ॐ जय शिव ओंकारा आरती — अर्थ सहित

'ॐ जय शिव ओंकारा' भगवान शिव की सबसे लोकप्रिय आरती है। इसमें शिव को ओंकार का रूप बताया गया है, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों एक हैं। अंतिम पद में 'शिवानंद स्वामी' का नाम आता है। सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि की पूजा के अंत में इसे विशेष रूप से गाया जाता है।

13 पद · लगभग 6 मिनट

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी। त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी। सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा। पार्वती अर्द्धांगी शिवलहरी गंगा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा। भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला। शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, सुख संपति पावे॥

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव जी की आरती कब गानी चाहिए?

सुबह और शाम की शिव पूजा के अंत में, अभिषेक और शिव चालीसा के बाद। सोमवार, सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर इसे विशेष रूप से गाया जाता है।

'ॐ जय शिव ओंकारा' किसने लिखी?

आरती के अंतिम पद में 'कहत शिवानंद स्वामी' आता है, इसलिए परंपरा से इसे शिवानंद स्वामी की रचना माना जाता है। उनके बारे में पक्की ऐतिहासिक जानकारी कम मिलती है।

इस आरती में ब्रह्मा और विष्णु का नाम क्यों आता है?

आरती का भाव है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव अलग नहीं हैं — तीनों ॐ में एक हैं। इसलिए शिव को 'ओंकारा' कहकर तीनों रूपों की स्तुति की गई है।

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