अच्युताष्टकम् (अच्युतं केशवं) — अर्थ सहित
अच्युताष्टकम् भगवान विष्णु के अच्युत स्वरूप की स्तुति है, जिसे परंपरा से आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है। इसमें विष्णु के कृष्ण और राम दोनों अवतारों के नाम और लीलाएँ गाई गई हैं। 'अच्युतं केशवं' भजन के रूप में यह आज बहुत लोकप्रिय है।
अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्। श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे॥१॥
अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्। इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे॥२॥
विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये। वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः॥३॥
कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे। अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक॥४॥
राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः। लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितो- ऽगस्त्यसम्पूजितो राघवः पातु माम्॥५॥
धेनुकारिष्टकानिष्टकृद्द्वेषिहा केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः। पूतनाकोपकः सूरजाखेलनो बालगोपालकः पातु मां सर्वदा॥६॥
विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम्। वन्यया मालया शोभितोरःस्थलं लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे॥७॥
कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननं रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः। हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे॥८॥
अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम्। वृत्ततः सुन्दरं कर्तृविश्वम्भरस् तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम्॥९॥
अर्थ
पद 1
अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्। श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे॥१॥
मैं अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपियों के प्रिय और जानकी के स्वामी रामचंद्र को भजता हूँ।
पद 2
अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्। इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे॥२॥
अच्युत, केशव, सत्यभामा के पति, माधव, श्रीधर, राधा जिनकी आराधना करती हैं, लक्ष्मी के निवास, मन से सुंदर, देवकी के आनंद और नंद के पुत्र को मैं अपने मन में बसाता हूँ।
पद 3
विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये। वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः॥३॥
सर्वव्यापक, विजयी, शंख और चक्र धारण करने वाले, रुक्मिणी से प्रेम करने वाले, जानकी के पति, गोपियों के प्रिय, पूजित, सबकी आत्मा, कंस का विनाश करने वाले, बाँसुरी वाले — आपको नमस्कार है।
पद 4
कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे। अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक॥४॥
हे कृष्ण, गोविंद, राम, नारायण, लक्ष्मीपति, वासुदेव, अजेय, शोभा के भंडार, अच्युत, अनंत, माधव, इंद्रियों से परे, द्वारका के स्वामी, द्रौपदी के रक्षक!
पद 5
राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः। लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितो- ऽगस्त्यसम्पूजितो राघवः पातु माम्॥५॥
जो राक्षसों के क्रोध का कारण बने, सीता जी के साथ शोभा पाते हैं, दंडकारण्य की धरती को पवित्र करने वाले हैं, लक्ष्मण साथ हैं, वानर जिनकी सेवा करते हैं और अगस्त्य मुनि ने जिनकी पूजा की — वे राघव मेरी रक्षा करें।
पद 6
धेनुकारिष्टकानिष्टकृद्द्वेषिहा केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः। पूतनाकोपकः सूरजाखेलनो बालगोपालकः पातु मां सर्वदा॥६॥
जिन्होंने धेनुक, अरिष्ट जैसे बुरा करने वाले शत्रुओं और केशी को मारा, कंस का अंत किया, जो बाँसुरी बजाते हैं, पूतना पर क्रोधित हुए और यमुना में खेलते हैं — वे बाल-गोपाल सदा मेरी रक्षा करें।
पद 7
विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम्। वन्यया मालया शोभितोरःस्थलं लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे॥७॥
जिनके वस्त्र बिजली जैसे चमकते हैं, जिनका शरीर बरसात के बादल जैसा श्याम और सुंदर है, जिनकी छाती वनमाला से सुशोभित है, जिनके दोनों चरण लाल हैं — उन कमल-नयन को मैं भजता हूँ।
पद 8
कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननं रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः। हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे॥८॥
जिनका मुख घुँघराले बालों से चमकता है, सिर पर रत्नों का मुकुट है, गालों पर कुंडल झिलमिलाते हैं, जो हार, बाजूबंद और कंगनों से जगमगाते हैं और करधनी की घंटियों से मनोहर लगते हैं — उन श्यामसुंदर को मैं भजता हूँ।
पद 9
अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम्। वृत्ततः सुन्दरं कर्तृविश्वम्भरस् तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम्॥९॥
जो व्यक्ति इच्छाएँ पूरी करने वाले, छंद में सुंदर इस अच्युताष्टक को रोज़ प्रेम और लगन से पढ़ता है, सारी सृष्टि को पालने वाले हरि जल्दी ही उसके प्रेम के वश में हो जाते हैं — ऐसी मान्यता है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अच्युत का क्या अर्थ है?
'अच्युत' यानी जो कभी गिरता नहीं, कभी नष्ट नहीं होता, अपने स्वरूप से कभी नहीं डिगता। यह भगवान विष्णु का एक नाम है।
अच्युताष्टकम् किसने लिखा?
परंपरा से इसे आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है।
'अच्युतं केशवं' भजन कब गाया जाता है?
इसे सुबह-शाम की पूजा, एकादशी, जन्माष्टमी, रामनवमी या किसी भी भजन-संध्या में गाया जा सकता है। कई लोग केवल पहला श्लोक भजन की तरह दोहराते हैं।