गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र — अर्थ सहित
श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध, तीसरे अध्याय की यह स्तुति गजराज गजेन्द्र ने तब की, जब सरोवर में एक ग्राह ने उसका पैर पकड़ लिया और उसकी अपनी ताक़त जवाब दे गई। तब उसने पूरी शरणागति से भगवान को पुकारा और श्रीहरि ने आकर उसे छुड़ाया। संकट के समय और रोज़ सुबह इसका पाठ करने की परंपरा है।
श्रीशुक उवाच एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि। जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्॥१॥
गजेन्द्र उवाच ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्। पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥२॥
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम्। योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम्॥३॥
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम्। अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः॥४॥
कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु। तमस्तदासीद् गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः॥५॥
न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु- र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम्। यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु॥६॥
दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः। चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः॥७॥
न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा। तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति॥८॥
तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये। अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे॥९॥
नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने। नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि॥१०॥
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता। नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे॥११॥
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे। निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥१२॥
क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे। पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः॥१३॥
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे। असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः॥१४॥
नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय। सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय॥१५॥
गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय। नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम- स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि॥१६॥
मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय। स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत- प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते॥१७॥
आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै- र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय। मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय॥१८॥
यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति। किं चाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम्॥१९॥
एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः। अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः॥२०॥
तमक्षरं ब्रह्म परं परेश- मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम्। अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर- मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे॥२१॥
यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः। नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः॥२२॥
यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः। तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः॥२३॥
स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ् न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः। नायं गुणः कर्म न सन्न चास- न्निषेधशेषो जयतादशेषः॥२४॥
जिजीविषे नाहमिहामुया कि- मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या। इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव- स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम्॥२५॥
सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम्। विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम्॥२६॥
योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते। योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम्॥२७॥
नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग- शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय। प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने॥२८॥
नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम्। तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम्॥२९॥
श्रीशुक उवाच एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिदाभिमानाः। नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात् तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत्॥३०॥
तं तद्वदार्त उपलभ्य जगन्निवासः स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः। छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान- श्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः॥३१॥
सोऽन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम्। उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा- न्नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते॥३२॥
तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार। ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुच्छ्रियाणाम्॥३३॥
अर्थ
पद 1
श्रीशुक उवाच एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि। जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्॥१॥
शुकदेव जी कहते हैं — ऐसा बुद्धि से निश्चय करके गजराज ने अपना मन हृदय में स्थिर किया। फिर उसने वह श्रेष्ठ स्तुति जपनी शुरू की, जो उसने पिछले जन्म में सीखी थी।
पद 2
गजेन्द्र उवाच ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्। पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥२॥
गजेन्द्र कहता है — उन भगवान को नमस्कार, जिनसे यह चेतन संसार प्रकट होता है। जो आदि पुरुष हैं, सबके मूल बीज हैं और परमेश्वर हैं, मैं उनका ध्यान करता हूँ।
पद 3
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम्। योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम्॥३॥
जिनमें यह जगत टिका है, जिनसे यह निकला है, जिनके द्वारा यह बना है और जो स्वयं यह जगत भी हैं — फिर भी जो इससे और इसके कारण से भी परे हैं — उन स्वयंभू प्रभु की मैं शरण लेता हूँ।
पद 4
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम्। अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः॥४॥
अपनी माया से अपने ही भीतर रचा यह संसार कभी प्रकट होता है, कभी छिप जाता है; प्रभु बिना धुंधलाई दृष्टि से दोनों अवस्थाओं को साक्षी बनकर देखते हैं। जो स्वयं अपना मूल हैं और सबसे परे हैं, वे मेरी रक्षा करें।
पद 5
कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु। तमस्तदासीद् गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः॥५॥
जब समय आने पर सारे लोक, उनके पालक और सब कारण पूरी तरह विलीन हो जाते हैं, तब केवल घना, गहरा अंधकार रह जाता है। उस अंधकार के भी पार जो सर्वव्यापी प्रभु प्रकाशित रहते हैं (वे मेरी रक्षा करें)।
पद 6
न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु- र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम्। यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु॥६॥
जिनके स्वरूप को देवता और ऋषि भी नहीं जानते, तो साधारण प्राणी उन तक पहुँचने या उनका वर्णन करने का साहस कैसे करे? जैसे अनेक वेश बदलने वाले अभिनेता को दर्शक नहीं पहचान पाते, वैसे ही जिनकी लीला समझ से परे है, वे मेरी रक्षा करें।
पद 7
दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः। चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः॥७॥
जिनके मंगलमय चरणों के दर्शन की इच्छा से आसक्ति छोड़ चुके साधु-मुनि वन में कठोर और निर्दोष व्रत करते हैं, और सब प्राणियों को अपना मानकर सबके मित्र बने रहते हैं — वही प्रभु मेरी गति हैं।
पद 8
न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा। तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति॥८॥
प्रभु का न जन्म है, न कर्म, न नाम-रूप, न गुण-दोष। फिर भी संसार की रचना और प्रलय के लिए वे समय-समय पर अपनी शक्ति से ये सब धारण कर लेते हैं।
पद 9
तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये। अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे॥९॥
उन परमेश्वर, अनंत शक्ति वाले ब्रह्म को नमस्कार। जो रूपरहित होकर भी अनेक रूपों वाले हैं और जिनके कर्म अद्भुत हैं, उन्हें नमस्कार।
पद 10
नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने। नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि॥१०॥
जो स्वयं प्रकाशित हैं, सबके साक्षी और परमात्मा हैं, उन्हें नमस्कार। जो वाणी, मन और चित्त की पहुँच से बहुत दूर हैं, उन्हें नमस्कार।
पद 11
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता। नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे॥११॥
जिन्हें ज्ञानी लोग शुद्ध मन और निष्काम भाव से पाते हैं, उन्हें नमस्कार। जो मोक्ष के स्वामी हैं और परम शांति के आनंद का अनुभव कराते हैं, उन्हें नमस्कार।
पद 12
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे। निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥१२॥
जो गुणों के अनुसार शांत, उग्र और जड़ रूप में दिखते हैं, उन्हें नमस्कार। जो भेद से रहित, सबमें समान और ज्ञान के घन रूप हैं, उन्हें नमस्कार।
पद 13
क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे। पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः॥१३॥
हे प्रभु, आप शरीरों के भीतर बसने वाले ज्ञाता, सबके स्वामी और साक्षी हैं — आपको नमस्कार। आप स्वयं अपने मूल परम पुरुष हैं और प्रकृति के भी मूल हैं — आपको नमस्कार।
पद 14
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे। असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः॥१४॥
आप सब इंद्रियों और उनके विषयों के द्रष्टा हैं और हर अनुभव के कारण हैं। जैसे छाया से वस्तु का पता चलता है, वैसे ही इस नश्वर जगत से आपका संकेत मिलता है; सत्य रूप में झलकने वाले आपको नमस्कार।
पद 15
नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय। सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय॥१५॥
आप सबके कारण हैं, पर आपका कोई कारण नहीं — ऐसे अद्भुत कारण रूप आपको बार-बार नमस्कार। आप सब शास्त्रों और वेदों के महासागर हैं, मोक्ष स्वरूप हैं और संतों के परम आश्रय हैं — आपको नमस्कार।
पद 16
गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय। नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम- स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि॥१६॥
जैसे लकड़ी में आग छिपी रहती है, वैसे ही गुणों में ढकी चेतना के रूप में आप रहते हैं, और गुणों में हलचल होने पर सृष्टि का संकल्प करते हैं। जो कर्म-बंधन से मुक्त ज्ञानियों के हृदय में स्वयं प्रकाशित होते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।
पद 17
मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय। स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत- प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते॥१७॥
मेरे जैसे शरणागत पशु के बंधन काटने वाले, स्वयं मुक्त, अत्यंत दयालु और कभी आलस्य न करने वाले प्रभु को नमस्कार। जो अपने अंश से हर प्राणी के मन में अंतर्यामी रूप से अनुभव होते हैं, उन महान भगवान को नमस्कार।
पद 18
आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै- र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय। मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय॥१८॥
जो शरीर, संतान, संबंधी, घर, धन और लोगों में आसक्त रहने वालों को कठिनाई से मिलते हैं, और स्वयं गुणों के संग से रहित हैं — उन्हें नमस्कार। मुक्त आत्माएँ जिनका अपने हृदय में ध्यान करती हैं, उन ज्ञानस्वरूप भगवान ईश्वर को नमस्कार।
पद 19
यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति। किं चाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम्॥१९॥
धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष चाहने वाले जिनकी भक्ति करके अपना मनचाहा लक्ष्य पाते हैं, और जो अन्य आशीर्वाद ही नहीं, अविनाशी स्वरूप तक दे देते हैं — वे अपार दयालु प्रभु मुझे इस संकट से छुड़ाएँ।
पद 20
एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः। अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः॥२०॥
जिनके अनन्य भक्त, जो पूरी तरह उनकी शरण में हैं, कुछ भी नहीं माँगते; वे बस उनके अत्यंत अद्भुत और मंगलमय चरित्र को गाते हुए आनंद के सागर में डूबे रहते हैं।
पद 21
तमक्षरं ब्रह्म परं परेश- मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम्। अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर- मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे॥२१॥
मैं उन अविनाशी परब्रह्म परमेश्वर की स्तुति करता हूँ, जो अव्यक्त हैं और आत्म-योग से ही जाने जाते हैं। वे इंद्रियों से परे, अति सूक्ष्म, मानो बहुत दूर, अनंत, आदि और पूर्ण हैं।
पद 22
यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः। नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः॥२२॥
ब्रह्मा आदि देवता, वेद और चर-अचर सारे लोक, अलग-अलग नाम और रूपों में, उन प्रभु के एक बहुत छोटे से अंश से ही रचे गए हैं।
पद 23
यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः। तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः॥२३॥
जैसे आग से लपटें और सूर्य से किरणें बार-बार निकलती और उसी में लौट जाती हैं, वैसे ही बुद्धि, मन, इंद्रियाँ और शरीर — गुणों का यह सारा प्रवाह — उन्हीं प्रभु से निकलता और उन्हीं में लौटता है।
पद 24
स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ् न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः। नायं गुणः कर्म न सन्न चास- न्निषेधशेषो जयतादशेषः॥२४॥
वे न देवता हैं, न असुर, न मनुष्य, न पशु-पक्षी; न स्त्री हैं, न पुरुष, न नपुंसक, न कोई प्राणी। वे न गुण हैं, न कर्म, न कार्य, न कारण — सब कुछ 'नहीं' कहने के बाद जो शेष रहता है और जो सब कुछ है, उनकी जय हो।
पद 25
जिजीविषे नाहमिहामुया कि- मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या। इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव- स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम्॥२५॥
मैं इस हाथी के जन्म में और जीना नहीं चाहता — भीतर-बाहर अज्ञान से ढके इस शरीर का क्या करूँ? मैं तो उस अज्ञान के आवरण से मुक्ति चाहता हूँ, जो आत्मा के प्रकाश को ढकता है और जो समय से अपने आप नष्ट नहीं होता।
पद 26
सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम्। विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम्॥२६॥
इसलिए मैं उन प्रभु को प्रणाम करता हूँ जो विश्व के रचयिता हैं, स्वयं विश्व हैं और विश्व से परे भी हैं। जो विश्व को जानने वाले, विश्व की आत्मा, अजन्मा ब्रह्म और परम पद हैं, उन्हें मेरा नमन।
पद 27
योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते। योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम्॥२७॥
योग से जिनके कर्म-बंधन जल गए हैं, ऐसे योगी योग से शुद्ध हुए अपने हृदय में जिनका दर्शन करते हैं, उन योगेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
पद 28
नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग- शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय। प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने॥२८॥
जिनकी तीन शक्तियों (सत्त्व, रज, तम) का वेग असहनीय है और जो सब विषयों के रूप में प्रकट हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार। जो शरणागतों के रक्षक हैं, जिनकी शक्ति अपार है और जिनका मार्ग भटकी हुई इंद्रियों वाले लोग नहीं पा सकते, उन्हें नमस्कार।
पद 29
नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम्। तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम्॥२९॥
जिनकी माया शक्ति से 'मैं' के अहंकार में उलझा यह जीव अपने ही सच्चे स्वरूप को नहीं जान पाता, उन अपार महिमा वाले भगवान की मैं शरण में आया हूँ।
पद 30
श्रीशुक उवाच एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिदाभिमानाः। नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात् तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत्॥३०॥
शुकदेव जी कहते हैं — गजेन्द्र ने निराकार प्रभु की ऐसी स्तुति की, तो ब्रह्मा आदि देवता, जो अपने अलग-अलग रूपों को ही अपना मानते थे, उसकी रक्षा को नहीं आए। तब सब देवताओं के स्वरूप, सर्वात्मा श्रीहरि स्वयं वहाँ प्रकट हुए।
पद 31
तं तद्वदार्त उपलभ्य जगन्निवासः स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः। छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान- श्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः॥३१॥
जगत के आधार प्रभु ने गजेन्द्र को इतने संकट में देखा और उसकी स्तुति सुनी। स्तुति करते देवताओं के साथ, वेदमय गरुड़ पर सवार होकर, चक्रधारी हरि तुरंत वहाँ पहुँचे जहाँ गजेन्द्र था।
पद 32
सोऽन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम्। उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा- न्नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते॥३२॥
सरोवर में बलवान ग्राह द्वारा पकड़े हुए, पीड़ा से व्याकुल गजेन्द्र ने आकाश में गरुड़ पर चक्र लिए हरि को देखा। उसने कमल का फूल लिए अपनी सूँड़ ऊपर उठाई और बड़ी कठिनाई से कहा — "हे नारायण, हे जगद्गुरु, हे भगवान, आपको नमस्कार!"
पद 33
तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार। ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुच्छ्रियाणाम्॥३३॥
उसे पीड़ा में देखकर अजन्मा प्रभु तुरंत नीचे उतरे और दया करके गजेन्द्र को ग्राह सहित सरोवर से बाहर खींच लिया। फिर सब देवताओं के देखते-देखते, अपने चक्र से ग्राह का मुँह चीरकर श्रीहरि ने गजेन्द्र को छुड़ा लिया।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र कहाँ से लिया गया है?
यह श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध के तीसरे अध्याय में है। इसके वक्ता शुकदेव जी हैं, जो राजा परीक्षित को यह कथा सुनाते हैं।
गजेन्द्र मोक्ष का पाठ कब करना चाहिए?
परंपरा से इसे सुबह ब्रह्म मुहूर्त में या स्नान के बाद पढ़ा जाता है। बहुत से भक्त कठिन समय, कर्ज़ या चिंता के दिनों में रोज़ इसका पाठ करते हैं।
गजेन्द्र मोक्ष की कथा क्या सिखाती है?
जब अपना बल, परिवार और साथी सब काम न आएँ, तब पूरी शरणागति से भगवान को पुकारना चाहिए। भागवत के अनुसार भगवान सच्चे मन की पुकार सुनकर स्वयं आते हैं।