॥ चौपाई ॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥
॥ चौपाई ॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
॥ चौपाई ॥
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥
॥ चौपाई ॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता॥
॥ चौपाई ॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥
॥ चौपाई ॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥
॥ दोहा ॥
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥21॥
॥ चौपाई ॥
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥
॥ चौपाई ॥
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥
॥ चौपाई ॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
॥ चौपाई ॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥
॥ चौपाई ॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे॥
॥ चौपाई ॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
॥ चौपाई ॥
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
॥ चौपाई ॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥
॥ चौपाई ॥
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
॥ चौपाई ॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥
॥ दोहा ॥
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि। गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥22॥
॥ चौपाई ॥
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू॥
॥ चौपाई ॥
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥
॥ चौपाई ॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
॥ चौपाई ॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥
॥ चौपाई ॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
॥ चौपाई ॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं॥
॥ चौपाई ॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
॥ चौपाई ॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥
॥ दोहा ॥
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान। भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥23॥
॥ चौपाई ॥
जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
॥ चौपाई ॥
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥
॥ चौपाई ॥
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥
॥ चौपाई ॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥
॥ चौपाई ॥
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
॥ चौपाई ॥
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥
॥ चौपाई ॥
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
॥ चौपाई ॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥
॥ चौपाई ॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥
॥ दोहा ॥
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ। तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥24॥
॥ चौपाई ॥
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
॥ चौपाई ॥
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥
॥ चौपाई ॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
॥ चौपाई ॥
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥
॥ चौपाई ॥
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
॥ चौपाई ॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥
॥ चौपाई ॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
॥ चौपाई ॥
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघुरूप तुरंता॥
॥ चौपाई ॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भईं सभीत निसाचर नारीं॥
॥ दोहा ॥
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥25॥
॥ चौपाई ॥
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
॥ चौपाई ॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥
॥ चौपाई ॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
॥ चौपाई ॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥
॥ चौपाई ॥
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
॥ चौपाई ॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥
॥ चौपाई ॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
॥ चौपाई ॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥
॥ दोहा ॥
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि। जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥26॥
॥ चौपाई ॥
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
॥ चौपाई ॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥
॥ चौपाई ॥
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
॥ चौपाई ॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥
॥ चौपाई ॥
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
॥ चौपाई ॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥
॥ चौपाई ॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
॥ चौपाई ॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥
॥ दोहा ॥
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह। चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥27॥
॥ चौपाई ॥
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
॥ चौपाई ॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा॥
॥ चौपाई ॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
॥ चौपाई ॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥
॥ चौपाई ॥
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
॥ चौपाई ॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥
॥ चौपाई ॥
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
॥ चौपाई ॥
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥
॥ दोहा ॥
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज। सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥28॥
॥ चौपाई ॥
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
॥ चौपाई ॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥
॥ चौपाई ॥
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
॥ चौपाई ॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥
॥ चौपाई ॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
॥ चौपाई ॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥
॥ चौपाई ॥
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
॥ चौपाई ॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥
॥ दोहा ॥
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज। पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥29॥
॥ चौपाई ॥
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
॥ चौपाई ॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥
॥ चौपाई ॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥
॥ चौपाई ॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
॥ चौपाई ॥
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥
॥ चौपाई ॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
॥ चौपाई ॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥
॥ दोहा ॥
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥30॥
॥ चौपाई ॥
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
॥ चौपाई ॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥
॥ चौपाई ॥
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
॥ चौपाई ॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥
॥ चौपाई ॥
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
॥ चौपाई ॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥
॥ चौपाई ॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
॥ चौपाई ॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥
॥ चौपाई ॥
सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥
॥ दोहा ॥
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥31॥
॥ चौपाई ॥
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥
॥ चौपाई ॥
बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥
॥ चौपाई ॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
॥ चौपाई ॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥
॥ चौपाई ॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
॥ चौपाई ॥
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
॥ चौपाई ॥
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
॥ चौपाई ॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥
॥ दोहा ॥
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत। चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥32॥
॥ चौपाई ॥
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥
॥ चौपाई ॥
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
॥ चौपाई ॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥
॥ चौपाई ॥
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥
॥ चौपाई ॥
साखामृग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
॥ चौपाई ॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥
॥ चौपाई ॥
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥
॥ दोहा ॥
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल। तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥33॥
॥ चौपाई ॥
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
॥ चौपाई ॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥
॥ चौपाई ॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
॥ चौपाई ॥
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥
॥ चौपाई ॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
॥ चौपाई ॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥
॥ चौपाई ॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
॥ चौपाई ॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥
॥ दोहा ॥
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ। नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥34॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा॥
॥ चौपाई ॥
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥
॥ चौपाई ॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
॥ चौपाई ॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥
॥ चौपाई ॥
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥
॥ चौपाई ॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥
॥ चौपाई ॥
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥
॥ चौपाई ॥
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
॥ चौपाई ॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥ कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥1॥
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई। गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई॥ रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥2॥
॥ दोहा ॥
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर। जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥35॥
॥ चौपाई ॥
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका॥
॥ चौपाई ॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥
॥ चौपाई ॥
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
॥ चौपाई ॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥
॥ चौपाई ॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
॥ चौपाई ॥
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥
॥ चौपाई ॥
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥
॥ चौपाई ॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥
॥ चौपाई ॥
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
॥ चौपाई ॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥
॥ दोहा ॥
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक। जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥36॥
॥ चौपाई ॥
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
॥ चौपाई ॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥
॥ चौपाई ॥
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
॥ चौपाई ॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥
॥ चौपाई ॥
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
॥ चौपाई ॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥
॥ चौपाई ॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥
॥ चौपाई ॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥
॥ चौपाई ॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥
॥ दोहा ॥
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥37॥
॥ चौपाई ॥
सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
॥ चौपाई ॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥
॥ चौपाई ॥
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥
॥ चौपाई ॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥
॥ चौपाई ॥
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
॥ चौपाई ॥
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥
॥ चौपाई ॥
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
॥ चौपाई ॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥
॥ दोहा ॥
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ। सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥38॥
॥ चौपाई ॥
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥
॥ चौपाई ॥
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी॥
॥ चौपाई ॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥
॥ चौपाई ॥
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
॥ चौपाई ॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥
॥ चौपाई ॥
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
॥ चौपाई ॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥
॥ दोहा ॥
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस। परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥39(क)॥
॥ दोहा ॥
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात। तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥39(ख)॥
॥ चौपाई ॥
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
॥ चौपाई ॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥
॥ चौपाई ॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥
॥ चौपाई ॥
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥
॥ चौपाई ॥
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
॥ चौपाई ॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
॥ चौपाई ॥
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
॥ चौपाई ॥
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥
॥ दोहा ॥
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार। सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥40॥
॥ चौपाई ॥
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥
॥ चौपाई ॥
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥
॥ चौपाई ॥
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
॥ चौपाई ॥
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥
॥ चौपाई ॥
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
॥ चौपाई ॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥
॥ चौपाई ॥
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
॥ चौपाई ॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥
॥ चौपाई ॥
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥
॥ दोहा ॥
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥
॥ चौपाई ॥
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयू हीन भए सब तबहीं॥
॥ चौपाई ॥
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥
॥ चौपाई ॥
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
॥ चौपाई ॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥
॥ चौपाई ॥
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
॥ चौपाई ॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥
॥ चौपाई ॥
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
॥ चौपाई ॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥
॥ दोहा ॥
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ। ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥42॥
॥ चौपाई ॥
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥
॥ चौपाई ॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥
॥ चौपाई ॥
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
॥ चौपाई ॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥
॥ चौपाई ॥
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
॥ चौपाई ॥
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥
॥ चौपाई ॥
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
॥ चौपाई ॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥
॥ चौपाई ॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥
॥ दोहा ॥
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥43॥
॥ चौपाई ॥
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
॥ चौपाई ॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
॥ चौपाई ॥
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
॥ चौपाई ॥
जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥
॥ चौपाई ॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
॥ चौपाई ॥
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥
॥ चौपाई ॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
॥ चौपाई ॥
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई॥
॥ दोहा ॥
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत। जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत॥44॥
॥ चौपाई ॥
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
॥ चौपाई ॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥
॥ चौपाई ॥
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
॥ चौपाई ॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥
॥ चौपाई ॥
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
॥ चौपाई ॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥
॥ चौपाई ॥
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
॥ चौपाई ॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥
॥ दोहा ॥
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर। त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥45॥
॥ चौपाई ॥
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
॥ चौपाई ॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥
॥ चौपाई ॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥
॥ चौपाई ॥
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥
॥ चौपाई ॥
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
॥ चौपाई ॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥
॥ चौपाई ॥
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
॥ चौपाई ॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया॥
॥ दोहा ॥
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥
॥ चौपाई ॥
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
॥ चौपाई ॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥
॥ चौपाई ॥
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
॥ चौपाई ॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥
॥ चौपाई ॥
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
॥ चौपाई ॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥
॥ चौपाई ॥
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
॥ चौपाई ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥
॥ दोहा ॥
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज। देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥47॥
॥ चौपाई ॥
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
॥ चौपाई ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥
॥ चौपाई ॥
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
॥ चौपाई ॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥
॥ चौपाई ॥
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
॥ चौपाई ॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥
॥ चौपाई ॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
॥ चौपाई ॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥
॥ दोहा ॥
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥48॥
॥ चौपाई ॥
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
॥ चौपाई ॥
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥
॥ चौपाई ॥
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
॥ चौपाई ॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥
॥ चौपाई ॥
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
॥ चौपाई ॥
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥
॥ चौपाई ॥
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
॥ चौपाई ॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥
॥ चौपाई ॥
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
॥ चौपाई ॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥
॥ दोहा ॥
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड॥49(क)॥
॥ दोहा ॥
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ॥49(ख)॥
॥ चौपाई ॥
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
॥ चौपाई ॥
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥
॥ चौपाई ॥
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
॥ चौपाई ॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥
॥ चौपाई ॥
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
॥ चौपाई ॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥
॥ चौपाई ॥
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
॥ चौपाई ॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥
॥ दोहा ॥
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥50॥
॥ चौपाई ॥
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
॥ चौपाई ॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥
॥ चौपाई ॥
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
॥ चौपाई ॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥
॥ चौपाई ॥
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
॥ चौपाई ॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥
॥ चौपाई ॥
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
॥ चौपाई ॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥
॥ दोहा ॥
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥51॥
॥ चौपाई ॥
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
॥ चौपाई ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥
॥ चौपाई ॥
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
॥ चौपाई ॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहुँ पास फिराए॥
॥ चौपाई ॥
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
॥ चौपाई ॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥
॥ चौपाई ॥
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
॥ चौपाई ॥
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥
॥ दोहा ॥
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार। सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार॥52॥
॥ चौपाई ॥
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
॥ चौपाई ॥
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥
॥ चौपाई ॥
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
॥ चौपाई ॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥
॥ चौपाई ॥
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी॥
॥ चौपाई ॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥
॥ चौपाई ॥
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
॥ चौपाई ॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥
॥ दोहा ॥
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर। कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥53॥
॥ चौपाई ॥
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
॥ चौपाई ॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥
॥ चौपाई ॥
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥
॥ चौपाई ॥
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे॥
॥ चौपाई ॥
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
॥ चौपाई ॥
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥
॥ चौपाई ॥
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
॥ चौपाई ॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥
॥ दोहा ॥
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि। दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥54॥
॥ चौपाई ॥
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
॥ चौपाई ॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं॥
॥ चौपाई ॥
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
॥ चौपाई ॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥
॥ चौपाई ॥
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
॥ चौपाई ॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥
॥ चौपाई ॥
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
॥ चौपाई ॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥
॥ दोहा ॥
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥55॥
॥ चौपाई ॥
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
॥ चौपाई ॥
सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥
॥ चौपाई ॥
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
॥ चौपाई ॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥
॥ चौपाई ॥
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥
॥ चौपाई ॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥
॥ चौपाई ॥
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥
॥ चौपाई ॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥
॥ चौपाई ॥
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
॥ चौपाई ॥
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥
॥ दोहा ॥
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥56(क)॥
॥ दोहा ॥
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥56(ख)॥
॥ चौपाई ॥
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
॥ चौपाई ॥
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥
॥ चौपाई ॥
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
॥ चौपाई ॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥
॥ चौपाई ॥
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
॥ चौपाई ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥
॥ चौपाई ॥
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
॥ चौपाई ॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥
॥ चौपाई ॥
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
॥ चौपाई ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥
॥ चौपाई ॥
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
॥ चौपाई ॥
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥
॥ दोहा ॥
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥
॥ चौपाई ॥
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥
॥ चौपाई ॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥
॥ चौपाई ॥
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
॥ चौपाई ॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
॥ चौपाई ॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
॥ चौपाई ॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥
॥ चौपाई ॥
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
॥ चौपाई ॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥
॥ दोहा ॥
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच। बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥58॥
॥ चौपाई ॥
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
॥ चौपाई ॥
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥
॥ चौपाई ॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
॥ चौपाई ॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥
॥ दोहा ॥
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ। जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥59॥
॥ चौपाई ॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई॥
॥ चौपाई ॥
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥
॥ चौपाई ॥
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
॥ चौपाई ॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥
॥ चौपाई ॥
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
॥ चौपाई ॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥
॥ चौपाई ॥
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
॥ चौपाई ॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ। यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना। तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
॥ दोहा ॥
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥60॥
अर्थ
पद 1
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्। रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्॥1॥
मैं उन श्रीराम को प्रणाम करता हूँ जो शांत, सनातन, प्रमाणों से परे और पाप-रहित हैं, जिन्हें ब्रह्मा, शिव और शेषनाग पूजते हैं और वेदांत से जाना जाता है। वे माया से मनुष्य रूप धारण करने वाले हरि, करुणा की खान और राजाओं के मुकुटमणि हैं।
पद 2
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥2॥
हे रघुनाथ, मैं सच कहता हूँ, मेरे हृदय में कोई दूसरी इच्छा नहीं है, और आप सबके अंतर्यामी हैं। हे रघुकुल-श्रेष्ठ, मुझे अपनी पूर्ण भक्ति दीजिए और मेरे मन को काम आदि दोषों से मुक्त कर दीजिए।
पद 3
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥3॥
मैं पवनपुत्र हनुमान को नमन करता हूँ — जो अतुलनीय बल के धाम हैं, सोने के पर्वत जैसे तेजस्वी शरीर वाले, राक्षस-रूपी वन के लिए आग और ज्ञानियों में सबसे आगे हैं। वे सभी गुणों के भंडार, वानरों के स्वामी और श्रीराम के प्रिय भक्त हैं।
चौपाई 1
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
जाम्बवान के सुंदर वचन सुनकर हनुमान जी के मन को वे बहुत अच्छे लगे।
चौपाई 2
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
हनुमान जी बोले — भाइयो, तब तक तुम लोग कंद-मूल-फल खाकर और कष्ट सहकर मेरी प्रतीक्षा करना।
चौपाई 3
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
जब तक मैं सीता जी को देखकर लौट न आऊँ। काम ज़रूर होगा, क्योंकि मेरे मन में बहुत उत्साह है।
चौपाई 4
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥
यह कहकर उन्होंने सबको सिर झुकाकर प्रणाम किया और हृदय में श्रीराम को बसाकर खुशी से चल पड़े।
चौपाई 5
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
समुद्र के किनारे एक सुंदर पर्वत था। हनुमान जी खेल-खेल में कूदकर उस पर चढ़ गए।
चौपाई 6
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
बार-बार श्रीराम का स्मरण करके पवनपुत्र ने पूरे बल से छलाँग लगाई।
चौपाई 7
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
हनुमान जी ने जिस पर्वत पर पैर रखा था, वह तुरंत पाताल में धँस गया।
चौपाई 8
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥
जैसे श्रीराम का अचूक बाण चलता है, वैसे ही हनुमान जी आकाश में तेज़ी से चले।
चौपाई 9
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥
समुद्र ने उन्हें श्रीराम का दूत जानकर मैनाक पर्वत से कहा — तुम उठकर इनकी थकान दूर करो।
दोहा
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥
हनुमान जी ने मैनाक को हाथ से छूकर प्रणाम किया और कहा — श्रीराम का काम पूरा किए बिना मुझे विश्राम कहाँ!
चौपाई 10
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
देवताओं ने पवनपुत्र को जाते देखा। उनके विशेष बल और बुद्धि को परखने के लिए—
चौपाई 11
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥
उन्होंने नागों की माता सुरसा को भेजा। उसने आकर हनुमान जी से यह बात कही—
चौपाई 12
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। यह सुनकर पवनकुमार बोले—
चौपाई 13
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥
मैं श्रीराम का काम करके और सीता जी का समाचार प्रभु को सुनाकर लौट आऊँ—
चौपाई 14
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
तब मैं स्वयं आकर तुम्हारे मुँह में प्रवेश कर लूँगा। माता, मैं सच कहता हूँ, अभी मुझे जाने दो।
चौपाई 15
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥
जब किसी भी तरह सुरसा ने जाने नहीं दिया, तो हनुमान जी बोले — तो फिर मुझे खा क्यों नहीं लेती?
चौपाई 16
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सुरसा ने एक योजन तक मुँह फैलाया, तो हनुमान जी ने अपना शरीर उससे दुगुना कर लिया।
चौपाई 17
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥
उसने सोलह योजन का मुँह किया, तो पवनपुत्र तुरंत बत्तीस योजन के हो गए।
चौपाई 18
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
सुरसा जितना-जितना मुँह बढ़ाती, हनुमान जी उससे दुगुना रूप दिखाते।
चौपाई 19
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
जब उसने सौ योजन का मुँह किया, तब पवनपुत्र ने बहुत छोटा रूप धारण कर लिया।
चौपाई 20
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
वे उसके मुँह में जाकर तुरंत बाहर आ गए और सिर झुकाकर उससे विदा माँगी।
चौपाई 21
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥
सुरसा बोली — देवताओं ने मुझे जिस काम के लिए भेजा था, मैंने तुम्हारी बुद्धि और बल का भेद पा लिया।
दोहा
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥2॥
तुम बल और बुद्धि के भंडार हो, श्रीराम का सारा काम पूरा करोगे — यह आशीर्वाद देकर वह चली गई और हनुमान जी प्रसन्न होकर आगे बढ़े।
चौपाई 22
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
समुद्र में एक राक्षसी रहती थी, जो माया से आकाश में उड़ते पक्षियों को पकड़ लेती थी।
चौपाई 23
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥
आकाश में जो जीव-जंतु उड़ते, वह पानी में उनकी परछाईं देखती थी।
चौपाई 24
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
वह परछाईं पकड़ लेती, जिससे वे उड़ नहीं पाते थे। इस तरह वह आकाश में उड़ने वालों को खाती रहती थी।
चौपाई 25
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥
उसने वही छल हनुमान जी के साथ किया, पर हनुमान जी ने उसका कपट तुरंत पहचान लिया।
चौपाई 26
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
धीर बुद्धि वाले वीर पवनपुत्र उसे मारकर समुद्र के पार चले गए।
चौपाई 27
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने वन की शोभा देखी, जहाँ भौंरे मधु के लोभ में गुंजार कर रहे थे।
चौपाई 28
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
तरह-तरह के पेड़ फल-फूलों से सुंदर लग रहे थे, और पक्षियों व पशुओं के झुंड देखकर मन प्रसन्न हो गया।
चौपाई 29
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥
सामने एक बड़ा पर्वत देखकर वे निडर होकर दौड़कर उस पर चढ़ गए।
चौपाई 30
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
(शिव जी कहते हैं) हे उमा, इसमें वानर की कोई बड़ाई नहीं है; यह प्रभु का प्रताप है, जो काल को भी खा जाता है।
चौपाई 31
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥
पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका देखी। वह इतना विशाल किला था कि उसका वर्णन नहीं हो सकता।
चौपाई 32
अति उतंग जलनिधि चहुँ पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥
वह बहुत ऊँची थी, चारों ओर समुद्र था, और सोने के परकोटे का बड़ा प्रकाश फैल रहा था।
पद 4
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥
सोने का परकोटा रंग-बिरंगी मणियों से जड़ा था, अंदर बहुत से सुंदर भवन, चौराहे, बाज़ार और गलियाँ थीं। हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल और रथों के झुंड अनगिनत थे, और बहुरूपी बलवान राक्षसों की सेना का वर्णन नहीं हो सकता।
पद 5
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥
वन, बाग, उपवन, फुलवारियाँ, तालाब, कुएँ और बावड़ियाँ सुशोभित थीं; मनुष्य, नाग, देवता और गंधर्वों की कन्याएँ अपने रूप से मुनियों का मन भी मोह लेती थीं। कहीं पर्वत जैसे विशाल शरीर वाले पहलवान गरजते थे और अखाड़ों में आपस में भिड़ते और ललकारते थे।
पद 6
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥
करोड़ों भयानक योद्धा सावधानी से नगर की चारों दिशाओं में पहरा देते थे, और कहीं दुष्ट राक्षस भैंसे, मनुष्य, गाय, गधे और बकरे खा रहे थे। तुलसीदास जी कहते हैं कि इनकी थोड़ी-सी कथा इसलिए कही है कि ये श्रीराम के बाण-रूपी तीर्थ में शरीर छोड़कर निश्चय ही सद्गति पाएँगे।
दोहा
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार। अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥3॥
नगर के बहुत से पहरेदारों को देखकर हनुमान जी ने सोचा कि बहुत छोटा रूप धरकर रात में नगर में प्रवेश करूँ।
चौपाई 33
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
हनुमान जी मच्छर जितना छोटा रूप धरकर, नरसिंह रूपी भगवान का स्मरण करके लंका की ओर चले।
चौपाई 34
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
लंकिनी नाम की एक राक्षसी (नगर की रक्षिका) थी। वह बोली — मेरा अनादर करके कहाँ चला जा रहा है?
चौपाई 35
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
अरे मूर्ख, तूने मेरा भेद नहीं जाना? जितने भी चोर यहाँ आते हैं, सब मेरा भोजन हैं।
चौपाई 36
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥
महाकपि हनुमान ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून उगलती हुई धरती पर लुढ़क गई।
चौपाई 37
पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
फिर वह लंकिनी सँभलकर उठी और डरते हुए हाथ जोड़कर विनती करने लगी।
चौपाई 38
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥
जब ब्रह्मा जी ने रावण को वरदान दिया था, तब जाते समय उन्होंने मुझे एक पहचान बताई थी—
चौपाई 39
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
जब तू किसी वानर के मारने से व्याकुल हो जाए, तब समझ लेना कि राक्षसों का विनाश निकट है।
चौपाई 40
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥
हे तात, मेरे बहुत पुण्य हैं कि मैंने अपनी आँखों से श्रीराम के दूत को देखा।
दोहा
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥4॥
हे तात, स्वर्ग और मोक्ष के सारे सुख तराज़ू के एक पलड़े में रख दें, तो भी वे सब मिलकर उस सुख के बराबर नहीं होते जो पल भर के सत्संग से मिलता है।
चौपाई 41
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
अयोध्या के राजा श्रीराम को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश कीजिए और सारे काम कीजिए।
चौपाई 42
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
जिस पर श्रीराम कृपा-दृष्टि डालते हैं, उसके लिए विष अमृत बन जाता है, शत्रु मित्र हो जाते हैं, समुद्र गाय के खुर जितना छोटा और आग ठंडी हो जाती है।
चौपाई 43
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
और उसके लिए सुमेरु पर्वत धूल के कण जैसा हो जाता है — ऐसे व्यक्ति पर राम कृपा करके देखते हैं।
चौपाई 44
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥
हनुमान जी ने बहुत छोटा रूप धारण किया और भगवान का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया।
चौपाई 45
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
उन्होंने एक-एक महल में खोज की और जगह-जगह अनगिनत योद्धा देखे।
चौपाई 46
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥
फिर वे रावण के महल में गए, जो इतना अद्भुत था कि उसका वर्णन नहीं हो सकता।
चौपाई 47
सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
हनुमान जी ने रावण को सोते हुए देखा, पर उस महल में सीता जी दिखाई नहीं दीं।
चौपाई 48
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥
फिर उन्होंने एक सुंदर भवन देखा, जिसमें भगवान का एक अलग मंदिर बना था।
दोहा
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ। नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥5॥
वह घर श्रीराम के आयुधों (धनुष-बाण) के चिह्नों से सजा था, जिसकी शोभा का वर्णन नहीं हो सकता। वहाँ तुलसी के नए पौधों के झुंड देखकर कपिराज हनुमान प्रसन्न हुए।
चौपाई 49
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
लंका तो राक्षसों के समूह का निवास है; यहाँ किसी सज्जन का घर कहाँ से आया?
चौपाई 50
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥
हनुमान जी मन में ऐसा सोच ही रहे थे कि उसी समय विभीषण जागे।
चौपाई 51
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
उन्होंने 'राम-राम' का स्मरण किया। यह सुनकर हनुमान जी को खुशी हुई कि यह कोई सज्जन है।
चौपाई 52
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥
हनुमान जी ने सोचा — इनसे ज़रूर परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से काम की हानि नहीं होती।
चौपाई 53
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
ब्राह्मण का रूप धरकर उन्होंने वचन सुनाए, जिन्हें सुनकर विभीषण उठकर वहाँ आए।
चौपाई 54
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥
विभीषण ने प्रणाम करके कुशल पूछी और कहा — हे ब्राह्मण, अपनी कथा समझाकर कहिए।
चौपाई 55
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
क्या आप भगवान के भक्तों में से कोई हैं? आपको देखकर मेरे मन में बहुत प्रेम उमड़ रहा है।
चौपाई 56
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥
या आप स्वयं दीनों से प्रेम करने वाले श्रीराम हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने आए हैं?
दोहा
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम। सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥6॥
तब हनुमान जी ने श्रीराम की सारी कथा और अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए और श्रीराम के गुणों को याद करके मन आनंद में डूब गए।
चौपाई 57
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
विभीषण बोले — हे पवनपुत्र, मेरी यहाँ की हालत सुनो; मैं वैसे ही रहता हूँ जैसे दाँतों के बीच बेचारी जीभ।
चौपाई 58
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥
हे तात, क्या कभी सूर्यवंश के स्वामी श्रीराम मुझे अनाथ जानकर मुझ पर कृपा करेंगे?
चौपाई 59
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
मेरा शरीर राक्षस का है, मेरे पास कोई साधना नहीं है, और मन में प्रभु के चरण-कमलों का प्रेम भी नहीं है।
चौपाई 60
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥
पर हे हनुमान, अब मुझे भरोसा हो गया है, क्योंकि भगवान की कृपा के बिना संत नहीं मिलते।
चौपाई 61
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
श्रीराम ने मुझ पर कृपा की है, तभी आपने स्वयं आकर मुझे दर्शन दिए हैं।
चौपाई 62
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
हनुमान जी बोले — हे विभीषण, प्रभु की रीति सुनो; वे अपने सेवक से सदा प्रेम करते हैं।
चौपाई 63
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
बताइए, मैं ही कौन बड़े कुल का हूँ? मैं तो चंचल वानर हूँ और हर तरह से हीन हूँ।
चौपाई 64
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥
लोग कहते हैं कि सुबह-सुबह जो हमारा (वानरों का) नाम ले ले, उसे उस दिन भोजन नहीं मिलता।
दोहा
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥7॥
हे मित्र, सुनो — मैं ऐसा अधम हूँ, फिर भी श्रीराम ने मुझ पर कृपा की है। प्रभु के गुण याद करते ही हनुमान जी की आँखों में आँसू भर आए।
चौपाई 65
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
ऐसे स्वामी को जानते हुए भी जो उन्हें भुलाकर भटकते हैं, वे दुखी क्यों न हों?
चौपाई 66
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥
इस तरह श्रीराम के गुणों की चर्चा करते हुए दोनों ने ऐसी शांति पाई जो शब्दों में नहीं कही जा सकती।
चौपाई 67
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
फिर विभीषण ने वह सारी कथा कही कि जनकनंदिनी सीता वहाँ किस तरह रह रही थीं।
चौपाई 68
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥
तब हनुमान जी बोले — भाई, सुनो, मैं माता जानकी के दर्शन करना चाहता हूँ।
चौपाई 69
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
विभीषण ने सारी युक्ति बताई, और पवनपुत्र उनसे विदा लेकर चल पड़े।
चौपाई 70
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥
वही (छोटा) रूप धरकर वे वहाँ गए, जहाँ अशोक वन में सीता जी रहती थीं।
चौपाई 71
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
सीता जी को देखकर उन्होंने मन ही मन प्रणाम किया। सीता जी को बैठे-बैठे ही रात के पहर बीत जाते थे।
चौपाई 72
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥
उनका शरीर दुबला था, सिर पर बालों की एक ही चोटी जटा बन गई थी, और वे मन में श्रीराम के गुणों का जाप कर रही थीं।
दोहा
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन। परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥8॥
उनकी आँखें अपने पैरों पर टिकी थीं और मन श्रीराम के चरण-कमलों में लीन था। जानकी जी को इतना दुखी देखकर पवनपुत्र बहुत दुखी हुए।
चौपाई 73
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
हनुमान जी पेड़ के पत्तों में छिपे रहे और सोचने लगे — अब क्या करूँ?
चौपाई 74
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥
उसी समय रावण बहुत-सी स्त्रियों को साथ लेकर, सज-धजकर वहाँ आया।
चौपाई 75
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
उस दुष्ट ने सीता जी को कई तरह से समझाया और साम, दान, भय और भेद — सब दिखाए।
चौपाई 76
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥
रावण बोला — हे सुंदरी, सुनो, मंदोदरी आदि सब रानियों को—
चौपाई 77
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है; बस एक बार मेरी ओर देख लो।
चौपाई 78
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
सीता जी ने अपने परम प्रिय अवधपति श्रीराम को याद करके, एक तिनके की ओट करके कहा—
चौपाई 79
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
हे दशमुख, सुन — क्या जुगनू की रोशनी से कभी कमल खिल सकता है?
चौपाई 80
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥
जानकी जी कहती हैं — अपने मन में यह समझ ले; अरे दुष्ट, तुझे श्रीराम के बाणों की ख़बर नहीं है।
चौपाई 81
सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥
अरे दुष्ट, तू मुझे सूने में चुराकर ले आया। अधम, निर्लज्ज, तुझे शर्म नहीं आती?
दोहा
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥9॥
अपने को जुगनू के समान और श्रीराम को सूर्य के समान सुनकर, और ऐसे कठोर वचन सुनकर रावण तलवार निकालकर बहुत क्रोध में बोला।
चौपाई 82
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
सीता, तूने मेरा अपमान किया है; मैं इस कठोर तलवार से तेरा सिर काट दूँगा।
चौपाई 83
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥
नहीं तो जल्दी मेरी बात मान ले; हे सुमुखी, नहीं तो तेरे प्राण जाएँगे।
चौपाई 84
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सीता जी बोलीं — हे दशकंधर, प्रभु की भुजा नीले कमलों की माला जैसी सुंदर और हाथी की सूँड़ जैसी है।
चौपाई 85
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥
या तो वह भुजा मेरे गले में होगी या तेरी भयानक तलवार। अरे दुष्ट, सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है।
चौपाई 86
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
हे चंद्रहास (तलवार), श्रीराम के विरह की आग से उपजे मेरे दुख को हर ले।
चौपाई 87
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥
तेरी धार ठंडी, तेज़ और उत्तम है — सीता जी कहती हैं, मेरे भारी दुख को हर ले।
चौपाई 88
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
यह सुनकर रावण फिर उन्हें मारने दौड़ा, तब मय दानव की बेटी मंदोदरी ने नीति की बात कहकर उसे समझाया।
चौपाई 89
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥
फिर रावण ने सब राक्षसियों को बुलाकर कहा — जाओ, सीता को तरह-तरह से डराओ।
चौपाई 90
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥
अगर एक महीने में इसने मेरा कहना न माना, तो मैं तलवार निकालकर इसे मार डालूँगा।
दोहा
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद। सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥10॥
यह कहकर रावण महल चला गया। इधर राक्षसियों का झुंड बुरे-बुरे रूप धरकर सीता जी को डराने लगा।
चौपाई 91
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
उनमें त्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी, जो श्रीराम के चरणों की भक्त और बहुत समझदार थी।
चौपाई 92
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥
उसने सबको बुलाकर अपना सपना सुनाया और कहा — सीता जी की सेवा करके अपना भला कर लो।
चौपाई 93
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
सपने में एक वानर ने लंका जला दी और राक्षसों की सारी सेना मार डाली।
चौपाई 94
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥
रावण नंगा होकर गधे पर बैठा था, उसका सिर मुँड़ा हुआ था और बीसों भुजाएँ कटी हुई थीं।
चौपाई 95
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
इस तरह वह दक्षिण दिशा (यमलोक) की ओर जा रहा था, और लंका मानो विभीषण को मिल गई।
चौपाई 96
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥
नगर में श्रीराम की जय-जयकार फिर गई, तब प्रभु ने सीता जी को बुला भेजा।
चौपाई 97
यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
मैं यह सपना पुकारकर कहती हूँ कि यह कुछ ही दिनों में सच होगा।
चौपाई 98
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥
उसकी बात सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गईं और जनकनंदिनी के चरणों पर गिर पड़ीं।
दोहा
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥11॥
फिर वे सब इधर-उधर चली गईं। सीता जी मन में सोचने लगीं कि एक महीना बीतने पर यह नीच राक्षस मुझे मार डालेगा।
चौपाई 99
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
सीता जी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोलीं — माता, तुम ही मेरी विपत्ति की साथी हो।
चौपाई 100
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई॥
जल्दी कोई उपाय करो कि मैं यह शरीर छोड़ दूँ; यह असहनीय विरह अब सहा नहीं जाता।
चौपाई 101
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
लकड़ियाँ लाकर चिता बना दो, माता, और फिर उसमें आग लगा दो।
चौपाई 102
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥
हे सयानी, मेरे प्रेम को सच्चा कर दो। रावण की काँटे जैसी चुभने वाली बातें कौन कानों से सुने?
चौपाई 103
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
यह सुनकर त्रिजटा ने उनके पैर पकड़कर समझाया और प्रभु के प्रताप, बल और सुयश की बातें सुनाईं।
चौपाई 104
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
उसने कहा — हे सुकुमारी, रात में आग नहीं मिलेगी; और यह कहकर वह अपने घर चली गई।
चौपाई 105
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला॥
सीता जी कहने लगीं — विधाता ही उल्टा हो गया है; न आग मिलती है, न पीड़ा मिटती है।
चौपाई 106
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥
आकाश में अंगारे (तारे) साफ़ दिख रहे हैं, पर धरती पर एक भी तारा नहीं आता।
चौपाई 107
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
चंद्रमा आग जैसा है, पर वह भी आग नहीं बरसाता, मानो मुझे अभागिन जानकर।
चौपाई 108
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
हे अशोक वृक्ष, मेरी विनती सुन; अपना नाम सच कर और मेरा शोक हर ले।
चौपाई 109
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
तेरे नए पत्ते आग जैसे लाल हैं; मुझे आग दे दे, अपनी कठोरता मत दिखा।
चौपाई 110
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥
सीता जी को विरह से इतना व्याकुल देखकर हनुमान जी को वह एक पल कल्प जितना लंबा लगा।
दोहा
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब। जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ॥12॥
तब हनुमान जी ने मन में विचार करके ऊपर से अँगूठी गिरा दी। सीता जी को लगा मानो अशोक ने अंगारा दे दिया हो, और उन्होंने खुश होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया।
चौपाई 111
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
तब सीता जी ने वह मनोहर अँगूठी देखी, जिस पर 'राम' नाम सुंदर ढंग से अंकित था।
चौपाई 112
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥
अँगूठी पहचानकर वे हैरानी से उसे देखने लगीं; उनका हृदय खुशी और दुख दोनों से व्याकुल हो गया।
चौपाई 113
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
वे सोचने लगीं — अजेय श्रीराम को कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी अँगूठी बनाई नहीं जा सकती।
चौपाई 114
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
सीता जी मन में तरह-तरह के विचार कर रही थीं, तभी हनुमान जी मीठे वचन बोले।
चौपाई 115
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
वे श्रीरामचंद्र जी के गुणों का वर्णन करने लगे, जिसे सुनते ही सीता जी का दुख भाग गया।
चौपाई 116
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥
सीता जी मन और कान लगाकर सुनने लगीं, और हनुमान जी ने शुरू से सारी कथा सुनाई।
चौपाई 117
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥
सीता जी बोलीं — जिसने कानों को अमृत जैसी यह सुंदर कथा सुनाई, वह भाई सामने प्रकट क्यों नहीं होता?
चौपाई 118
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥
तब हनुमान जी उनके पास चले गए। उन्हें देखकर सीता जी मुँह फेरकर बैठ गईं; उनके मन में आश्चर्य हुआ।
चौपाई 119
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
हनुमान जी बोले — हे माता जानकी, मैं श्रीराम का दूत हूँ; करुणा के सागर प्रभु की सच्ची शपथ खाकर कहता हूँ।
चौपाई 120
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥
माता, यह अँगूठी मैं लाया हूँ; श्रीराम ने इसे आपके लिए पहचान के रूप में दिया है।
चौपाई 121
नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥
सीता जी ने पूछा — बताओ, मनुष्य और वानर का साथ कैसे हुआ? तब हनुमान जी ने वह कथा सुनाई कि कैसे मित्रता हुई।
दोहा
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास। जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥13॥
हनुमान जी के प्रेम भरे वचन सुनकर सीता जी के मन में विश्वास जगा। उन्होंने जान लिया कि यह मन, कर्म और वचन से कृपासिंधु श्रीराम का दास है।
चौपाई 122
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
उन्हें भगवान का भक्त जानकर सीता जी के मन में गहरा प्रेम उमड़ा, आँखों में आँसू भर आए और शरीर पुलकित हो गया।
चौपाई 123
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥
सीता जी बोलीं — हे तात हनुमान, विरह के सागर में डूबती हुई मेरे लिए तुम जहाज़ बन गए हो।
चौपाई 124
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
मैं तुम पर बलिहारी जाती हूँ; अब बताओ, सुख के धाम खर के शत्रु श्रीराम अपने भाई के साथ कुशल से तो हैं?
चौपाई 125
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥
रघुनाथ तो कोमल हृदय वाले और कृपालु हैं; फिर हे कपि, उन्होंने यह कठोरता किस कारण धारण की है?
चौपाई 126
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
सेवकों को सुख देना तो उनका स्वभाव है। क्या रघुनाथ कभी मुझे याद करते हैं?
चौपाई 127
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥
हे तात, क्या कभी उनके साँवले, कोमल शरीर को देखकर मेरी आँखें ठंडी होंगी?
चौपाई 128
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
उनके मुँह से बोल नहीं निकल रहे थे, आँखें आँसुओं से भर गईं — हाय नाथ, आपने मुझे बिल्कुल भुला दिया!
चौपाई 129
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥
सीता जी को विरह से इतना व्याकुल देखकर हनुमान जी कोमल और विनम्र वचन बोले।
चौपाई 130
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
माता, कृपा के धाम प्रभु अपने भाई के साथ कुशल हैं, पर आपके दुख से दुखी हैं।
चौपाई 131
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥
हे माता, मन में कमी मत मानिए; श्रीराम के मन में आपसे भी दुगुना प्रेम है।
दोहा
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर। अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥14॥
हे माता, अब धीरज धरकर श्रीराम का संदेश सुनिए — यह कहते-कहते हनुमान जी का गला भर आया और आँखों में आँसू आ गए।
चौपाई 132
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
श्रीराम ने कहा है — हे सीता, तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब कुछ उल्टा हो गया है।
चौपाई 133
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥
पेड़ों के नए पत्ते आग जैसे लगते हैं; रात कालरात्रि जैसी, चंद्रमा सूरज जैसा तपता है।
चौपाई 134
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
कमलों के वन भालों के जंगल जैसे लगते हैं, और बादल मानो खौलता तेल बरसाते हैं।
चौपाई 135
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥
जो पहले सुख देते थे, वही अब पीड़ा देते हैं; ठंडी, धीमी, सुगंधित हवा साँप की साँस जैसी लगती है।
चौपाई 136
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
कहने से दुख कुछ कम होता है, पर किससे कहूँ? यह कोई नहीं जानता।
चौपाई 137
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
हे प्रिये, मेरे और तुम्हारे प्रेम का सार केवल मेरा मन जानता है।
चौपाई 138
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
और वह मन सदा तुम्हारे पास रहता है; बस इतने में ही मेरे प्रेम का रस समझ लो।
चौपाई 139
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
प्रभु का संदेश सुनते ही सीता जी प्रेम में ऐसी डूब गईं कि उन्हें शरीर की सुध नहीं रही।
चौपाई 140
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
हनुमान जी बोले — माता, हृदय में धीरज धरिए और सेवकों को सुख देने वाले श्रीराम का स्मरण कीजिए।
चौपाई 141
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥
रघुनाथ जी की महिमा को मन में लाइए और मेरी बात सुनकर कायरता (डर) छोड़ दीजिए।
दोहा
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु। जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥15॥
राक्षसों के झुंड पतंगों जैसे हैं और श्रीराम के बाण आग जैसे। हे माता, धीरज रखिए; राक्षसों को जला हुआ ही समझिए।
चौपाई 142
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
अगर श्रीराम को आपकी ख़बर मिल गई होती, तो वे ज़रा भी देर न करते।
चौपाई 143
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की॥
हे जानकी, श्रीराम के बाण-रूपी सूरज के उगते ही राक्षसों का अंधकार कहाँ टिकेगा?
चौपाई 144
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
माता, मैं आपको अभी ले चलूँ, पर श्रीराम की शपथ, प्रभु की आज्ञा नहीं है।
चौपाई 145
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥
हे माता, कुछ दिन और धीरज रखिए; रघुवीर वानरों के साथ यहाँ आएँगे।
चौपाई 146
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
वे राक्षसों को मारकर आपको ले जाएँगे, और नारद आदि तीनों लोकों में उनका यश गाएँगे।
चौपाई 147
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥
सीता जी बोलीं — हे पुत्र, क्या सब वानर तुम्हारे ही जैसे (छोटे) हैं? राक्षस तो बड़े बलवान योद्धा हैं।
चौपाई 148
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा॥
मेरे मन में बड़ा संदेह है। यह सुनकर हनुमान जी ने अपना असली शरीर प्रकट किया।
चौपाई 149
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥
उनका शरीर सोने के पर्वत जैसा विशाल था — युद्ध में भयंकर, अत्यंत बलवान और वीर।
चौपाई 150
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥
तब सीता जी के मन में भरोसा हुआ, और पवनपुत्र ने फिर से छोटा रूप ले लिया।
दोहा
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥16॥
हे माता, सुनिए — वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती; पर प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा साँप भी गरुड़ को खा सकता है।
चौपाई 151
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
भक्ति, प्रताप, तेज और बल से भरी हनुमान जी की बात सुनकर सीता जी के मन को संतोष हुआ।
चौपाई 152
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥
उन्हें श्रीराम का प्रिय जानकर सीता जी ने आशीर्वाद दिया — हे तात, तुम बल और शील के भंडार बनो।
चौपाई 153
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
हे पुत्र, तुम अजर, अमर और गुणों के भंडार बनो; रघुनाथ जी तुम पर बहुत स्नेह करें।
चौपाई 154
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
'प्रभु तुम पर कृपा करें' — यह कानों से सुनकर हनुमान जी पूर्ण प्रेम में मगन हो गए।
चौपाई 155
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
उन्होंने बार-बार सीता जी के चरणों में सिर झुकाया और हाथ जोड़कर बोले—
चौपाई 156
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥
हे माता, अब मैं धन्य हो गया; आपका आशीर्वाद अचूक है, यह सब जानते हैं।
चौपाई 157
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
माता, सुनिए, मुझे बहुत भूख लगी है, और ये सुंदर फलों वाले पेड़ देखकर और भी।
चौपाई 158
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥
सीता जी बोलीं — बेटा, इस वन की रखवाली बहुत बड़े-बड़े बलवान राक्षस करते हैं।
चौपाई 159
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥
हनुमान जी बोले — माता, अगर आप मन में प्रसन्न हों, तो मुझे उनका कोई डर नहीं है।
दोहा
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु। रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥17॥
हनुमान जी को बुद्धि और बल में निपुण देखकर जानकी जी ने कहा — जाओ, बेटा, रघुनाथ जी के चरणों को हृदय में रखकर मीठे फल खाओ।
चौपाई 160
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
हनुमान जी सिर झुकाकर बाग में घुस गए; फल खाने लगे और पेड़ तोड़ने लगे।
चौपाई 161
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥
वहाँ बहुत से योद्धा रखवाले थे; उनमें से कुछ को उन्होंने मार डाला और कुछ ने जाकर रावण से पुकार की।
चौपाई 162
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
हे नाथ, एक बहुत बड़ा वानर आया है, उसने अशोक वाटिका उजाड़ दी है।
चौपाई 163
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥
उसने फल खाए, पेड़ उखाड़ दिए और रखवालों को मसल-मसलकर ज़मीन पर गिरा दिया।
चौपाई 164
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
यह सुनकर रावण ने बहुत से योद्धा भेजे; उन्हें देखकर हनुमान जी गरजे।
चौपाई 165
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥
हनुमान जी ने सब राक्षसों को मार डाला; कुछ अधमरे होकर पुकारते हुए भागे।
चौपाई 166
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
फिर रावण ने अक्षयकुमार को भेजा, जो बहुत से बड़े योद्धाओं को साथ लेकर चला।
चौपाई 167
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥
उसे आते देखकर हनुमान जी ने पेड़ उठाकर ललकारा और उसे मारकर बड़े ज़ोर से गरजे।
दोहा
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि। कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥18॥
उन्होंने सेना में से कुछ को मार डाला, कुछ को मसल दिया और कुछ को पकड़कर धूल में मिला दिया। कुछ ने फिर जाकर पुकार की — हे प्रभु, वानर बहुत बलवान है।
चौपाई 168
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोधित हुआ और उसने बलवान मेघनाद को भेजा।
चौपाई 169
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥
रावण ने कहा — बेटा, उसे मारना मत, बाँध लाना; देखें तो सही, यह वानर कहाँ का है।
चौपाई 170
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
अतुलनीय योद्धा इंद्रजीत चला; भाई की मृत्यु सुनकर उसके मन में क्रोध भरा था।
चौपाई 171
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥
हनुमान जी ने देखा कि इस बार भयानक योद्धा आया है, तो वे दाँत कटकटाकर गरजे और उस पर दौड़े।
चौपाई 172
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
उन्होंने एक बहुत बड़ा पेड़ उखाड़ा और उससे रावण के पुत्र को रथहीन कर दिया।
चौपाई 173
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥
उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उन्हें हनुमान जी पकड़-पकड़कर अपने शरीर से मसलने लगे।
चौपाई 174
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
उन्हें मारकर हनुमान जी मेघनाद से भिड़ गए; दोनों ऐसे लड़े मानो दो बड़े हाथी लड़ रहे हों।
चौपाई 175
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥
हनुमान जी उसे घूँसा मारकर पेड़ पर जा चढ़े, और मेघनाद को एक पल के लिए मूर्छा आ गई।
चौपाई 176
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥
फिर उठकर उसने बहुत सी माया रची, पर पवनपुत्र को जीता नहीं जा सका।
दोहा
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार। जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥19॥
तब उसने ब्रह्मास्त्र चढ़ाया। हनुमान जी ने मन में सोचा — अगर मैं ब्रह्मास्त्र का मान न रखूँ, तो उसकी अपार महिमा मिट जाएगी।
चौपाई 177
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
मेघनाद ने हनुमान जी पर ब्रह्मबाण चलाया; गिरते-गिरते भी उन्होंने सेना का संहार कर दिया।
चौपाई 178
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥
जब उसने देखा कि हनुमान जी मूर्छित हो गए हैं, तो उन्हें नागपाश में बाँधकर ले गया।
चौपाई 179
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
(शिव जी कहते हैं) हे भवानी, सुनो — जिनका नाम जपकर ज्ञानी लोग संसार के बंधन काट देते हैं—
चौपाई 180
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥
क्या उनका दूत किसी बंधन में आ सकता है? पर प्रभु के काम के लिए हनुमान जी ने स्वयं को बँधवा लिया।
चौपाई 181
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
वानर के बँधने की बात सुनकर राक्षस दौड़े और तमाशा देखने सब सभा में आ गए।
चौपाई 182
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥
हनुमान जी ने जाकर रावण की सभा देखी; उसकी शान-शौकत का वर्णन नहीं हो सकता।
चौपाई 183
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े विनम्र खड़े थे और डरते हुए रावण की भौंहें देख रहे थे।
चौपाई 184
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥
इतना प्रताप देखकर भी हनुमान जी के मन में कोई डर नहीं था, जैसे साँपों के बीच गरुड़ निडर रहता है।
दोहा
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद। सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥20॥
हनुमान जी को देखकर रावण हँसा और कटु वचन बोला; फिर पुत्र के वध की याद आई तो उसके मन में दुख उपजा।
चौपाई 185
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
रावण बोला — अरे वानर, तू कौन है? किसके बल पर तूने मेरा बाग उजाड़ दिया?
चौपाई 186
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥
क्या तूने कभी मेरा नाम नहीं सुना? अरे मूर्ख, मैं तुझे बहुत निडर देख रहा हूँ।
चौपाई 187
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
तूने किस अपराध के कारण राक्षसों को मारा? अरे मूर्ख, बता, क्या तुझे प्राणों का डर नहीं?
चौपाई 188
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥
हनुमान जी बोले — हे रावण, सुनो, जिनका बल पाकर माया अनगिनत ब्रह्मांडों की रचना करती है—
चौपाई 189
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
जिनके बल से ब्रह्मा, विष्णु और शिव संसार को रचते, पालते और मिटाते हैं—
चौपाई 190
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥
जिनके बल से हज़ार फनों वाले शेषनाग पर्वतों और वनों सहित पूरे ब्रह्मांड को सिर पर धारण करते हैं—
चौपाई 191
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता॥
जो देवताओं की रक्षा के लिए तरह-तरह के शरीर धारण करते हैं और तुम जैसे मूर्खों को सीख देते हैं—
चौपाई 192
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥
जिन्होंने शिव जी का कठोर धनुष तोड़ा और उसके साथ ही राजाओं का घमंड भी चूर कर दिया—
चौपाई 193
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥
जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बाली जैसे अतुलनीय बलवानों को मारा—
दोहा
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥21॥
जिनके बल के छोटे-से अंश से तुमने सारे चर-अचर जगत को जीता, और जिनकी प्यारी पत्नी को तुम चुरा लाए हो — मैं उन्हीं का दूत हूँ।
चौपाई 194
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥
मैं तुम्हारी ताकत जानता हूँ — सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी।
चौपाई 195
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥
और बाली से लड़कर तुमने 'यश' पाया था। यह सुनकर रावण ने हँसी में बात टाल दी।
चौपाई 196
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
हनुमान जी बोले — हे स्वामी, मुझे भूख लगी थी, इसलिए फल खाए; और वानर के स्वभाव से पेड़ तोड़ दिए।
चौपाई 197
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥
हे स्वामी, सबको अपना शरीर बहुत प्यारा होता है; वे दुष्ट मुझे मारने लगे।
चौपाई 198
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे॥
जिन्होंने मुझे मारा, उन्हें मैंने मारा; इस पर भी तुम्हारे बेटे ने मुझे बाँध लिया।
चौपाई 199
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
बँधने में मुझे कोई शर्म नहीं है; मैं तो बस अपने प्रभु का काम करना चाहता हूँ।
चौपाई 200
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
हे रावण, मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ; घमंड छोड़कर मेरी सीख सुनो।
चौपाई 201
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥
अपने कुल के बारे में सोचो, और भ्रम छोड़कर भक्तों का डर हरने वाले भगवान को भजो।
चौपाई 202
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
जिनके डर से वह काल भी बहुत डरता है, जो देवता, असुर और सारे जगत को खा जाता है—
चौपाई 203
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥
उनसे कभी बैर मत करो; मेरे कहने से जानकी जी को लौटा दो।
दोहा
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि। गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥22॥
खर के शत्रु रघुनाथ शरणागतों के रक्षक और दया के सागर हैं। शरण में जाने पर प्रभु तुम्हारे अपराध भुलाकर तुम्हारी रक्षा करेंगे।
चौपाई 204
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू॥
श्रीराम के चरण-कमलों को हृदय में धारण करो और लंका पर स्थिर राज करो।
चौपाई 205
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥
ऋषि पुलस्त्य का यश निर्मल चंद्रमा जैसा है; उस चंद्रमा में तुम कलंक मत बनो।
चौपाई 206
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
राम-नाम के बिना वाणी शोभा नहीं पाती; घमंड और मोह छोड़कर विचार करके देखो।
चौपाई 207
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥
हे देवताओं के शत्रु, सब गहनों से सजी सुंदर स्त्री भी वस्त्रों के बिना शोभा नहीं पाती।
चौपाई 208
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
(वैसे ही) राम से विमुख व्यक्ति की संपत्ति और प्रभुता पाकर भी न पाने के समान है; वह चली जाती है।
चौपाई 209
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं॥
जिन नदियों का उद्गम सदा जल वाला नहीं होता, वे बरसात बीतते ही सूख जाती हैं।
चौपाई 210
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
हे रावण, सुनो, मैं प्रण करके कहता हूँ — राम से विमुख की रक्षा करने वाला कोई नहीं है।
चौपाई 211
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥
हज़ारों शिव, विष्णु और ब्रह्मा भी राम के द्रोही तुमको नहीं बचा सकते।
दोहा
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान। भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥23॥
मोह जिसकी जड़ है और जो बहुत पीड़ा देता है, ऐसे अंधकार-रूपी अभिमान को छोड़ दो, और कृपा के सागर भगवान रघुनायक श्रीराम को भजो।
चौपाई 212
जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
हालाँकि हनुमान जी ने भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीति से भरी बहुत हित की बात कही—
चौपाई 213
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥
फिर भी वह महा-अभिमानी रावण हँसकर बोला — हमें यह वानर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला है!
चौपाई 214
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥
अरे दुष्ट, तेरी मौत पास आ गई है, तभी अधम होकर तू मुझे सीख देने चला है।
चौपाई 215
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥
हनुमान जी बोले — इसका उल्टा होगा; मैंने साफ़ जान लिया कि तेरी बुद्धि भ्रमित हो गई है।
चौपाई 216
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
हनुमान जी के वचन सुनकर रावण बहुत चिढ़ गया और बोला — इस मूर्ख के प्राण जल्दी क्यों नहीं ले लेते?
चौपाई 217
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥
यह सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े; उसी समय मंत्रियों के साथ विभीषण वहाँ आए।
चौपाई 218
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
उन्होंने सिर झुकाकर बहुत विनती की कि दूत को मारना नीति के विरुद्ध है।
चौपाई 219
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥
हे स्वामी, कोई और दंड दीजिए। सबने कहा — भाई, यह सलाह अच्छी है।
चौपाई 220
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥
यह सुनकर रावण हँसकर बोला — अच्छा, इस बंदर का कोई अंग भंग करके भेज दो।
दोहा
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ। तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥24॥
मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदर का मोह अपनी पूँछ पर होता है; इसलिए तेल में डुबोया कपड़ा उसकी पूँछ पर बाँधकर आग लगा दो।
चौपाई 221
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जब यह बिना पूँछ का बंदर वहाँ जाएगा, तब यह मूर्ख अपने स्वामी को साथ ले आएगा।
चौपाई 222
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥
जिनकी इसने इतनी बड़ाई की है, मैं भी तो उनकी ताकत देखूँ।
चौपाई 223
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
यह सुनकर हनुमान जी मन में मुस्कुराए — मैं समझ गया, सरस्वती जी ने (रावण की बुद्धि फेरकर) मेरी सहायता की है।
चौपाई 224
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥
रावण की बात सुनकर मूर्ख राक्षस वही तैयारी करने लगे।
चौपाई 225
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
हनुमान जी ने खेल करते हुए पूँछ इतनी बढ़ा ली कि नगर में कपड़ा, घी और तेल कुछ नहीं बचा।
चौपाई 226
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥
तमाशा देखने नगरवासी आए; वे हनुमान जी को लातें मारते और खूब हँसी उड़ाते।
चौपाई 227
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
ढोल बजाते, सब तालियाँ पीटते हुए उन्होंने उन्हें नगर में घुमाया और फिर पूँछ में आग लगा दी।
चौपाई 228
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघुरूप तुरंता॥
आग जलती देखकर हनुमान जी तुरंत बहुत छोटे बन गए।
चौपाई 229
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भईं सभीत निसाचर नारीं॥
बंधन से निकलकर वे सोने की अटारियों पर चढ़ गए, जिससे राक्षसों की स्त्रियाँ डर गईं।
दोहा
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥25॥
उसी समय भगवान की प्रेरणा से उनचासों पवन चलने लगे। हनुमान जी ज़ोर से हँसकर गरजे और बढ़कर आकाश तक पहुँच गए।
चौपाई 230
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
उनका शरीर विशाल था पर बहुत हल्का; वे दौड़कर एक महल से दूसरे महल पर चढ़ते जाते।
चौपाई 231
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥
नगर जलने लगा और लोग बेहाल हो गए; आग की करोड़ों भयानक लपटें झपट रही थीं।
चौपाई 232
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
'हाय पिता, हाय माता' की पुकार सुनाई देती थी — इस समय हमें कौन बचाएगा?
चौपाई 233
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥
हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, बंदर का रूप धरे कोई देवता है।
चौपाई 234
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
साधु का अपमान करने का फल ऐसा ही होता है कि नगर अनाथ की तरह जल रहा है।
चौपाई 235
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥
हनुमान जी ने एक पल में पूरा नगर जला दिया; केवल विभीषण का घर नहीं जला।
चौपाई 236
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
(शिव जी कहते हैं) हे गिरिजा, जिन प्रभु ने अग्नि को रचा है, उन्हीं के दूत होने के कारण हनुमान जी नहीं जले।
चौपाई 237
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥
उन्होंने उलट-पलटकर सारी लंका जला दी, और फिर कूदकर समुद्र में जा पड़े।
दोहा
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि। जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥26॥
पूँछ बुझाकर, थकान मिटाकर और फिर छोटा रूप धरकर हनुमान जी हाथ जोड़कर जानकी जी के सामने खड़े हो गए।
चौपाई 238
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
माता, मुझे भी कोई निशानी दीजिए, जैसे रघुनाथ जी ने मुझे दी थी।
चौपाई 239
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥
तब सीता जी ने अपनी चूड़ामणि उतारकर दी, जिसे हनुमान जी ने खुशी से ले लिया।
चौपाई 240
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
सीता जी बोलीं — हे तात, प्रभु से मेरा प्रणाम कहना और कहना कि आप तो सब तरह से पूर्णकाम हैं (आपको किसी चीज़ की कमी नहीं)।
चौपाई 241
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥
फिर भी दीनों पर दया करने का अपना विरद याद करके, हे नाथ, मेरा भारी संकट दूर कीजिए।
चौपाई 242
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
हे तात, प्रभु को इंद्र के पुत्र जयंत की कथा सुनाकर उनके बाणों का प्रताप याद दिलाना।
चौपाई 243
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥
अगर एक महीने में नाथ नहीं आए, तो फिर वे मुझे जीवित नहीं पाएँगे।
चौपाई 244
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
हे कपि, बताओ, मैं किस तरह प्राण रखूँ? हे तात, अब तुम भी जाने की बात कह रहे हो।
चौपाई 245
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥
तुम्हें देखकर मेरी छाती ठंडी हुई थी; अब फिर मेरे लिए वही दिन और वही रातें होंगी।
दोहा
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह। चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥27॥
हनुमान जी ने जानकी जी को कई तरह से समझाकर धीरज दिया, और उनके चरण-कमलों में सिर झुकाकर श्रीराम के पास चल पड़े।
चौपाई 246
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
चलते समय उन्होंने बहुत ज़ोर से गर्जना की, जिसे सुनकर राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिरने लगे।
चौपाई 247
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा॥
समुद्र लाँघकर वे इस पार आए और वानरों को किलकारी की आवाज़ सुनाई।
चौपाई 248
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
हनुमान जी को देखकर सब प्रसन्न हो गए; वानरों को लगा मानो उनका नया जन्म हुआ हो।
चौपाई 249
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥
उनका मुख प्रसन्न था और शरीर तेज से चमक रहा था, जिससे सब समझ गए कि उन्होंने श्रीराम का काम कर दिया है।
चौपाई 250
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
सब उनसे मिलकर बहुत सुखी हुए, जैसे तड़पती मछली को पानी मिल गया हो।
चौपाई 251
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥
सब खुशी-खुशी नई-नई बातें पूछते-बताते हुए रघुनाथ जी के पास चल पड़े।
चौपाई 252
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
तब सब मधुवन (सुग्रीव के बाग) में घुसे और अंगद की अनुमति से मीठे फल खाए।
चौपाई 253
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥
जब रखवाले रोकने लगे, तो वानरों ने उन्हें घूँसे मारे, और वे सब भाग गए।
दोहा
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज। सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥28॥
उन सबने जाकर पुकार की कि युवराज अंगद बाग उजाड़ रहे हैं। यह सुनकर सुग्रीव प्रसन्न हुए कि वानर प्रभु का काम करके आए हैं।
चौपाई 254
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
अगर सीता जी की ख़बर न मिली होती, तो क्या वे मधुवन के फल खा सकते थे?
चौपाई 255
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥
राजा सुग्रीव मन में ऐसा सोच ही रहे थे कि वानर अपने दल के साथ आ पहुँचे।
चौपाई 256
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
सबने आकर उनके चरणों में सिर झुकाया, और कपिराज सुग्रीव सबसे बड़े प्रेम से मिले।
चौपाई 257
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥
सुग्रीव ने कुशल पूछी; वानरों ने कहा — आपके चरण देखकर हम कुशल हैं; श्रीराम की कृपा से काम विशेष रूप से पूरा हुआ।
चौपाई 258
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
हे नाथ, यह काम हनुमान ने किया है और सब वानरों के प्राण बचा लिए हैं।
चौपाई 259
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥
यह सुनकर सुग्रीव फिर हनुमान जी से गले मिले और वानरों के साथ श्रीराम के पास चले।
चौपाई 260
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
श्रीराम ने वानरों को आते देखा तो काम पूरा होने का अनुमान करके उनके मन में विशेष हर्ष हुआ।
चौपाई 261
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥
दोनों भाई स्फटिक की शिला पर बैठे थे; सब वानर जाकर उनके चरणों में गिर पड़े।
दोहा
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज। पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥29॥
दया के भंडार रघुनाथ जी सबसे प्रेम से मिले और कुशल पूछी। वानरों ने कहा — हे नाथ, आपके चरण-कमल देखकर अब हम कुशल हैं।
चौपाई 262
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
जाम्बवान बोले — हे रघुनाथ, सुनिए; हे नाथ, जिस पर आप दया करते हैं—
चौपाई 263
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥
उसका सदा भला और कुशल रहता है, और देवता, मनुष्य, मुनि सब उस पर प्रसन्न रहते हैं।
चौपाई 264
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर॥
वही विजयी, विनम्र और गुणों का सागर होता है, और उसका सुयश तीनों लोकों में फैलता है।
चौपाई 265
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥
प्रभु की कृपा से सब काम हो गया; आज हमारा जन्म सफल हो गया।
चौपाई 266
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
हे नाथ, पवनपुत्र ने जो काम किया है, उसका वर्णन हज़ार मुखों से भी नहीं हो सकता।
चौपाई 267
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥
फिर जाम्बवान ने हनुमान जी के सुंदर कारनामे रघुनाथ जी को सुनाए।
चौपाई 268
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
सुनकर कृपानिधान श्रीराम का मन बहुत प्रसन्न हुआ और उन्होंने खुशी से हनुमान जी को गले लगा लिया।
चौपाई 269
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥
श्रीराम बोले — हे तात, बताओ, जानकी वहाँ किस तरह रहती हैं और अपने प्राणों की रक्षा कैसे करती हैं?
दोहा
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥30॥
हनुमान जी बोले — आपका नाम दिन-रात पहरा देता है, आपका ध्यान दरवाज़ा है, और आँखें अपने पैरों पर टिकी रहना ताला है; फिर प्राण किस रास्ते से निकलें?
चौपाई 270
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि दी। रघुनाथ जी ने उसे लेकर हृदय से लगा लिया।
चौपाई 271
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥
हे नाथ, जनककुमारी ने दोनों आँखों में आँसू भरकर कुछ वचन कहे हैं—
चौपाई 272
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
छोटे भाई सहित प्रभु के चरण पकड़कर कहना — आप दीनबंधु और शरणागतों का दुख हरने वाले हैं।
चौपाई 273
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥
मैं मन, कर्म और वचन से आपके चरणों की अनुरागी हूँ; फिर हे नाथ, किस अपराध से आपने मुझे त्याग दिया?
चौपाई 274
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
मैं अपना एक दोष मानती हूँ — आपसे बिछुड़ते समय मेरे प्राण नहीं निकले।
चौपाई 275
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥
पर हे नाथ, यह आँखों का अपराध है, जो निकलते हुए प्राणों को ज़बरदस्ती रोक लेती हैं।
चौपाई 276
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
विरह आग है, शरीर रुई है और साँस हवा है; इससे शरीर पल भर में जल सकता है।
चौपाई 277
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥
पर आँखें अपने हित के लिए (आपको फिर देखने के लिए) आँसू बहाती रहती हैं, जिससे विरह की आग शरीर को जला नहीं पाती।
चौपाई 278
सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥
सीता जी की विपत्ति बहुत बड़ी है; हे दीनदयाल, उसे न कहना ही अच्छा है।
दोहा
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥31॥
हे करुणानिधान, उनका एक-एक पल कल्प के समान बीतता है। हे प्रभु, जल्दी चलिए और अपनी भुजाओं के बल से दुष्टों की सेना जीतकर उन्हें ले आइए।
चौपाई 279
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥
सीता जी का दुख सुनकर सुख के धाम प्रभु की कमल जैसी आँखों में आँसू भर आए।
चौपाई 280
बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥
श्रीराम बोले — जो मन, वचन और शरीर से मेरा ही आश्रय लेती है, क्या उसे सपने में भी विपत्ति हो सकती है?
चौपाई 281
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
हनुमान जी बोले — हे प्रभु, विपत्ति तो वही है जब आपका स्मरण और भजन न हो।
चौपाई 282
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥
हे प्रभु, राक्षसों की क्या बात है? आप शत्रु को जीतकर जानकी जी को ले आएँगे।
चौपाई 283
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
श्रीराम बोले — हे कपि, सुनो, तुम्हारे जैसा उपकारी कोई देवता, मनुष्य या मुनि नहीं है।
चौपाई 284
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
मैं बदले में तुम्हारा क्या उपकार करूँ? मेरा मन तुम्हारे सामने आँख नहीं मिला पाता।
चौपाई 285
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
हे पुत्र, सुनो, मैंने मन में विचार करके देख लिया — मैं तुमसे उऋण नहीं हो सकता।
चौपाई 286
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥
देवताओं के रक्षक प्रभु बार-बार हनुमान जी को देखते रहे; उनकी आँखों में आँसू थे और शरीर पुलकित था।
दोहा
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत। चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥32॥
प्रभु के वचन सुनकर और उनके मुख व शरीर को देखकर हनुमान जी प्रसन्न हो गए, और प्रेम से व्याकुल होकर 'हे भगवान, बचाइए, बचाइए' कहते हुए उनके चरणों में गिर पड़े।
चौपाई 287
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु बार-बार उन्हें उठाना चाहते थे, पर प्रेम में डूबे हनुमान जी को उठना अच्छा नहीं लगता था।
चौपाई 288
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥
प्रभु का कर-कमल हनुमान जी के सिर पर था — उस दृश्य को याद करके शिव जी भी प्रेम में मगन हो गए।
चौपाई 289
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
फिर मन को सँभालकर शंकर जी आगे की बहुत सुंदर कथा कहने लगे।
चौपाई 290
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥
प्रभु ने हनुमान जी को उठाकर हृदय से लगाया और हाथ पकड़कर अपने बहुत पास बैठाया।
चौपाई 291
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
हे कपि, बताओ, रावण की रक्षा वाली लंका और उसके बहुत मज़बूत किले को तुमने कैसे जलाया?
चौपाई 292
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥
प्रभु को प्रसन्न जानकर हनुमान जी बिना किसी अभिमान के बोले—
चौपाई 293
साखामृग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
वानर का बस इतना ही पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर कूद जाता है।
चौपाई 294
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥
मैंने जो समुद्र लाँघा, सोने की लंका जलाई, राक्षसों को मारकर अशोक वन उजाड़ा—
चौपाई 295
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥
हे रघुनाथ, वह सब आपका प्रताप है; हे नाथ, उसमें मेरी कोई बड़ाई नहीं है।
दोहा
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल। तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥33॥
हे प्रभु, जिस पर आप प्रसन्न हों, उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभाव से रुई भी बड़वानल (समुद्र की आग) को जला सकती है।
चौपाई 296
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
हे नाथ, मुझे कृपा करके अपनी अत्यंत सुख देने वाली, कभी न छूटने वाली भक्ति दीजिए।
चौपाई 297
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥
(शिव जी कहते हैं) हे भवानी, हनुमान जी की अत्यंत सरल बात सुनकर प्रभु ने कहा — 'ऐसा ही हो'।
चौपाई 298
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
हे उमा, जिसने श्रीराम का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर और कुछ अच्छा नहीं लगता।
चौपाई 299
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥
जिसके हृदय में यह संवाद बस जाता है, वह श्रीराम के चरणों की भक्ति पा लेता है।
चौपाई 300
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
प्रभु के वचन सुनकर वानरों का झुंड कहने लगा — सुख के मूल, कृपालु प्रभु की जय हो, जय हो, जय हो!
चौपाई 301
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥
तब रघुनाथ जी ने सुग्रीव को बुलाया और कहा — चलने की तैयारी करो।
चौपाई 302
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
अब किस कारण देर की जाए? तुरंत वानरों को आज्ञा दो।
चौपाई 303
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥
यह लीला देखकर देवताओं ने बहुत फूल बरसाए और प्रसन्न होकर आकाश से अपने लोक चले गए।
दोहा
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ। नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥34॥
वानरराज सुग्रीव ने तुरंत बुलाया, तो सेनापतियों के झुंड आ गए — अनेक रंगों के, अतुलनीय बल वाले वानरों और भालुओं के दल।
चौपाई 304
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा॥
वे प्रभु के चरण-कमलों में सिर झुकाते हैं; महाबली भालू और वानर गरजते हैं।
चौपाई 305
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥
श्रीराम ने पूरी वानर सेना को देखा और अपनी कमल जैसी आँखों से कृपा-दृष्टि डाली।
चौपाई 306
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
श्रीराम की कृपा का बल पाकर वानर ऐसे लगे मानो पंखों वाले बड़े पर्वत हों।
चौपाई 307
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥
तब श्रीराम ने प्रसन्न होकर प्रस्थान किया, और अनेक सुंदर शुभ शकुन हुए।
चौपाई 308
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
जिनकी कीर्ति ही पूरी मंगलमय है, उनके प्रस्थान पर शकुन होना तो बस रीति निभाना है।
चौपाई 309
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥
प्रभु का प्रस्थान वैदेही ने भी जान लिया; उनके बाएँ अंग फड़ककर मानो यह कह रहे थे।
चौपाई 310
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥
जानकी जी को जो-जो शुभ शकुन होते थे, वही रावण के लिए अपशकुन बन जाते थे।
चौपाई 311
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥
सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? अनगिनत वानर और भालू गरज रहे थे।
चौपाई 312
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
नाखून ही उनके हथियार थे, वे पर्वत और पेड़ उठाए हुए थे, और अपनी इच्छा से आकाश और धरती पर चल रहे थे।
चौपाई 313
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥
भालू और वानर सिंह जैसी गर्जना करते थे, जिससे दिशाओं के हाथी डगमगाकर चिंघाड़ने लगे।
पद 7
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥ कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥1॥
दिग्गज चिंघाड़ने लगे, धरती डोलने लगी, पर्वत काँपने लगे और समुद्र उफनने लगे; गंधर्व, देवता, मुनि, नाग और किन्नर मन में प्रसन्न हुए कि अब दुख टल गए। करोड़ों भयानक वानर योद्धा दाँत कटकटाते हुए दौड़ रहे थे और प्रबल प्रताप वाले कोसलनाथ श्रीराम के गुण गा रहे थे।
पद 8
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई। गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई॥ रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥2॥
सेना का भार न सह पाने से महान शेषनाग बार-बार मूर्छित होते और बार-बार कछुए की कठोर पीठ को दाँतों से पकड़ लेते — वह कैसा सुंदर लगता है! मानो श्रीराम के सुंदर प्रस्थान को परम सुहावना जानकर शेषनाग कछुए की पीठ पर उसकी अमिट, पवित्र कथा लिख रहे हों।
दोहा
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर। जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥35॥
इस तरह कृपानिधान श्रीराम जाकर समुद्र के किनारे उतरे, और अनगिनत वीर भालू और वानर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे।
चौपाई 314
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका॥
उधर, जब से हनुमान जी लंका जलाकर गए, तब से राक्षस डरे-डरे रहते थे।
चौपाई 315
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥
सब अपने-अपने घरों में सोचते थे कि अब राक्षस कुल का बचाव नहीं है।
चौपाई 316
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
जिसके दूत के बल का वर्णन नहीं हो सकता, उसके स्वयं नगर में आने पर हमारा क्या भला होगा?
चौपाई 317
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥
दूतियों से नगरवासियों की ऐसी बातें सुनकर मंदोदरी बहुत व्याकुल हुईं।
चौपाई 318
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
वे एकांत में हाथ जोड़कर पति के पैरों पड़ीं और नीति-रस में डूबे वचन बोलीं।
चौपाई 319
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥
हे स्वामी, भगवान से वैर छोड़ दीजिए; मेरी बात को बहुत हितकारी जानकर मन में रखिए।
चौपाई 320
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥
जिसके दूत की करनी याद करते ही राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं—
चौपाई 321
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥
हे स्वामी, अगर भला चाहते हैं, तो अपने मंत्री के हाथ उनकी पत्नी को उनके पास भेज दीजिए।
चौपाई 322
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
सीता आपके कुल-रूपी कमल-वन के लिए दुख देने वाली ठंडी रात बनकर आई हैं।
चौपाई 323
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥
हे नाथ, सुनिए, सीता को लौटाए बिना शिव और ब्रह्मा भी आपका भला नहीं कर सकते।
दोहा
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक। जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥36॥
श्रीराम के बाण साँपों के झुंड जैसे हैं और राक्षस मेंढकों जैसे। जब तक वे इन्हें निगल न लें, तब तक ज़िद छोड़कर उपाय कर लीजिए।
चौपाई 324
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
उसकी बात कानों से सुनकर, संसार-प्रसिद्ध अभिमानी मूर्ख रावण हँस पड़ा।
चौपाई 325
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥
स्त्री का स्वभाव सचमुच डरपोक होता है; मंगल के समय में भी डरती है, मन बहुत कच्चा होता है।
चौपाई 326
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
अगर बंदरों की सेना आई, तो बेचारे राक्षसों को खाकर उनका पेट भरेगा।
चौपाई 327
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥
जिसके डर से लोकपाल काँपते हैं, उसकी पत्नी डरती है — यह बड़ी हँसी की बात है।
चौपाई 328
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
यह कहकर हँसते हुए उसने मंदोदरी को गले लगाया और बहुत ममता दिखाकर सभा में चला गया।
चौपाई 329
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥
मंदोदरी मन में चिंता करने लगीं कि विधाता पति के विरुद्ध हो गया है।
चौपाई 330
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥
सभा में बैठते ही उसे ख़बर मिली कि सारी सेना समुद्र के पार आ गई है।
चौपाई 331
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥
उसने मंत्रियों से उचित सलाह पूछी, तो वे सब हँसकर बोले — आप चुप रहिए (चिंता न कीजिए)।
चौपाई 332
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥
आपने देवताओं और असुरों को जीता, तब कोई मेहनत नहीं लगी; मनुष्य और बंदर तो किस गिनती में हैं?
दोहा
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥37॥
मंत्री, वैद्य और गुरु — ये तीन अगर डर से या लाभ की आशा से (सच छिपाकर) मीठी बातें करें, तो राज्य, धर्म और शरीर — तीनों जल्दी नष्ट हो जाते हैं।
चौपाई 333
सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
रावण के लिए वैसा ही संयोग बना; वे बार-बार सुना-सुनाकर उसकी तारीफ़ करते थे।
चौपाई 334
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥
सही अवसर जानकर विभीषण आए और बड़े भाई के चरणों में सिर झुकाया।
चौपाई 335
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥
फिर सिर झुकाकर अपने आसन पर बैठे और आज्ञा पाकर बोले—
चौपाई 336
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥
हे कृपालु, आपने मुझसे बात पूछी है, तो हे भाई, मैं अपनी बुद्धि के अनुसार भले की बात कहता हूँ।
चौपाई 337
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
जो अपना कल्याण, सुयश, अच्छी बुद्धि, शुभ गति और अनेक सुख चाहता है—
चौपाई 338
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥
हे स्वामी, उसे पराई स्त्री का मुख चौथ के चंद्रमा की तरह त्याग देना चाहिए (न देखना चाहिए)।
चौपाई 339
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
चाहे कोई चौदहों भुवनों का अकेला स्वामी हो, प्राणियों से द्रोह करके वह भी टिक नहीं सकता।
चौपाई 340
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥
जो मनुष्य गुणों का सागर और चतुर हो, थोड़ा-सा भी लोभ हो तो कोई उसे अच्छा नहीं कहता।
दोहा
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ। सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥38॥
हे नाथ, काम, क्रोध, मद और लोभ — ये सब नरक के रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर उन रघुवीर को भजिए, जिन्हें संत भजते हैं।
चौपाई 341
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
हे भाई, श्रीराम केवल मनुष्यों के राजा नहीं हैं; वे सारे लोकों के स्वामी और काल के भी काल हैं।
चौपाई 342
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥
वे ब्रह्म हैं — विकार रहित, अजन्मे, भगवान, सर्वव्यापक, अजेय, अनादि और अनंत।
चौपाई 343
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी॥
गाय, ब्राह्मण, पृथ्वी और देवताओं का हित करने वाले उन कृपासिंधु ने मनुष्य शरीर धारण किया है।
चौपाई 344
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥
हे भाई, सुनिए, वे भक्तों को आनंद देने वाले, दुष्टों के दल का नाश करने वाले, और वेद व धर्म के रक्षक हैं।
चौपाई 345
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
उनसे वैर छोड़कर उन्हें सिर झुकाइए; रघुनाथ शरणागत का दुख मिटाने वाले हैं।
चौपाई 346
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥
हे नाथ, प्रभु को वैदेही लौटा दीजिए और बिना कारण प्रेम करने वाले श्रीराम को भजिए।
चौपाई 347
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जिसे सारे संसार से द्रोह करने का पाप लगा हो, शरण में जाने पर प्रभु उसे भी नहीं त्यागते।
चौपाई 348
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥
हे रावण, मन में समझ लो कि जिनका नाम तीनों तापों को मिटाता है, वही प्रभु प्रकट हुए हैं।
दोहा
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस। परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥39(क)॥
हे दशशीश, मैं बार-बार आपके पैर पड़ता हूँ और विनती करता हूँ — मान, मोह और मद छोड़कर कोसलपति श्रीराम को भजिए।
दोहा
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात। तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥39(ख)॥
मुनि पुलस्त्य ने अपने शिष्य के हाथ यह बात कहला भेजी थी; हे भाई, अच्छा अवसर पाकर मैंने तुरंत वह आपसे कह दी।
चौपाई 349
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
रावण का माल्यवान नाम का एक बहुत बुद्धिमान मंत्री था; विभीषण की बात सुनकर उसे बहुत सुख हुआ।
चौपाई 350
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥
उसने कहा — हे तात, आपके छोटे भाई नीति के आभूषण हैं; विभीषण जो कहते हैं, उसे मन में रखिए।
चौपाई 351
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥
रावण बोला — ये दोनों मूर्ख शत्रु की बड़ाई कर रहे हैं; कोई है यहाँ? इन्हें दूर क्यों नहीं करते?
चौपाई 352
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥
तब माल्यवान अपने घर चला गया, और विभीषण फिर हाथ जोड़कर कहने लगे—
चौपाई 353
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
हे नाथ, पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि अच्छी बुद्धि और बुरी बुद्धि सबके हृदय में रहती है।
चौपाई 354
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
जहाँ अच्छी बुद्धि है, वहाँ तरह-तरह की संपत्ति रहती है; जहाँ बुरी बुद्धि है, वहाँ अंत में विपत्ति आती है।
चौपाई 355
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
आपके हृदय में उल्टी बुद्धि आ बसी है, इसलिए आप हित को अहित और शत्रु को मित्र मान रहे हैं।
चौपाई 356
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥
जो राक्षस कुल के लिए कालरात्रि (विनाश) है, उस सीता पर आपका इतना प्रेम है।
दोहा
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार। सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥40॥
हे भाई, मैं आपके चरण पकड़कर माँगता हूँ — मेरा दुलार रखिए; सीता को श्रीराम को लौटा दीजिए, जिससे आपका अहित न हो।
चौपाई 357
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥
विभीषण ने विद्वानों, पुराणों और वेदों से समर्थित नीति की बात समझाकर कही।
चौपाई 358
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥
यह सुनते ही रावण क्रोध से उठा — अरे दुष्ट, अब तेरी मौत पास आ गई है।
चौपाई 359
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
अरे मूर्ख, तू सदा मेरे सहारे जीता रहा, और तुझे शत्रु का पक्ष अच्छा लगता है!
चौपाई 360
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥
अरे दुष्ट, बता, संसार में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओं के बल से न जीता हो?
चौपाई 361
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
मेरे नगर में रहकर तपस्वियों से प्रेम करता है! मूर्ख, जा उन्हीं से मिल और उन्हें ही नीति सिखा।
चौपाई 362
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥
यह कहकर रावण ने विभीषण को लात मारी, फिर भी छोटे भाई ने बार-बार उसके पैर पकड़े।
चौपाई 363
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
(शिव जी कहते हैं) हे उमा, संत की यही बड़ाई है कि बुरा करने वाले का भी वे भला करते हैं।
चौपाई 364
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥
विभीषण बोले — आप पिता के समान हैं, आपने मुझे मारा, यह ठीक ही है; पर हे नाथ, आपका भला श्रीराम को भजने में ही है।
चौपाई 365
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥
फिर वे अपने मंत्रियों को साथ लेकर आकाश-मार्ग से चल पड़े और सबको सुनाकर यह कहा—
दोहा
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥
श्रीराम सत्य-संकल्प वाले प्रभु हैं, और हे रावण, तुम्हारी सभा काल के वश में है। मैं अब रघुवीर की शरण में जाता हूँ; मुझे दोष मत देना।
चौपाई 366
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयू हीन भए सब तबहीं॥
यह कहकर जैसे ही विभीषण चले, उसी पल सब राक्षस आयुहीन हो गए (उनकी मृत्यु निश्चित हो गई)।
चौपाई 367
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥
(शिव जी कहते हैं) हे भवानी, साधु का अपमान तुरंत ही सारे कल्याण का नाश कर देता है।
चौपाई 368
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
रावण ने जिस पल विभीषण को त्यागा, उसी पल वह अभागा वैभव से हीन हो गया।
चौपाई 369
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥
विभीषण मन में बहुत से मनोरथ करते हुए खुशी-खुशी रघुनाथ जी के पास चले।
चौपाई 370
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
मैं जाकर प्रभु के लाल, कोमल, सेवकों को सुख देने वाले चरण-कमलों के दर्शन करूँगा।
चौपाई 371
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥
जिन चरणों को छूकर ऋषि-पत्नी अहल्या तर गईं और जो दंडक वन को पवित्र करने वाले हैं—
चौपाई 372
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
जिन चरणों को जनकनंदिनी ने हृदय में बसाया है, और जो कपटी हिरण के पीछे धरती पर दौड़े थे—
चौपाई 373
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥
जो चरण-कमल शिव जी के हृदय-रूपी सरोवर में खिले रहते हैं — मेरा अहोभाग्य है कि मैं उन्हें देखूँगा।
दोहा
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ। ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥42॥
जिन चरणों की पादुकाओं में भरत जी ने अपना मन लगा रखा है, आज मैं अभी जाकर उन्हीं चरणों को इन आँखों से देखूँगा।
चौपाई 374
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥
इस तरह प्रेम से सोचते हुए वे तुरंत समुद्र के इस पार आ गए।
चौपाई 375
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥
वानरों ने विभीषण को आते देखा तो समझा कि यह शत्रु का कोई ख़ास दूत है।
चौपाई 376
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
उन्हें वहीं रोककर वे सुग्रीव के पास आए और सारा समाचार सुनाया।
चौपाई 377
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥
सुग्रीव बोले — हे रघुनाथ, सुनिए, रावण का भाई आपसे मिलने आया है।
चौपाई 378
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
प्रभु ने पूछा — मित्र, तुम्हारी क्या राय है? सुग्रीव बोले — हे नरनाथ, सुनिए—
चौपाई 379
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥
राक्षसों की माया समझी नहीं जाती; यह इच्छा से रूप बदलने वाला है, न जाने किस कारण आया है।
चौपाई 380
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
यह दुष्ट हमारा भेद लेने आया है; मुझे तो यही ठीक लगता है कि इसे बाँधकर रखा जाए।
चौपाई 381
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥
श्रीराम बोले — मित्र, तुमने नीति की बात अच्छी सोची; पर मेरा प्रण है कि मैं शरण में आए का डर दूर करता हूँ।
चौपाई 382
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥
प्रभु के वचन सुनकर हनुमान जी प्रसन्न हुए कि भगवान शरणागत से कितना प्रेम करते हैं।
दोहा
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥43॥
जो लोग अपने नुकसान का अनुमान लगाकर शरण में आए हुए को त्याग देते हैं, वे नीच और पापी हैं; उन्हें देखना भी हानिकारक है।
चौपाई 383
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या का पाप लगा हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता।
चौपाई 384
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
जीव जैसे ही मेरे सम्मुख होता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं।
चौपाई 385
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
पापी का सहज स्वभाव यह है कि मेरा भजन उसे कभी अच्छा नहीं लगता।
चौपाई 386
जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥
अगर वह सचमुच दुष्ट हृदय वाला होता, तो क्या मेरे सामने आता?
चौपाई 387
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
जो निर्मल मन वाला है, वही मुझे पाता है; मुझे कपट, छल और दोष अच्छे नहीं लगते।
चौपाई 388
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥
अगर रावण ने इसे भेद लेने भेजा भी है, तब भी हे सुग्रीव, हमें कोई डर या हानि नहीं है।
चौपाई 389
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
हे मित्र, संसार में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण उन सबको पल भर में मार सकते हैं।
चौपाई 390
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई॥
और अगर वह डरकर शरण में आया है, तो मैं उसे प्राणों की तरह रखूँगा।
दोहा
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत। जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत॥44॥
कृपा के धाम श्रीराम ने हँसकर कहा — दोनों ही हालत में उसे ले आओ। तब 'कृपालु की जय' कहते हुए सुग्रीव अंगद और हनुमान के साथ चले।
चौपाई 391
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
वानर आदर के साथ विभीषण को आगे करके वहाँ चले, जहाँ करुणा की खान रघुनाथ जी थे।
चौपाई 392
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥
विभीषण ने दूर से ही आँखों को आनंद देने वाले दोनों भाइयों को देखा।
चौपाई 393
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
फिर शोभा के धाम श्रीराम को देखकर वे ठिठककर रुक गए और पलक झपकाना भूलकर एकटक देखते रहे।
चौपाई 394
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥
प्रभु की लंबी भुजाएँ, लाल कमल जैसी आँखें, और शरण में आए का डर हरने वाला साँवला शरीर था।
चौपाई 395
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
सिंह जैसे कंधे, चौड़ी छाती शोभित थी, और उनका मुख अनगिनत कामदेवों का मन भी मोह लेता था।
चौपाई 396
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥
विभीषण की आँखों में आँसू आ गए, शरीर पुलकित हो गया; फिर मन में धीरज धरकर वे कोमल वचन बोले।
चौपाई 397
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
हे नाथ, मैं रावण का भाई हूँ; हे देवताओं के रक्षक, मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ है।
चौपाई 398
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥
मेरा शरीर तामसी है और स्वभाव से पाप मुझे प्रिय है, जैसे उल्लू को अंधेरे से प्रेम होता है।
दोहा
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर। त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥45॥
हे प्रभु, कानों से आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि आप संसार का भय मिटाने वाले हैं। हे दुख हरने वाले, शरणागत को सुख देने वाले रघुवीर, मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।
चौपाई 399
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
यह कहकर उन्हें दंडवत प्रणाम करते देखकर प्रभु बहुत प्रसन्न होकर तुरंत उठ खड़े हुए।
चौपाई 400
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥
दीन वचन सुनकर प्रभु के मन को अच्छा लगा; उन्होंने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उन्हें हृदय से लगा लिया।
चौपाई 401
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥
छोटे भाई सहित मिलकर उन्हें अपने पास बैठाया, और भक्तों का भय हरने वाले प्रभु बोले—
चौपाई 402
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥
हे लंकेश, परिवार सहित अपनी कुशल बताओ; तुम्हारा निवास बुरी जगह पर है।
चौपाई 403
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
दुष्टों की मंडली में तुम दिन-रात रहते हो; हे मित्र, तुम्हारा धर्म कैसे निभता है?
चौपाई 404
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥
मैं तुम्हारी सारी रीति जानता हूँ; तुम नीति में बहुत निपुण हो और तुम्हें अनीति अच्छी नहीं लगती।
चौपाई 405
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
हे तात, नरक में रहना भले अच्छा है, पर विधाता दुष्ट का संग कभी न दे।
चौपाई 406
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया॥
विभीषण बोले — हे रघुनाथ, आपने मुझे अपना जानकर दया की है; अब आपके चरण देखकर मैं कुशल हूँ।
दोहा
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥
जब तक जीव शोक के घर — कामनाओं — को छोड़कर श्रीराम को नहीं भजता, तब तक उसकी कुशल नहीं होती और सपने में भी मन को शांति नहीं मिलती।
चौपाई 407
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
तब तक हृदय में लोभ, मोह, ईर्ष्या, मद और मान जैसे अनेक दुष्ट रहते हैं—
चौपाई 408
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥
जब तक धनुष-बाण धारण किए और कमर में तरकश बाँधे रघुनाथ हृदय में नहीं बसते।
चौपाई 409
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
ममता घनी अँधेरी रात है, जो राग और द्वेष रूपी उल्लुओं को सुख देती है।
चौपाई 410
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥
वह रात तभी तक जीव के मन में रहती है, जब तक प्रभु के प्रताप का सूरज नहीं उगता।
चौपाई 411
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
हे राम, अब आपके चरण-कमल देखकर मैं कुशल हूँ और मेरे भारी भय मिट गए हैं।
चौपाई 412
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥
हे कृपालु, जिस पर आप प्रसन्न हैं, उसे संसार के तीनों तरह के दुख नहीं सताते।
चौपाई 413
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
मैं अत्यंत नीच स्वभाव वाला राक्षस हूँ; मैंने कभी कोई अच्छा आचरण नहीं किया।
चौपाई 414
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥
जिनका रूप मुनियों के ध्यान में भी नहीं आता, उन प्रभु ने प्रसन्न होकर मुझे हृदय से लगा लिया।
दोहा
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज। देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥47॥
हे कृपा और सुख के पुंज श्रीराम, मेरा सौभाग्य अपार है कि मैंने ब्रह्मा और शिव द्वारा पूजे जाने वाले आपके दोनों चरण-कमलों को अपनी आँखों से देखा।
चौपाई 415
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
श्रीराम बोले — हे मित्र, सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव बताता हूँ, जिसे काकभुशुंडि, शिव और पार्वती जानते हैं।
चौपाई 416
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥
अगर कोई मनुष्य सारे जगत का द्रोही हो, और डरकर मेरी शरण देखकर आ जाए—
चौपाई 417
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
और मद, मोह, कपट और तरह-तरह के छल छोड़ दे, तो मैं उसे तुरंत साधु के समान बना देता हूँ।
चौपाई 418
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥
माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार—
चौपाई 419
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
इन सबकी ममता के धागे बटोरकर, उनकी रस्सी बटकर जो अपने मन को मेरे चरणों से बाँध देता है—
चौपाई 420
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥
जो सबको समान देखता है, जिसकी कोई इच्छा नहीं, और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं—
चौपाई 421
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
ऐसा सज्जन मेरे हृदय में वैसे ही बसता है, जैसे लोभी के हृदय में धन बसता है।
चौपाई 422
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥
तुम्हारे जैसे संत मुझे प्रिय हैं; मैं और किसी के कहने से नहीं (उन्हीं के लिए) शरीर धारण करता हूँ।
दोहा
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥48॥
जो सगुण भगवान के उपासक हैं, दूसरों के हित में लगे रहते हैं, नीति और नियमों में दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों से प्रेम है — वे मनुष्य मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं।
चौपाई 423
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
हे लंकेश, सुनो, तुम में ये सब गुण हैं, इसलिए तुम मुझे बहुत प्रिय हो।
चौपाई 424
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥
श्रीराम के वचन सुनकर वानरों के सब झुंड कहने लगे — कृपा के समूह प्रभु की जय हो।
चौपाई 425
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
प्रभु की वाणी सुनकर विभीषण को उसे कानों का अमृत जानकर तृप्ति ही नहीं होती थी।
चौपाई 426
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥
वे बार-बार प्रभु के चरण-कमल पकड़ते थे; उनका अपार प्रेम हृदय में समा नहीं रहा था।
चौपाई 427
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
हे देव, हे चर-अचर के स्वामी, शरणागत के रक्षक, सबके हृदय की जानने वाले, सुनिए—
चौपाई 428
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥
मेरे मन में पहले कुछ वासना (राज्य की इच्छा) थी, वह प्रभु के चरणों की प्रीति की नदी में बह गई।
चौपाई 429
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
हे कृपालु, अब मुझे अपनी पवित्र भक्ति दीजिए, जो शिव जी के मन को सदा प्रिय है।
चौपाई 430
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥
रण में धीर प्रभु ने 'ऐसा ही हो' कहकर तुरंत समुद्र का जल मँगवाया।
चौपाई 431
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
और कहा — हे मित्र, यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, फिर भी संसार में मेरा दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता।
चौपाई 432
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥
यह कहकर श्रीराम ने उनका राजतिलक कर दिया, और आकाश से फूलों की अपार वर्षा हुई।
दोहा
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड॥49(क)॥
अपनी साँस की प्रचंड हवा से भड़कती रावण के क्रोध की आग में जलते हुए विभीषण को प्रभु ने बचा लिया और उन्हें अखंड राज्य दे दिया।
दोहा
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ॥49(ख)॥
जो संपत्ति शिव जी ने रावण को उसके दस सिर चढ़ाने पर दी थी, वही संपत्ति रघुनाथ जी ने संकोच करते हुए विभीषण को दे दी।
चौपाई 433
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
ऐसे प्रभु को छोड़कर जो दूसरों को भजते हैं, वे बिना सींग-पूँछ के पशु हैं।
चौपाई 434
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥
प्रभु ने विभीषण को अपना जन जानकर अपना लिया; प्रभु का यह स्वभाव वानर कुल को बहुत अच्छा लगा।
चौपाई 435
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
फिर सब कुछ जानने वाले, सबके हृदय में बसने वाले, सर्वरूप और सबसे अलग, उदासीन प्रभु—
चौपाई 436
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥
नीति की रक्षा करने वाले, कारणवश मनुष्य बने और दानव कुल का नाश करने वाले श्रीराम बोले—
चौपाई 437
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
हे वीर सुग्रीव और लंकापति विभीषण, सुनो — इस गहरे समुद्र को किस तरह पार किया जाए?
चौपाई 438
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥
यह मगरमच्छों, साँपों और मछलियों से भरा है, बहुत गहरा है और हर तरह से पार करना कठिन है।
चौपाई 439
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
विभीषण बोले — हे रघुनाथ, सुनिए, आपका एक बाण करोड़ों समुद्र सुखा सकता है।
चौपाई 440
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥
फिर भी नीति यह कहती है कि पहले जाकर समुद्र से विनती की जाए।
दोहा
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥50॥
हे प्रभु, समुद्र आपके कुल के गुरु (पूर्वज) हैं; वे सोचकर उपाय बताएँगे, और बिना मेहनत के सारी भालू-वानर सेना पार हो जाएगी।
चौपाई 441
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
श्रीराम बोले — मित्र, तुमने अच्छा उपाय बताया; यही करें, अगर दैव सहायक हो।
चौपाई 442
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥
यह सलाह लक्ष्मण जी के मन को अच्छी नहीं लगी; श्रीराम के वचन सुनकर उन्हें बहुत दुख हुआ।
चौपाई 443
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
लक्ष्मण बोले — हे नाथ, दैव का क्या भरोसा? मन में क्रोध कीजिए और समुद्र को सुखा दीजिए।
चौपाई 444
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥
दैव तो कायर मन का एकमात्र सहारा है; आलसी लोग ही 'दैव-दैव' पुकारते हैं।
चौपाई 445
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
यह सुनकर रघुवीर हँसकर बोले — ऐसा ही करेंगे, मन में धीरज रखो।
चौपाई 446
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥
यह कहकर छोटे भाई को समझाकर रघुनाथ जी समुद्र के पास गए।
चौपाई 447
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
पहले उन्होंने सिर झुकाकर प्रणाम किया, फिर किनारे पर कुश बिछाकर बैठ गए।
चौपाई 448
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥
जब विभीषण प्रभु के पास आए थे, तभी उनके पीछे रावण ने दूत भेजे थे।
दोहा
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥51॥
उन दूतों ने कपट से वानर का रूप धरकर सारी लीला देखी, और शरणागत पर प्रभु का प्रेम देखकर मन ही मन उनके गुणों की सराहना करने लगे।
चौपाई 449
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
वे खुलकर श्रीराम के स्वभाव की प्रशंसा करने लगे; प्रेम में डूबकर वे अपना छिपना भूल गए।
चौपाई 450
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥
तब वानरों ने जान लिया कि ये शत्रु के दूत हैं, और सबको बाँधकर सुग्रीव के पास ले आए।
चौपाई 451
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
सुग्रीव बोले — सब वानरो, सुनो, इन राक्षसों के अंग-भंग करके भेज दो।
चौपाई 452
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहुँ पास फिराए॥
सुग्रीव की बात सुनकर वानर दौड़े और दूतों को बाँधकर सेना के चारों ओर घुमाया।
चौपाई 453
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
वानर उन्हें तरह-तरह से मारने लगे; वे दीन होकर पुकारते रहे, फिर भी वानरों ने उन्हें नहीं छोड़ा।
चौपाई 454
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥
तब दूतों ने पुकारा — जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलपति श्रीराम की सौगंध है।
चौपाई 455
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
यह सुनकर लक्ष्मण जी ने सबको पास बुलाया और दया करके, हँसकर तुरंत उन्हें छुड़ा दिया।
चौपाई 456
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥
और कहा — यह पत्र रावण को देना और कहना — हे कुलनाशक, लक्ष्मण के वचन पढ़।
दोहा
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार। सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार॥52॥
फिर उस मूर्ख से मेरा उदार संदेश मुँह से भी कहना — सीता जी को लौटाकर (श्रीराम से) मिल ले, नहीं तो तेरा काल आ गया है।
चौपाई 457
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
दूत तुरंत लक्ष्मण जी के चरणों में सिर झुकाकर श्रीराम के गुणों की कथा कहते हुए चल पड़े।
चौपाई 458
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥
श्रीराम का यश कहते हुए वे लंका आए और रावण के चरणों में सिर झुकाया।
चौपाई 459
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
रावण ने हँसकर पूछा — अरे शुक, अपनी कुशल क्यों नहीं बताता?
चौपाई 460
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥
फिर विभीषण की ख़बर बता, जिसकी मौत बहुत पास आ गई है।
चौपाई 461
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी॥
मूर्ख ने राज करती हुई लंका छोड़ दी; अब वह अभागा जौ के कीड़े की तरह (जौ के साथ पिसकर) मरेगा।
चौपाई 462
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥
फिर भालुओं और वानरों की सेना का हाल बता, जो कठोर काल की प्रेरणा से यहाँ चली आई है।
चौपाई 463
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
जिनके जीवन का रक्षक कोमल हृदय वाला बेचारा समुद्र बन गया है (वरना राक्षस उन्हें खा जाते)।
चौपाई 464
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥
फिर उन तपस्वियों की बात बता, जिनके हृदय में मेरा बड़ा डर है।
दोहा
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर। कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥53॥
उनसे तेरी भेंट हुई या वे मेरा सुयश सुनकर लौट गए? शत्रु सेना का तेज और बल क्यों नहीं बताता? तेरा मन बहुत चकित लग रहा है।
चौपाई 465
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
दूत बोला — हे नाथ, आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरी बात मानिए।
चौपाई 466
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥
जब आपका छोटा भाई जाकर श्रीराम से मिला, तो पहुँचते ही श्रीराम ने उसका राजतिलक कर दिया।
चौपाई 467
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥
हमें रावण के दूत सुनकर वानरों ने बाँध लिया और बहुत कष्ट दिए।
चौपाई 468
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे॥
वे हमारे कान और नाक काटने लगे, तब हमने श्रीराम की सौगंध दी, तो उन्होंने हमें छोड़ दिया।
चौपाई 469
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
हे नाथ, आपने श्रीराम की सेना के बारे में पूछा — उसका वर्णन सौ करोड़ मुखों से भी नहीं हो सकता।
चौपाई 470
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥
अनेक रंगों के भालू और वानरों की सेना है — भयानक मुख वाले, विशाल और डरावने।
चौपाई 471
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
जिसने नगर जलाया और आपके पुत्र को मारा, सब वानरों में उसका बल सबसे कम है।
चौपाई 472
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥
अनगिनत नामों वाले कठोर, भयानक योद्धा हैं, जिनमें अनगिनत हाथियों का बल है और जो बहुत विशाल हैं।
दोहा
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि। दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥54॥
द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और बल की राशि जाम्बवान (जैसे योद्धा हैं)।
चौपाई 473
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
ये सब वानर सुग्रीव के समान बलवान हैं, और इनके जैसे करोड़ों हैं — उन्हें कौन गिन सकता है?
चौपाई 474
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं॥
श्रीराम की कृपा से उनमें अतुलनीय बल है; वे तीनों लोकों को तिनके के समान समझते हैं।
चौपाई 475
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
हे दशकंधर, मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो केवल सेनापति बंदर हैं।
चौपाई 476
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥
हे नाथ, उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं है, जो युद्ध में आपको न जीत सके।
चौपाई 477
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
वे सब बहुत क्रोध में हाथ मलते हैं, पर रघुनाथ जी आज्ञा नहीं देते।
चौपाई 478
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥
वे कहते हैं — हम मछलियों और साँपों सहित समुद्र को सुखा देंगे, नहीं तो बड़े-बड़े पर्वतों से उसे भर देंगे।
चौपाई 479
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
और रावण को मसलकर धूल में मिला देंगे — सब वानर ऐसी ही बातें कहते हैं।
चौपाई 480
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥
वे स्वभाव से निडर होकर गरजते और ललकारते हैं, मानो लंका को निगल जाना चाहते हों।
दोहा
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥55॥
सब भालू और वानर स्वभाव से ही शूरवीर हैं, और फिर उनके सिर पर प्रभु श्रीराम हैं। हे रावण, वे करोड़ों कालों को भी युद्ध में जीत सकते हैं।
चौपाई 481
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
श्रीराम के तेज, बल और बुद्धि की महानता को लाखों शेषनाग भी नहीं गा सकते।
चौपाई 482
सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥
वे एक ही बाण से सैकड़ों समुद्र सुखा सकते हैं, फिर भी नीति में निपुण श्रीराम ने आपके भाई से (उपाय) पूछा।
चौपाई 483
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
उनकी बात सुनकर वे समुद्र से रास्ता माँग रहे हैं; उनके मन में दया भरी है।
चौपाई 484
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥
दूत की बात सुनकर रावण हँसा — जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरों को सहायक बनाया है!
चौपाई 485
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥
स्वभाव से डरपोक (विभीषण) की बात पक्की मानकर समुद्र से बच्चों जैसी ज़िद ठानी है।
चौपाई 486
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥
अरे मूर्ख, झूठी बड़ाई क्या करता है? मैंने शत्रु के बल और बुद्धि की थाह पा ली है।
चौपाई 487
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥
जिसके डरपोक विभीषण जैसे मंत्री हों, उसे संसार में विजय और वैभव कहाँ मिलेगा?
चौपाई 488
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥
दुष्ट की बात सुनकर दूत का क्रोध बढ़ गया, और मौका देखकर उसने पत्र निकाला।
चौपाई 489
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
हे नाथ, श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पत्र दिया है; इसे पढ़वाकर अपनी छाती ठंडी कीजिए।
चौपाई 490
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥
रावण ने हँसकर बाएँ हाथ से पत्र लिया और मंत्री को बुलाकर वह मूर्ख उसे पढ़वाने लगा।
दोहा
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥56(क)॥
(पत्र में लिखा था) अरे मूर्ख, बातों से मन बहलाकर अपने कुल का नाश मत कर। श्रीराम से विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा या शिव की शरण में जाकर भी नहीं बचेगा।
दोहा
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥56(ख)॥
या तो घमंड छोड़कर अपने छोटे भाई की तरह प्रभु के चरण-कमलों का भौंरा बन जा, या फिर हे दुष्ट, श्रीराम के बाण-रूपी आग में अपने कुल सहित पतंगा बन जा।
चौपाई 491
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
यह सुनकर रावण मन में डर गया, पर मुँह से मुस्कुराते हुए सबको सुनाकर बोला—
चौपाई 492
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥
जैसे कोई ज़मीन पर पड़ा हुआ आकाश पकड़ने की कोशिश करे, वैसी ही इस छोटे तपस्वी की बड़ी-बड़ी बातें हैं।
चौपाई 493
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
शुक बोला — हे नाथ, ये सब बातें सच हैं; अपना अभिमानी स्वभाव छोड़कर समझिए।
चौपाई 494
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥
क्रोध छोड़कर मेरी बात सुनिए — हे नाथ, श्रीराम से विरोध छोड़ दीजिए।
चौपाई 495
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
रघुवीर का स्वभाव बहुत कोमल है, यद्यपि वे सारे लोकों के राजा हैं।
चौपाई 496
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥
मिलते ही प्रभु आप पर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध मन में नहीं रखेंगे।
चौपाई 497
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
जनकनंदिनी को रघुनाथ जी को लौटा दीजिए — हे प्रभु, मेरा इतना कहना मान लीजिए।
चौपाई 498
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥
जब उसने वैदेही को लौटाने की बात कही, तो दुष्ट रावण ने उसे लात मारी।
चौपाई 499
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
वह भी रावण के चरणों में सिर झुकाकर वहाँ चला गया, जहाँ कृपा के सागर रघुनाथ जी थे।
चौपाई 500
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥
प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनाई और श्रीराम की कृपा से अपनी पुरानी गति (मुनि रूप) पा ली।
चौपाई 501
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
(शिव जी कहते हैं) हे भवानी, वह पहले ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषि के शाप से राक्षस बन गया था।
चौपाई 502
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥
श्रीराम के चरणों की बार-बार वंदना करके वे मुनि अपने आश्रम चले गए।
दोहा
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥
तीन दिन बीत गए, पर जड़ समुद्र ने विनती नहीं मानी। तब श्रीराम क्रोध से बोले — भय के बिना प्रीति नहीं होती।
चौपाई 503
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥
हे लक्ष्मण, धनुष-बाण लाओ; मैं अग्निबाण से समुद्र को सुखा दूँगा।
चौपाई 504
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥
मूर्ख से विनती, कुटिल से प्रीति, स्वभाव से कंजूस को उदारता की सुंदर सीख—
चौपाई 505
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
ममता में डूबे को ज्ञान की कथा, बहुत लोभी को वैराग्य का उपदेश—
चौपाई 506
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
क्रोधी को शांति की और कामी को भगवान की कथा — ये सब ऊसर में बीज बोने जैसे बेकार हैं।
चौपाई 507
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
यह कहकर रघुनाथ जी ने धनुष चढ़ाया; यह बात लक्ष्मण जी के मन को अच्छी लगी।
चौपाई 508
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥
प्रभु ने भयानक बाण चढ़ाया, तो समुद्र के हृदय में भीतर ज्वाला उठी।
चौपाई 509
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
मगर, साँप और मछलियों के झुंड व्याकुल हो गए; जब समुद्र ने जीवों को जलते देखा—
चौपाई 510
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥
तब वह सोने के थाल में तरह-तरह के रत्न भरकर, घमंड छोड़कर ब्राह्मण का रूप धरकर आया।
दोहा
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच। बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥58॥
(काकभुशुंडि जी कहते हैं) हे गरुड़, सुनो — कोई करोड़ उपाय करके सींचे, केला तो काटने पर ही फलता है; वैसे ही नीच विनती नहीं मानता, डाँटने पर ही झुकता है।
चौपाई 511
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
समुद्र ने डरकर प्रभु के चरण पकड़ लिए — हे नाथ, मेरे सब दोष क्षमा कीजिए।
चौपाई 512
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥
हे नाथ, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी — इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है।
चौपाई 513
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है — सब ग्रंथ ऐसा ही कहते हैं।
चौपाई 514
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई॥
प्रभु की आज्ञा जिसके लिए जैसी है, वह उसी तरह रहने में सुख पाता है।
चौपाई 515
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे सीख दी; पर मेरी मर्यादा (सीमा) भी तो आपकी ही बनाई हुई है।
चौपाई 516
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी — ये सब ताड़ना के अधिकारी हैं। (समुद्र के इस कथन की परंपरा में कई व्याख्याएँ हैं; बहुत से विद्वान 'ताड़ना' का अर्थ ध्यान से देखना और सही दिशा देना बताते हैं।)
चौपाई 517
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जाएगी, पर इसमें मेरी बड़ाई नहीं होगी।
चौपाई 518
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥
प्रभु की आज्ञा अटल है, वेद ऐसा गाते हैं; जो आपको अच्छा लगे, मैं वही तुरंत करूँ।
दोहा
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ। जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥59॥
समुद्र के अत्यंत विनम्र वचन सुनकर कृपालु श्रीराम मुस्कुराकर बोले — हे तात, वह उपाय बताओ जिससे वानर सेना पार उतरे।
चौपाई 519
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई॥
समुद्र बोला — हे नाथ, नील और नल दो वानर भाई हैं, जिन्हें बचपन में ऋषि से आशीर्वाद मिला था।
चौपाई 520
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥
उनके छूने से भारी पर्वत भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैरने लगेंगे।
चौपाई 521
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
मैं भी प्रभु की प्रभुता को हृदय में रखकर अपनी शक्ति भर सहायता करूँगा।
चौपाई 522
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥
हे नाथ, इस तरह समुद्र पर पुल बँधवाइए, जिससे तीनों लोकों में आपका यह सुयश गाया जाए।
चौपाई 523
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
हे नाथ, इस बाण से मेरे उत्तरी किनारे पर रहने वाले पापों के ढेर दुष्ट लोगों को मार दीजिए।
चौपाई 524
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥
यह सुनकर कृपालु और रण में धीर श्रीराम ने समुद्र के मन की पीड़ा तुरंत हर ली।
चौपाई 525
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
श्रीराम का भारी बल और पराक्रम देखकर समुद्र प्रसन्न और सुखी हो गया।
चौपाई 526
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥
उसने सारी बात प्रभु को कह सुनाई और चरणों की वंदना करके चला गया।
पद 9
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ। यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना। तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
समुद्र अपने घर गया; श्रीरघुनाथ जी को यह सलाह अच्छी लगी। कलियुग के पापों को हरने वाला यह चरित्र तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है। रघुनाथ जी के गुण सुख के धाम, संदेह मिटाने वाले और दुख का नाश करने वाले हैं — अरे मूर्ख मन, सब आशा-भरोसा छोड़कर सदा इन्हें ही गा और सुन।
दोहा
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥60॥
रघुनाथ जी का गुणगान सब तरह के सुंदर मंगल देने वाला है। जो इसे आदर से सुनते हैं, वे बिना किसी जहाज़ के ही संसार-सागर से पार हो जाते हैं।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सुंदरकांड का पाठ करने में कितना समय लगता है?
सामान्य गति से पढ़ने पर संपूर्ण सुंदरकांड का पाठ लगभग 1.5 से 2 घंटे में होता है। समूह में संगीत के साथ गाने पर इसमें 2.5 से 3 घंटे भी लग सकते हैं।
सुंदरकांड का पाठ किस दिन करना चाहिए?
परंपरा में मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी का दिन माना जाता है, इसलिए इन दिनों सुंदरकांड का पाठ विशेष रूप से किया जाता है। हनुमान जयंती, गृह प्रवेश या किसी शुभ काम की शुरुआत पर भी भक्त इसका पाठ करते हैं; श्रद्धा से किसी भी दिन पाठ किया जा सकता है।
सुंदरकांड का पाठ कैसे करें?
स्नान करके साफ़ जगह पर श्रीराम और हनुमान जी का चित्र रखें, दीपक जलाएँ और गुरु, गणेश व हनुमान जी का स्मरण करें। फिर शुरुआत के श्लोकों से लेकर 60वें दोहे तक बिना जल्दबाज़ी के, एक बैठक में पाठ करें। अंत में हनुमान जी की आरती करें और प्रसाद बाँटें।