रुद्राष्टकम् (नमामीशमीशान) — अर्थ सहित

रुद्राष्टकम् गोस्वामी तुलसीदास की संस्कृत स्तुति है, जो रामचरितमानस के उत्तरकांड में आती है। कथा के अनुसार एक ब्राह्मण ने अपने शिष्य के लिए भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु यह स्तुति गाई थी। यह सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि पर बहुत गाई जाती है।

8 श्लोक + फलश्रुति · लगभग 5 मिनट

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥१॥

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्। करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम्॥२॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥३॥

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्। मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि॥४॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्। त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥५॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी। चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥६॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्। न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥७॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्। जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥८॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥९॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रुद्राष्टकम् किसने लिखा?

गोस्वामी तुलसीदास ने। यह रामचरितमानस के उत्तरकांड में आता है, जहाँ काकभुशुंडि जी की कथा में उनके गुरु इसे शिव जी के सामने गाते हैं।

रुद्राष्टकम् कब पढ़ना चाहिए?

इसे रोज़ सुबह या शाम शिव पूजा के समय पढ़ा जा सकता है। सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

क्या रुद्राष्टकम् और रुद्री पाठ एक ही हैं?

नहीं। रुद्री पाठ यजुर्वेद के रुद्र सूक्त से है, जबकि रुद्राष्टकम् तुलसीदास जी की आठ श्लोकों की छोटी और सरल स्तुति है।

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