गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः — गुरु मंत्र अर्थ सहित
यह गुरु को प्रणाम करने वाला सबसे प्रसिद्ध श्लोक है। परंपरा में यह गुरु गीता से जुड़ा माना जाता है। इसमें गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान बताया गया है, क्योंकि गुरु ही ज्ञान देकर जीवन को नई दिशा देते हैं। गुरु पूर्णिमा और पढ़ाई की शुरुआत में इसे बोला जाता है।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अर्थ
पद 1
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही भगवान शिव हैं। गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं — ऐसे श्री गुरु को मेरा नमस्कार है।
पद 2
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
जो अखंड और पूर्ण परमात्मा पूरे जड़-चेतन जगत में व्याप्त है, उसका दर्शन जिसने कराया — उस श्री गुरु को नमस्कार है।
पद 3
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
मैं अज्ञान के अंधेरे से अंधा था; जिन्होंने ज्ञान रूपी अंजन की सलाई से मेरी आँखें खोल दीं — उस श्री गुरु को नमस्कार है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गुरु मंत्र कब बोलना चाहिए?
गुरु पूर्णिमा पर, पढ़ाई या कोई नई विद्या शुरू करने से पहले, और रोज़ सुबह की प्रार्थना में।
इसे कितनी बार बोलें?
एक या तीन बार श्रद्धा से बोलना काफ़ी है। गुरु पूर्णिमा पर कई लोग इसे 108 बार भी जपते हैं।
'गुरु' शब्द का अर्थ क्या है?
परंपरागत व्याख्या में 'गु' यानी अंधकार और 'रु' यानी उसे दूर करने वाला — जो अज्ञान का अंधेरा मिटाए, वही गुरु है।