निर्वाण षटकम् (शिवोऽहम् शिवोऽहम्) — अर्थ सहित

निर्वाण षटकम् (आत्म षटकम्) आदि शंकराचार्य की छह श्लोकों की रचना है। परंपरा कहती है कि बालक शंकर ने गुरु गोविंदपाद के पूछने पर 'तुम कौन हो?' का उत्तर इन श्लोकों में दिया। इसमें बताया गया है कि मैं शरीर, मन या इंद्रियाँ नहीं — मैं चेतना और आनंद रूप शिव हूँ।

6 श्लोक · लगभग 4 मिनट

मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे। न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥१॥

न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः। न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥२॥

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः। न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥३॥

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः। अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥४॥

न मे मृत्युशङ्का न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्म। न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥५॥

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्। न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥६॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

निर्वाण षटकम् किसने लिखा?

आदि शंकराचार्य ने। परंपरा के अनुसार नर्मदा तट पर गुरु गोविंदपाद ने जब बालक शंकर से पूछा 'तुम कौन हो?', तो उन्होंने ये छह श्लोक कहे।

'शिवोऽहम्' का क्या अर्थ है?

'शिवोऽहम्' यानी 'मैं शिव हूँ'। यह अद्वैत वेदांत का भाव है कि हमारा असली स्वरूप शरीर या मन नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना है, जो शिव से अलग नहीं।

इसे कब पढ़ना या सुनना चाहिए?

ध्यान से पहले या बाद में, सुबह या रात को शांत मन से। महाशिवरात्रि पर भी इसे बहुत गाया जाता है। अर्थ समझकर धीरे-धीरे पढ़ना सबसे अच्छा है।

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