शनि चालीसा — अर्थ सहित
श्री शनि चालीसा सूर्यपुत्र शनि देव की स्तुति है। इसमें उनके रूप, उनके दस नामों और राजा विक्रमादित्य, हरिश्चंद्र, नल जैसे पौराणिक प्रसंगों का वर्णन है। अंतिम चौपाई में रामसुंदर का नाम आता है। भक्त इसे शनिवार को, विशेषकर साढ़ेसाती या ढैया के समय, श्रद्धा से पढ़ते हैं।
॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
॥ दोहा ॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥
॥ चौपाई ॥
जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
॥ चौपाई ॥
चारि भुजा तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥
॥ चौपाई ॥
परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥
॥ चौपाई ॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके॥
॥ चौपाई ॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥
॥ चौपाई ॥
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन। यम कोणस्थ रौद्र दुखभंजन॥
॥ चौपाई ॥
सौरी मन्द शनी दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥
॥ चौपाई ॥
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥
॥ चौपाई ॥
पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥
॥ चौपाई ॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥
॥ चौपाई ॥
बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥
॥ चौपाई ॥
लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥
॥ चौपाई ॥
रावण की गति-मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥
॥ चौपाई ॥
दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥
॥ चौपाई ॥
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
॥ चौपाई ॥
हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥
॥ चौपाई ॥
भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥
॥ चौपाई ॥
विनय राग दीपक महं कीन्हयों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥
॥ चौपाई ॥
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी॥
॥ चौपाई ॥
तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी-मीन कूद गई पानी॥
॥ चौपाई ॥
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥
॥ चौपाई ॥
तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥
॥ चौपाई ॥
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥
॥ चौपाई ॥
कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥
॥ चौपाई ॥
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥
॥ चौपाई ॥
शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥
॥ चौपाई ॥
वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥
॥ चौपाई ॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥
॥ चौपाई ॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥
॥ चौपाई ॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥
॥ चौपाई ॥
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
॥ चौपाई ॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥
॥ चौपाई ॥
तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥
॥ चौपाई ॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥
॥ चौपाई ॥
समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥
॥ चौपाई ॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥
॥ चौपाई ॥
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥
॥ चौपाई ॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥
॥ चौपाई ॥
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥
॥ चौपाई ॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥
॥ दोहा ॥
पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हों विमल तैयार। करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥
अर्थ
दोहा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
हे गिरिजा के पुत्र, मंगल करने वाले कृपालु गणेश, आपकी जय हो। दीनों के दुख दूर करके उन्हें निहाल कीजिए।
दोहा
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥
हे प्रभु शनिदेव, आपकी जय हो; हे महाराज, मेरी विनती सुनिए। हे सूर्यपुत्र, कृपा कीजिए और अपने भक्त की लाज रखिए।
चौपाई 1
जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
हे दयालु शनिदेव, आपकी जय हो; आप सदा भक्तों का पालन करते हैं।
चौपाई 2
चारि भुजा तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥
आपकी चार भुजाएँ हैं, शरीर साँवला है और माथे पर रत्नों का मुकुट शोभा देता है।
चौपाई 3
परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥
आपका माथा बहुत चौड़ा और सुंदर है; आपकी दृष्टि तिरछी और भौंहें भयंकर हैं।
चौपाई 4
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके॥
आपके कानों में कुंडल चमचमाते हैं और छाती पर मोतियों और मणियों की माला दमकती है।
चौपाई 5
कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥
आपके हाथों में गदा, त्रिशूल और फरसा हैं, जिनसे आप पल भर में शत्रुओं का नाश कर देते हैं।
चौपाई 6
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन। यम कोणस्थ रौद्र दुखभंजन॥
पिंगल, कृष्ण, छायानंदन, यम, कोणस्थ, रौद्र और दुखभंजन — ये आपके नाम हैं।
चौपाई 7
सौरी मन्द शनी दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥
सौरि, मंद और शनि — ये मिलाकर आपके दस नाम हैं। हे सूर्यपुत्र, आपकी पूजा से सब काम बनते हैं — ऐसी मान्यता है।
चौपाई 8
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥
जिस पर प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं, उस गरीब को भी वे पल भर में राजा बना देते हैं।
चौपाई 9
पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥
आपकी दृष्टि से पहाड़ भी तिनका बन जाता है और तिनका भी पहाड़ बन जाता है।
चौपाई 10
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥
श्रीराम को राज मिलने वाला था, पर उन्हें वनवास मिला; कैकेयी की बुद्धि भी फिर गई।
चौपाई 11
बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥
वन में भी छल का हिरण दिखा, और माता सीता का हरण हो गया।
चौपाई 12
लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥
शक्ति-बाण ने लक्ष्मण को अचेत कर दिया, और सेना में हाहाकार मच गया।
चौपाई 13
रावण की गति-मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥
रावण की बुद्धि भ्रष्ट हो गई और उसने श्रीराम से बैर बढ़ा लिया।
चौपाई 14
दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥
सोने की लंका मिट्टी में मिल गई, और वीर बजरंगबली का डंका बज गया।
चौपाई 15
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
जब राजा विक्रमादित्य पर आपकी दशा आई, तो दीवार पर बना मोर का चित्र हार निगल गया।
चौपाई 16
हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥
नौलखा हार की चोरी का दोष राजा पर लगा, और उनके हाथ-पैर तुड़वा दिए गए।
चौपाई 17
भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥
आपने उन्हें बहुत बुरी दशा दिखाई; उन्हें तेली के घर कोल्हू चलाना पड़ा।
चौपाई 18
विनय राग दीपक महं कीन्हयों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥
जब राजा ने दीपक राग में आपकी विनती की, तब आप प्रसन्न हुए और उन्हें सुख दिया।
चौपाई 19
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी॥
राजा हरिश्चंद्र की पत्नी बिक गई और स्वयं राजा को श्मशान के स्वामी के घर पानी भरना पड़ा।
चौपाई 20
तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी-मीन कूद गई पानी॥
इसी तरह राजा नल पर भी कठिन दशा आई; भुनी हुई मछली भी उछलकर पानी में चली गई।
चौपाई 21
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥
जब आपकी दशा शंकर जी पर आई, तब (पूर्व जन्म में) पार्वती को सती होना पड़ा।
चौपाई 22
तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥
गौरी के क्रोध करने पर जैसे ही आपने ज़रा सा देखा, गौरी-पुत्र गणेश का सिर आकाश में उड़ गया।
चौपाई 23
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥
जब पांडवों पर आपकी दशा आई, तब द्रौपदी का अपमान होने से (श्रीकृष्ण की कृपा से) बचा।
चौपाई 24
कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥
आपने कौरवों की भी बुद्धि फेर दी, जिससे महाभारत का युद्ध हुआ।
चौपाई 25
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥
आपने अपने पिता सूर्य को तुरंत मुँह में रख लिया और उन्हें लेकर पाताल में कूद गए।
चौपाई 26
शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥
यह देखकर देवताओं ने विनती की, तब आपने सूर्य को अपने मुख से छोड़ दिया।
चौपाई 27
वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥
प्रभु के सात वाहन बताए गए हैं — हाथी, घोड़ा, गधा, हिरण, कुत्ता,
चौपाई 28
जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥
सियार और शेर जैसे नाखून वाले जीव; इन वाहनों के अलग-अलग फल ज्योतिष परंपरा में बताए गए हैं।
चौपाई 29
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥
चालीसा के अनुसार हाथी वाहन होने पर घर में लक्ष्मी आती हैं, और घोड़े से सुख-संपत्ति बढ़ती है।
चौपाई 30
गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥
गधा कामों में हानि का संकेत माना गया है, और शेर समाज व राज-काज में सफलता का।
चौपाई 31
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
सियार बुद्धि भ्रष्ट करने वाला और हिरण कष्ट देने वाला बताया गया है।
चौपाई 32
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥
जब प्रभु कुत्ते पर सवार होकर आते हैं, तो चोरी आदि का भारी डर बताया गया है।
चौपाई 33
तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥
इसी तरह आपके चार 'चरण' बताए गए हैं — सोना, लोहा, चाँदी और ताँबा।
चौपाई 34
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥
चालीसा के अनुसार लोहे के चरण पर आने पर धन, परिवार और संपत्ति की हानि होती है।
चौपाई 35
समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥
ताँबे और चाँदी के चरण सामान्य और शुभ माने गए हैं, और सोने का चरण सब सुख और बड़ा मंगल देने वाला।
चौपाई 36
जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥
जो यह शनि-चरित्र रोज़ गाता है, उसे बुरी दशा कभी नहीं सताती — ऐसा चालीसा कहती है।
चौपाई 37
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥
प्रभु अपनी अद्भुत लीला दिखाते हैं और शत्रुओं का बल ढीला कर देते हैं।
चौपाई 38
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥
जो योग्य पंडित को बुलाकर विधि से शनि ग्रह की शांति का पूजन करवाता है,
चौपाई 39
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥
और शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाकर दीप जलाता है, वह बहुत सुख पाता है — ऐसी मान्यता है।
चौपाई 40
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥
प्रभु के दास रामसुंदर कहते हैं: शनि देव का स्मरण करने से सुख का प्रकाश होता है।
दोहा
पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हों विमल तैयार। करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥
शनिश्चर देव का यह पाठ विमल ने तैयार किया; जो चालीस दिन इसका पाठ करता है, वह संसार-सागर से पार होता है — ऐसा यह दोहा कहता है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
इसके बाद पढ़ें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शनि चालीसा किस दिन और कब पढ़नी चाहिए?
शनिवार शनि देव का दिन है, इसलिए परंपरा से शनिवार को पाठ किया जाता है — सुबह या सूर्यास्त के बाद। शनि जयंती और शनि अमावस्या पर भी पाठ शुभ माना जाता है। कई लोग पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीप जलाकर पढ़ते हैं।
शनि चालीसा कितने दिन पढ़नी चाहिए?
चालीसा के अंतिम दोहे में चालीस दिन लगातार पाठ का उल्लेख है, इसलिए कई भक्त 40 दिन का संकल्प लेते हैं। वैसे हर शनिवार एक बार श्रद्धा से पढ़ना भी पर्याप्त माना जाता है।
शनि चालीसा पढ़ने का क्या महत्व माना जाता है?
शनि देव को कर्म का फल देने वाले न्यायप्रिय देवता माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर कठिन समय में धैर्य मिलता है और मन हल्का होता है। परंपरा ईमानदार कर्म, सेवा और ज़रूरतमंदों की मदद को भी शनि देव की सच्ची पूजा मानती है।