शनि चालीसा — अर्थ सहित

श्री शनि चालीसा सूर्यपुत्र शनि देव की स्तुति है। इसमें उनके रूप, उनके दस नामों और राजा विक्रमादित्य, हरिश्चंद्र, नल जैसे पौराणिक प्रसंगों का वर्णन है। अंतिम चौपाई में रामसुंदर का नाम आता है। भक्त इसे शनिवार को, विशेषकर साढ़ेसाती या ढैया के समय, श्रद्धा से पढ़ते हैं।

40 चौपाई, 3 दोहे · लगभग 8 मिनट

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

॥ दोहा ॥

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

॥ चौपाई ॥

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

॥ चौपाई ॥

चारि भुजा तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥

॥ चौपाई ॥

परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

॥ चौपाई ॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके॥

॥ चौपाई ॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

॥ चौपाई ॥

पिंगल कृष्णो छाया नन्दन। यम कोणस्थ रौद्र दुखभंजन॥

॥ चौपाई ॥

सौरी मन्द शनी दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

॥ चौपाई ॥

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥

॥ चौपाई ॥

पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥

॥ चौपाई ॥

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥

॥ चौपाई ॥

बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥

॥ चौपाई ॥

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥

॥ चौपाई ॥

रावण की गति-मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

॥ चौपाई ॥

दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥

॥ चौपाई ॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

॥ चौपाई ॥

हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥

॥ चौपाई ॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

॥ चौपाई ॥

विनय राग दीपक महं कीन्हयों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥

॥ चौपाई ॥

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी॥

॥ चौपाई ॥

तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी-मीन कूद गई पानी॥

॥ चौपाई ॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥

॥ चौपाई ॥

तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

॥ चौपाई ॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥

॥ चौपाई ॥

कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥

॥ चौपाई ॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥

॥ चौपाई ॥

शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

॥ चौपाई ॥

वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

॥ चौपाई ॥

जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

॥ चौपाई ॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥

॥ चौपाई ॥

गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

॥ चौपाई ॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

॥ चौपाई ॥

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥

॥ चौपाई ॥

तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

॥ चौपाई ॥

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

॥ चौपाई ॥

समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥

॥ चौपाई ॥

जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

॥ चौपाई ॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

॥ चौपाई ॥

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

॥ चौपाई ॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥

॥ चौपाई ॥

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

॥ दोहा ॥

पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हों विमल तैयार। करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शनि चालीसा किस दिन और कब पढ़नी चाहिए?

शनिवार शनि देव का दिन है, इसलिए परंपरा से शनिवार को पाठ किया जाता है — सुबह या सूर्यास्त के बाद। शनि जयंती और शनि अमावस्या पर भी पाठ शुभ माना जाता है। कई लोग पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीप जलाकर पढ़ते हैं।

शनि चालीसा कितने दिन पढ़नी चाहिए?

चालीसा के अंतिम दोहे में चालीस दिन लगातार पाठ का उल्लेख है, इसलिए कई भक्त 40 दिन का संकल्प लेते हैं। वैसे हर शनिवार एक बार श्रद्धा से पढ़ना भी पर्याप्त माना जाता है।

शनि चालीसा पढ़ने का क्या महत्व माना जाता है?

शनि देव को कर्म का फल देने वाले न्यायप्रिय देवता माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर कठिन समय में धैर्य मिलता है और मन हल्का होता है। परंपरा ईमानदार कर्म, सेवा और ज़रूरतमंदों की मदद को भी शनि देव की सच्ची पूजा मानती है।

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