वक्रतुण्ड महाकाय मंत्र — अर्थ और जप विधि
यह गणेश जी की सबसे लोकप्रिय स्तुति है। किसी भी पूजा, पढ़ाई, यात्रा या नए काम की शुरुआत में इसे बोला जाता है। इसमें गणेश जी से प्रार्थना की जाती है कि हमारे हर काम में आने वाली बाधाएँ दूर हों। बच्चे भी इसे आसानी से याद कर लेते हैं।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
अर्थ
मंत्र
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
हे टेढ़ी सूँड वाले, विशाल शरीर वाले और करोड़ों सूर्यों जैसे तेज वाले गणेश जी! मेरे सभी कामों को सदा बिना किसी बाधा के पूरा करें।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वक्रतुण्ड महाकाय मंत्र कितनी बार बोलें?
किसी काम की शुरुआत में 1 या 3 बार बोलना काफ़ी है। जप के रूप में 11, 21 या 108 बार (एक माला) किया जाता है।
यह मंत्र कब बोलना चाहिए?
पूजा की शुरुआत में, पढ़ाई से पहले, यात्रा या नया काम शुरू करते समय। बुधवार और गणेश चतुर्थी पर इसका विशेष महत्व माना जाता है।
'वक्रतुण्ड' का अर्थ क्या है?
'वक्र' यानी टेढ़ा और 'तुण्ड' यानी सूँड — टेढ़ी सूँड वाले गणेश जी। 'महाकाय' का अर्थ है विशाल शरीर वाले।