पार्वती चालीसा — अर्थ सहित
पार्वती चालीसा माँ पार्वती की भक्तिमय स्तुति है। वे हिमालय-पुत्री, शिव की अर्धांगिनी और गणेश-कार्तिकेय की माता हैं। उनके उमा, गौरी, अम्बिका और भवानी जैसे अनेक नाम हैं। हरियाली तीज, हरितालिका तीज, नवरात्रि और सोमवार को इस चालीसा का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
॥ दोहा ॥
श्री गणेश गुरुपाद नमूँ, नमूँ शिव-अर्धांगिनी। पार्वती-माँ की महिमा, गाऊँ भाव-तरंगिनी॥
॥ दोहा ॥
जय उमा जय गिरिजा माय, जय हिमवत-दुलारी। जो ध्यावे तुमको मन से, वह पाए सुख भारी॥
॥ चौपाई ॥
जय पार्वती हिमाचल-बाला। जय शिव-प्रिया जय सुख-निवाला॥ गौरवर्णा तन अति सुकुमारी। रूप-लावण्य से जग उजियारी॥
॥ चौपाई ॥
चार भुजा में अस्त्र-शस्त्र। कमल-पुष्प धारे हो नेत्र-पत्र॥ रत्न-जड़ित मुकुट सिर सोहे। देखत जन सब मन को मोहे॥
॥ चौपाई ॥
सिंह-वाहिनी और दुर्गा-रूपा। महिषासुर-मर्दिनी अनूपा॥ काली-रूप में असुर-संहारी। सौम्य-रूप में जग-हितकारी॥
॥ चौपाई ॥
हिमवान और मेना के घर में। प्रगट भयी तुम पुण्य-निधर में॥ पूर्व जन्म में सती थीं माता। दक्ष-यज्ञ में तन त्यागा-ज्ञाता॥
॥ चौपाई ॥
शिव को पति पाने की चाहा। तुमने किया महातप-साहा॥ नंगे पाँव पाषाण पर रहीं। केवल पत्ते खाकर तुमने सहीं॥
॥ चौपाई ॥
पत्ता भी जब छोड़ दिया। अपर्णा नाम तुम्हें दिया॥ ऋषि और मुनि तप देखकर। शिव प्रसन्न हुए तप-ताप सहकर॥
॥ चौपाई ॥
शिव ने भेजे सप्त-ऋषि तब। परीक्षा लेने को तुम्हारी जब॥ ऋषिगण बोले मत करो तप। पर तुम अटल रहीं, न डिगा नप॥
॥ चौपाई ॥
शिव आए खुद बालक-रूपा। निंदा की उनकी तुम्हें अनूपा॥ तुम रुष्ट हुई कहा — लो विदा। शिव प्रकट हुए, टूटी परीक्षा-बाधा॥
॥ चौपाई ॥
शिव-पार्वती का शुभ-विवाह। महाशिवरात्रि-दिन की राह॥ हिमवान ने कन्यादान दिया। त्रिभुवन ने मंगल-गान किया॥
॥ चौपाई ॥
शिव के वाम-अंग में बसीं। अर्धनारीश्वर-रूप में हसीं॥ शिव की शक्ति, शक्ति के शिव। दोनों मिलकर हैं अखंड-शिव॥
॥ चौपाई ॥
गणेश को माता ने बनाया। हल्दी-मिट्टी से जीवन दिलाया॥ शिव-गण से रक्षा का काज। गणेश बने द्वारपाल-महाराज॥
॥ चौपाई ॥
कार्तिकेय हैं तुम्हारे लाल। षण्मुख-स्कंद महा विशाल॥ गंगा की धारा में पले। कृत्तिकाओं ने उनको पाले॥
॥ चौपाई ॥
उमा नाम से जग में पूजित। गौरी नाम से भक्त-सुपूजित॥ हैमवती नाम से जग-जननी। भवानी भव-बाधा-हर्षदायिनी॥
॥ चौपाई ॥
शाकम्भरी और ब्राह्मणी। चण्डिका और महामारी-रणी॥ एक ही शक्ति अनेक रूपा। युग-युग में प्रगटत हो अनूपा॥
॥ चौपाई ॥
नवरात्रि में नव-रूप तुम्हारे। नव-दुर्गा के नव-रूप न्यारे॥ शैलपुत्री से महागौरी तक। भक्तों को दो नव-आशीष तक॥
॥ चौपाई ॥
तीज के दिन सुहागन पूजे। शिव-पार्वती की जोड़ी भूले न भूजे॥ पति की दीर्घायु की कामना। पार्वती-कृपा से पूर्ण करना॥
॥ चौपाई ॥
हरियाली तीज और हरितालिका। दोनों तीज में तुम हो पालिका॥ सावन में सोमवार का व्रत। पार्वती की पूजा-भक्ति-कृत॥
॥ चौपाई ॥
कुँवारी कन्या मनवांछित वर। पार्वती-पूजन से पाए घर॥ सौभाग्य और सुखी-दाम्पत्य। पार्वती-कृपा से मिले सत्य॥
॥ चौपाई ॥
संतान की कामना करने वाले। पार्वती-पूजन से फल पाले॥ गणेश-माता की स्तुति जो करे। घर में सुख-समृद्धि को वह वरे॥
॥ चौपाई ॥
विद्या-बुद्धि और सुशीलता। पार्वती की कृपा से मिले कलता॥ सत्य-धर्म और करुणा-भाव। माँ पार्वती का है यही स्वभाव॥
॥ चौपाई ॥
शिव की तपस्या रोकन को। देवों ने भेजा कामदेव को॥ काम-शर से शिव क्रुद्ध हुए। कामदेव तत्काल भस्म हुए॥
॥ चौपाई ॥
पार्वती ने ली रति को छाती। रती-विलाप सुन शिव का मन माती॥ रति-प्रार्थना सुन शिव ने दिया। काम को पुनर्जीवन-वरदान किया॥
॥ चौपाई ॥
दुर्गम-काल में अन्न-वर्षा। शाकम्भरी-रूप से दी धरा॥ भक्तों की भूख-प्यास हर्षित। शक्ति-रूपा माँ सदा समर्पित॥
॥ चौपाई ॥
शुम्भ-निशुम्भ वध तुमने किया। मधु-कैटभ को भी दंड दिया॥ रक्तबीज का रक्त पी गईं। काली-रूप में विजय-श्री पाईं॥
॥ चौपाई ॥
जो तीज-व्रत माँ का करे। सुहागिन नित-शुभ सुख वरे॥ सत्रह साल का तीज-व्रत किया। पार्वती ने शिव को पति लिया॥
॥ चौपाई ॥
सोमवार का व्रत जो करे। शिव-पार्वती की कृपा को वरे॥ महाशिवरात्रि पर पूजन करें। दाम्पत्य-सुख और शांति वरें॥
॥ चौपाई ॥
पार्वती की कृपा से ज्ञान मिले। शिव-पंचाक्षर-रहस्य खिले॥ आत्म-ज्ञान और विवेक-सार। माँ की शरण में पाए पार॥
॥ चौपाई ॥
रोग-शोक और क्लेश-जाल। माँ की शरण में कटे काल॥ भय और दारिद्र्य दूर भागे। जब पार्वती-पूजन में मन लागे॥
॥ चौपाई ॥
गौरी-पूजन में बेल-पत्र। फूल-धूप-दीप-नैवेद्य-यंत्र॥ लाल वस्त्र और लाल पुष्प चढ़ाएँ। पार्वती-कृपा का वरण पाएँ॥
॥ चौपाई ॥
शक्ति-पीठ में जो दर्शन करे। पार्वती की उपस्थिति को वरे॥ इक्यावन शक्ति-पीठ की यात्रा। पावन करे मन की हर विरात्रा॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मा-विष्णु-शिव मिलकर तुम्हें। जगत-जननी कहते आदर से॥ देव-देवी सब तुम्हारे आगे। प्रणाम करते मन-भाव जागे॥
॥ चौपाई ॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत माँ की सहाई॥ ऋतु-पर्व पर पाठ जो करे। पार्वती-कृपा का फल वह वरे॥
॥ चौपाई ॥
जय जय पार्वती जग-जननी। जय उमा-शिव-अर्धांगिनी। जय हिमवत-दुलारी माया। जय त्रिभुवन-ईश्वरी-सुख-छाया॥
॥ दोहा ॥
पार्वती-चालीसा यह पाठ, नित पढ़े जो लाय ध्यान। उमा-कृपा से उस जन को, मिले मोक्ष-कल्याण॥
अर्थ
दोहा
श्री गणेश गुरुपाद नमूँ, नमूँ शिव-अर्धांगिनी। पार्वती-माँ की महिमा, गाऊँ भाव-तरंगिनी॥
श्री गणेश और गुरु के चरणों में तथा शिव की अर्धांगिनी पार्वती को प्रणाम करके, मैं माँ पार्वती की महिमा को भावपूर्वक गाता हूँ।
दोहा
जय उमा जय गिरिजा माय, जय हिमवत-दुलारी। जो ध्यावे तुमको मन से, वह पाए सुख भारी॥
हे उमा, हे गिरिजा माँ, हे हिमवान की प्यारी पुत्री, आपकी जय हो। जो मन से आपका ध्यान करता है, उसे भारी सुख की प्राप्ति होती है।
चौपाई 1
जय पार्वती हिमाचल-बाला। जय शिव-प्रिया जय सुख-निवाला॥ गौरवर्णा तन अति सुकुमारी। रूप-लावण्य से जग उजियारी॥
हे हिमाचल की पुत्री पार्वती, शिव-प्रिया और सुख की देवी, आपकी जय हो। आप गौर वर्ण और अत्यंत सुकुमार हैं; आपके रूप और लावण्य से संसार प्रकाशित है।
चौपाई 2
चार भुजा में अस्त्र-शस्त्र। कमल-पुष्प धारे हो नेत्र-पत्र॥ रत्न-जड़ित मुकुट सिर सोहे। देखत जन सब मन को मोहे॥
चार भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र और कमल-पुष्प धारण किए हुए हैं। सिर पर रत्न-जड़ित मुकुट सुशोभित है। आपको देखते ही सभी का मन मोहित हो जाता है।
चौपाई 3
सिंह-वाहिनी और दुर्गा-रूपा। महिषासुर-मर्दिनी अनूपा॥ काली-रूप में असुर-संहारी। सौम्य-रूप में जग-हितकारी॥
आप सिंह पर सवार दुर्गा के रूप में हैं और महिषासुर का मर्दन करने वाली अनुपम शक्ति हैं। काली-रूप में असुरों का संहार और सौम्य रूप में जग का हित करती हैं।
चौपाई 4
हिमवान और मेना के घर में। प्रगट भयी तुम पुण्य-निधर में॥ पूर्व जन्म में सती थीं माता। दक्ष-यज्ञ में तन त्यागा-ज्ञाता॥
हिमवान और माता मेना के घर में आप पुण्य-स्वरूपा के रूप में प्रकट हुईं। पूर्व जन्म में आप ही सती थीं जिन्होंने दक्ष के यज्ञ में तन त्याग दिया था।
चौपाई 5
शिव को पति पाने की चाहा। तुमने किया महातप-साहा॥ नंगे पाँव पाषाण पर रहीं। केवल पत्ते खाकर तुमने सहीं॥
शिव को पति के रूप में पाने की चाहत से आपने महान तपस्या की। नंगे पाँव पाषाणों पर रहीं और केवल पत्ते खाकर कठोर तप सहा।
चौपाई 6
पत्ता भी जब छोड़ दिया। अपर्णा नाम तुम्हें दिया॥ ऋषि और मुनि तप देखकर। शिव प्रसन्न हुए तप-ताप सहकर॥
जब आपने पत्ता भी खाना छोड़ दिया, तब आपको 'अपर्णा' (पत्ता भी न खाने वाली) नाम मिला। आपकी तपस्या देखकर शिव प्रसन्न हुए और आपके तप का फल मिला।
चौपाई 7
शिव ने भेजे सप्त-ऋषि तब। परीक्षा लेने को तुम्हारी जब॥ ऋषिगण बोले मत करो तप। पर तुम अटल रहीं, न डिगा नप॥
शिव ने परीक्षा लेने के लिए सात ऋषियों को भेजा। ऋषियों ने समझाने की कोशिश की कि तप न करो, परंतु आप अटल रहीं और विचलित नहीं हुईं।
चौपाई 8
शिव आए खुद बालक-रूपा। निंदा की उनकी तुम्हें अनूपा॥ तुम रुष्ट हुई कहा — लो विदा। शिव प्रकट हुए, टूटी परीक्षा-बाधा॥
शिव स्वयं बालक के रूप में आए और आपसे शिव की निंदा की। आप रुष्ट हुईं और विदा लेने लगीं; तभी शिव प्रकट हुए और परीक्षा समाप्त हुई।
चौपाई 9
शिव-पार्वती का शुभ-विवाह। महाशिवरात्रि-दिन की राह॥ हिमवान ने कन्यादान दिया। त्रिभुवन ने मंगल-गान किया॥
शिव और पार्वती का शुभ विवाह महाशिवरात्रि के दिन हुआ। हिमवान ने कन्यादान दिया और तीनों लोकों ने मंगल-गान गाया।
चौपाई 10
शिव के वाम-अंग में बसीं। अर्धनारीश्वर-रूप में हसीं॥ शिव की शक्ति, शक्ति के शिव। दोनों मिलकर हैं अखंड-शिव॥
आप शिव के वाम-अंग में स्थित हैं और दोनों मिलकर अर्धनारीश्वर के रूप में हैं। शिव की शक्ति आप हैं और शक्ति के शिव — दोनों मिलकर अखंड हैं।
चौपाई 11
गणेश को माता ने बनाया। हल्दी-मिट्टी से जीवन दिलाया॥ शिव-गण से रक्षा का काज। गणेश बने द्वारपाल-महाराज॥
माता पार्वती ने हल्दी और मिट्टी से गणेश को बनाकर उन्हें जीवन दिया। शिव-गणों से रक्षा के लिए गणेश को द्वारपाल बनाया।
चौपाई 12
कार्तिकेय हैं तुम्हारे लाल। षण्मुख-स्कंद महा विशाल॥ गंगा की धारा में पले। कृत्तिकाओं ने उनको पाले॥
कार्तिकेय आपके पुत्र हैं — छह मुख वाले महान स्कंद। गंगा की धारा में पले और कृत्तिकाओं ने उनका पालन किया।
चौपाई 13
उमा नाम से जग में पूजित। गौरी नाम से भक्त-सुपूजित॥ हैमवती नाम से जग-जननी। भवानी भव-बाधा-हर्षदायिनी॥
उमा नाम से जगत में पूजित हैं, गौरी नाम से भक्त आपकी पूजा करते हैं। हैमवती नाम से आप जग-जननी हैं और भवानी नाम से संसार की बाधाएँ हर लेती हैं।
चौपाई 14
शाकम्भरी और ब्राह्मणी। चण्डिका और महामारी-रणी॥ एक ही शक्ति अनेक रूपा। युग-युग में प्रगटत हो अनूपा॥
आप शाकम्भरी, ब्राह्मणी, चण्डिका और महामारी भी हैं। आप एक ही शक्ति के अनेक रूप हैं और युग-युग में अनुपम रूप से प्रकट होती हैं।
चौपाई 15
नवरात्रि में नव-रूप तुम्हारे। नव-दुर्गा के नव-रूप न्यारे॥ शैलपुत्री से महागौरी तक। भक्तों को दो नव-आशीष तक॥
नवरात्रि में आपके नौ रूप पूजित होते हैं — शैलपुत्री से महागौरी तक। नव-दुर्गा के इन अनोखे रूपों में आप भक्तों को नौ प्रकार के आशीर्वाद देती हैं।
चौपाई 16
तीज के दिन सुहागन पूजे। शिव-पार्वती की जोड़ी भूले न भूजे॥ पति की दीर्घायु की कामना। पार्वती-कृपा से पूर्ण करना॥
तीज के दिन सुहागिनें शिव-पार्वती की जोड़ी की पूजा करती हैं और इसे कभी नहीं भूलतीं। पति की दीर्घायु की कामना पार्वती-कृपा से पूर्ण होती है।
चौपाई 17
हरियाली तीज और हरितालिका। दोनों तीज में तुम हो पालिका॥ सावन में सोमवार का व्रत। पार्वती की पूजा-भक्ति-कृत॥
हरियाली तीज और हरितालिका तीज — दोनों तीज में आप पालक देवी हैं। सावन में सोमवार का व्रत भी पार्वती की पूजा और भक्ति का हिस्सा है।
चौपाई 18
कुँवारी कन्या मनवांछित वर। पार्वती-पूजन से पाए घर॥ सौभाग्य और सुखी-दाम्पत्य। पार्वती-कृपा से मिले सत्य॥
कुँवारी कन्या मनवांछित वर पाने के लिए पार्वती का पूजन करती हैं। परंपरा में यह माना जाता है कि उनकी कृपा से सौभाग्य और सुखी दाम्पत्य मिलता है।
चौपाई 19
संतान की कामना करने वाले। पार्वती-पूजन से फल पाले॥ गणेश-माता की स्तुति जो करे। घर में सुख-समृद्धि को वह वरे॥
संतान की कामना वाले पार्वती का पूजन करते हैं और मान्यता है कि उन्हें फल मिलता है। जो गणेश-माता की स्तुति करता है, उसके घर में सुख-समृद्धि आती है।
चौपाई 20
विद्या-बुद्धि और सुशीलता। पार्वती की कृपा से मिले कलता॥ सत्य-धर्म और करुणा-भाव। माँ पार्वती का है यही स्वभाव॥
पार्वती की कृपा से विद्या, बुद्धि और सुशीलता की प्राप्ति होती है। सत्य-धर्म और करुणा-भाव — यही माँ पार्वती का स्वभाव है।
चौपाई 21
शिव की तपस्या रोकन को। देवों ने भेजा कामदेव को॥ काम-शर से शिव क्रुद्ध हुए। कामदेव तत्काल भस्म हुए॥
शिव की तपस्या रोकने के लिए देवताओं ने कामदेव को भेजा। कामदेव के बाण से क्रुद्ध होकर शिव ने उन्हें तत्काल भस्म कर दिया।
चौपाई 22
पार्वती ने ली रति को छाती। रती-विलाप सुन शिव का मन माती॥ रति-प्रार्थना सुन शिव ने दिया। काम को पुनर्जीवन-वरदान किया॥
पार्वती ने रति को सांत्वना दी। रति के विलाप से शिव का मन पसीज गया। रति की प्रार्थना सुनकर शिव ने कामदेव को पुनर्जीवन का वरदान दिया।
चौपाई 23
दुर्गम-काल में अन्न-वर्षा। शाकम्भरी-रूप से दी धरा॥ भक्तों की भूख-प्यास हर्षित। शक्ति-रूपा माँ सदा समर्पित॥
कठिन काल में आपने शाकम्भरी-रूप में धरती पर अन्न-वृष्टि की और भूखे-प्यासे भक्तों की पीड़ा दूर की। शक्ति-रूपिणी माँ सदा भक्तों के प्रति समर्पित हैं।
चौपाई 24
शुम्भ-निशुम्भ वध तुमने किया। मधु-कैटभ को भी दंड दिया॥ रक्तबीज का रक्त पी गईं। काली-रूप में विजय-श्री पाईं॥
आपने शुम्भ और निशुम्भ का वध किया और मधु-कैटभ को भी दंडित किया। रक्तबीज का रक्त पीकर काली-रूप में आपने विजय प्राप्त की।
चौपाई 25
जो तीज-व्रत माँ का करे। सुहागिन नित-शुभ सुख वरे॥ सत्रह साल का तीज-व्रत किया। पार्वती ने शिव को पति लिया॥
जो माँ का तीज व्रत करती है, वह सुहागिन नित्य शुभ और सुख पाती है। परंपरा के अनुसार पार्वती ने सत्रह वर्ष तक तीज व्रत किया और शिव को पति रूप में पाया।
चौपाई 26
सोमवार का व्रत जो करे। शिव-पार्वती की कृपा को वरे॥ महाशिवरात्रि पर पूजन करें। दाम्पत्य-सुख और शांति वरें॥
जो सोमवार का व्रत रखता है, उस पर शिव-पार्वती की कृपा होती है। महाशिवरात्रि पर पूजन करने से दाम्पत्य-सुख और मन की शांति मिलती है।
चौपाई 27
पार्वती की कृपा से ज्ञान मिले। शिव-पंचाक्षर-रहस्य खिले॥ आत्म-ज्ञान और विवेक-सार। माँ की शरण में पाए पार॥
पार्वती की कृपा से ज्ञान प्राप्त होता है और शिव-पंचाक्षर के रहस्य खुलते हैं। माँ की शरण में आत्म-ज्ञान और विवेक-सार मिलते हैं और जीव भव-सागर पार होता है।
चौपाई 28
रोग-शोक और क्लेश-जाल। माँ की शरण में कटे काल॥ भय और दारिद्र्य दूर भागे। जब पार्वती-पूजन में मन लागे॥
रोग, शोक और क्लेश का जाल माँ की शरण में कट जाता है। जब मन पार्वती पूजन में लगता है, तब भय और दारिद्र्य दूर भाग जाते हैं।
चौपाई 29
गौरी-पूजन में बेल-पत्र। फूल-धूप-दीप-नैवेद्य-यंत्र॥ लाल वस्त्र और लाल पुष्प चढ़ाएँ। पार्वती-कृपा का वरण पाएँ॥
गौरी पूजन में बेलपत्र, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। लाल वस्त्र और लाल फूल चढ़ाने से पार्वती-कृपा की प्राप्ति होती है।
चौपाई 30
शक्ति-पीठ में जो दर्शन करे। पार्वती की उपस्थिति को वरे॥ इक्यावन शक्ति-पीठ की यात्रा। पावन करे मन की हर विरात्रा॥
जो शक्ति-पीठ में दर्शन करता है, उसे पार्वती की उपस्थिति का अनुभव होता है। इक्यावन शक्ति-पीठों की यात्रा मन की सभी अशुद्धियाँ दूर करती है।
चौपाई 31
ब्रह्मा-विष्णु-शिव मिलकर तुम्हें। जगत-जननी कहते आदर से॥ देव-देवी सब तुम्हारे आगे। प्रणाम करते मन-भाव जागे॥
ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों मिलकर आपको 'जगत-जननी' कहकर आदर देते हैं। सभी देवी-देवता आपके सामने प्रणाम करते हैं और मन में भाव जागता है।
चौपाई 32
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत माँ की सहाई॥ ऋतु-पर्व पर पाठ जो करे। पार्वती-कृपा का फल वह वरे॥
जो मन लगाकर इसका पाठ करता है, माँ उसकी सहायता करती हैं। ऋतु-पर्व पर पाठ करने वाले को पार्वती-कृपा का फल मिलता है।
चौपाई 33
जय जय पार्वती जग-जननी। जय उमा-शिव-अर्धांगिनी। जय हिमवत-दुलारी माया। जय त्रिभुवन-ईश्वरी-सुख-छाया॥
हे जग-जननी पार्वती, उमा, शिव की अर्धांगिनी, हिमवान की प्यारी पुत्री — सभी को जय हो। हे त्रिभुवन-ईश्वरी, आप सुख की छाया हैं।
दोहा
पार्वती-चालीसा यह पाठ, नित पढ़े जो लाय ध्यान। उमा-कृपा से उस जन को, मिले मोक्ष-कल्याण॥
जो नित्य ध्यान से इस पार्वती-चालीसा का पाठ करता है, उसे उमा की कृपा से मोक्ष और कल्याण प्राप्त होता है — ऐसी भक्तों की श्रद्धा है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पार्वती चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में सोमवार, हरियाली तीज, हरितालिका तीज, नवरात्रि और महाशिवरात्रि विशेष शुभ माने जाते हैं। विवाह की कामना वाली कन्याएँ और सुहागिनें दोनों इसका पाठ करती हैं।
तीज पर पार्वती की पूजा का क्या महत्त्व है?
परंपरा के अनुसार पार्वती ने खुद शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था और तीज व्रत रखा था। इसलिए सुहागिनें अपने पति की दीर्घायु और कुँवारी कन्याएँ मनवांछित वर के लिए इस दिन पार्वती का पूजन करती हैं।
पार्वती पूजन में क्या अर्पित करें?
परंपरागत रूप से लाल फूल, बेलपत्र, लाल वस्त्र, सुहाग की सामग्री (चूड़ियाँ, सिंदूर, महावर), फल और मिठाई अर्पित की जाती है। धूप-दीप जलाएँ और पार्वती चालीसा या मंगलगौरी व्रत कथा का पाठ करें।
पार्वती चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है?
भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर वैवाहिक जीवन में सुख, मन की शांति, संतान का आशीर्वाद और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। पार्वती करुणा और शक्ति की देवी हैं — उनकी भक्ति से जीवन के कठिन पड़ावों में धैर्य और बल मिलता है।