सुखकर्ता दुःखहर्ता गणपति आरती — अर्थ सहित
'सुखकर्ता दुःखहर्ता' संत समर्थ रामदास (17वीं सदी) की लिखी मराठी आरती है। कहा जाता है कि उन्होंने इसे मोरगाँव के मयूरेश्वर गणपति के दर्शन के बाद रचा। महाराष्ट्र में और पूरे देश में गणेशोत्सव के दस दिनों में यह आरती सबसे पहले और सबसे ज़ोर से गाई जाती है।
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची। नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची। सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची। कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती। दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥ जय देव जय देव॥
रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा। चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा। हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा। रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥
लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना। सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना। दास रामाचा वाट पाहे सदना। संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना॥
अर्थ
पद 1
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची। नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची। सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची। कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥
गणपति सुख देने वाले और दुख हरने वाले हैं; वे विघ्नों का नाम तक मिटा देते हैं और अपनी कृपा से प्रेम भरपूर देते हैं। उनके पूरे शरीर पर सिंदूर का लेप सुंदर लगता है और गले में मोतियों की माला चमकती है।
पद 2
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती। दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥ जय देव जय देव॥
हे मंगलमूर्ति गणपति, आपकी जय हो। आपके दर्शन मात्र से ही मन की इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं।
पद 3
रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा। चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा। हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा। रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥
हे गौरीपुत्र, आपके लिए रत्नों से जड़ा आसन है; आप पर चंदन, कुमकुम और केसर का लेप है। हीरों से जड़ा मुकुट बहुत सुंदर लगता है और चरणों में घुँघरू वाले नूपुर रुनझुन बजते हैं।
पद 4
लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना। सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना। दास रामाचा वाट पाहे सदना। संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना॥
आप बड़े पेट वाले हैं, पीले वस्त्र पहनते हैं और कमर पर नाग बाँधते हैं; आपकी सूँड़ सीधी है, मुख टेढ़ा है और आपके तीन नेत्र हैं। राम का यह दास (रामदास) अपने घर में आपकी राह देख रहा है — हे देवों द्वारा पूजित, संकट में आइए और अंत समय में रक्षा कीजिए।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'सुखकर्ता दुःखहर्ता' किसने लिखी?
यह आरती 17वीं सदी के संत समर्थ रामदास ने मराठी में लिखी। अंतिम पद में 'दास रामाचा' उन्हीं की ओर संकेत है।
यह आरती कब गाई जाती है?
गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक गणेशोत्सव में सुबह-शाम, हर संकष्टी चतुर्थी पर, और महाराष्ट्र में किसी भी पूजा की शुरुआत में।
यह आरती किस भाषा में है?
यह मराठी में है, पर देवनागरी में लिखी होने से हिंदी भाषी भक्त भी इसे आसानी से पढ़ और गा लेते हैं।