जय जय श्री शनिदेव आरती — अर्थ सहित

'जय जय श्री शनिदेव' शनिदेव की सबसे प्रचलित आरती है। इसमें उन्हें सूर्य और छाया का पुत्र, भक्तों का हित करने वाला बताया गया है और उनके श्याम रूप, नीले वस्त्र और प्रिय भोग — तिल, तेल, उड़द — का वर्णन है। शनिवार की शाम और शनि जयंती पर यह आरती गाई जाती है।

5 पद · लगभग 3 मिनट

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी। सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥

श्याम अंग वक्र-दृष्टि चतुर्भुजा धारी। नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥

क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी। मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥

मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी। लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥

देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी। विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शनिदेव की आरती कब करनी चाहिए?

शनिवार की शाम, शनि मंदिर में या पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाकर। शनि जयंती और शनि अमावस्या पर इसे विशेष रूप से गाया जाता है।

शनिदेव को क्या चढ़ाया जाता है?

आरती के अनुसार तिल, सरसों का तेल, उड़द, लोहा और काले-नीले वस्त्र उन्हें प्रिय हैं। बहुत से भक्त शनिवार को ये चीज़ें दान भी करते हैं।

शनिदेव के माता-पिता कौन हैं?

परंपरा के अनुसार शनिदेव सूर्यदेव और छाया के पुत्र हैं, जैसा आरती की पहली पंक्ति में भी आता है। यमराज और यमुना उनके भाई-बहन माने जाते हैं।

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