गंगा चालीसा — अर्थ सहित

गंगा चालीसा माँ गंगा की स्तुति है, जिसमें भगीरथ की तपस्या, शिव की जटाओं में गंगा का आना और उनकी तीन धाराओं की कथा है। चालीसा के अनुसार इसके रचयिता सुन्दरदास हैं। गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, पूर्णिमा और गंगा स्नान के समय इसका पाठ किया जाता है।

40 चौपाई · लगभग 8 मिनट

॥ दोहा ॥

जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग। जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जननी हरण अघखानी। आनँद करनि गंग महरानी॥

॥ चौपाई ॥

जय भगीरथी सुरसरि माता। कलिमल मूल दलनि विख्याता॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जह्नु सुता अघ हननी। भीषम की माता जग जननी॥

॥ चौपाई ॥

धवल कमल दल मम तनु साजे। लखि शत शरद चन्द्र छवि लाजे॥

॥ चौपाई ॥

वाहन मकर विमल शुचि सोहै। अमिय कलश कर लखि मन मोहै॥

॥ चौपाई ॥

जड़ित रत्न कंचन आभूषण। हिय मणि हार, हरणितम दूषण॥

॥ चौपाई ॥

जग पावनि त्रय ताप नसावनि। तरल तरंग तुंग मन भावनि॥

॥ चौपाई ॥

जो गणपति अति पूज्य प्रधाना। तिहुँ ते प्रथम गंग अस्नाना॥

॥ चौपाई ॥

ब्रह्म कमण्डल वासिनी देवी। श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी॥

॥ चौपाई ॥

साठि सहस्र सगर सुत तार्यो। गंगा सागर तीरथ धार्यो॥

॥ चौपाई ॥

अगम तरंग उठ्यो मन भावन। लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन॥

॥ चौपाई ॥

तीरथ राज प्रयाग अक्षयवट। धर्यो मातु पुनि काशी करवट॥

॥ चौपाई ॥

धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी। तारणि अमित पितृ पद पीढ़ी॥

॥ चौपाई ॥

भगीरथ तप कियो अपारा। दियो ब्रह्म तब सुरसरि धारा॥

॥ चौपाई ॥

जब जग जननी चल्यो हहराई। शम्भु जटा महँ रह्यो समाई॥

॥ चौपाई ॥

वर्ष पर्यन्त गंग महरानी। रहीं शम्भु के जटा भुलानी॥

॥ चौपाई ॥

पुनि भगीरथ शम्भुहिं ध्यायो। तब इक बूँद जटा से पायो॥

॥ चौपाई ॥

ताते मातु भईं त्रय धारा। मृत्यु लोक, नभ, अरु पातारा॥

॥ चौपाई ॥

गईं पाताल प्रभावति नामा। मन्दाकिनी गई गगन ललामा॥

॥ चौपाई ॥

मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनि। कलिमल हरणि अगम जग पावनि॥

॥ चौपाई ॥

धनि मइया तव महिमा भारी। धर्म धुरी कलि कलुष कुठारी॥

॥ चौपाई ॥

मातु प्रभावति धनि मन्दाकिनी। धनि सुरसरित सकल भयनासिनी॥

॥ चौपाई ॥

पान करत निर्मल गंगाजल। पावत मन इच्छित अनन्त फल॥

॥ चौपाई ॥

पूरब जन्म पुण्य जब जागत। तबहिं ध्यान गंगा महँ लागत॥

॥ चौपाई ॥

जइ पगु सुरसरि हेतु उठावहिं। तइ जगि अश्वमेध फल पावहिं॥

॥ चौपाई ॥

महा पतित जिन काहु न तारे। तिन तारे इक नाम तिहारे॥

॥ चौपाई ॥

शत योजनहू से जो ध्यावहिं। निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं॥

॥ चौपाई ॥

नाम भजत अगणित अघ नाशै। विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै॥

॥ चौपाई ॥

जिमि धन मूल धर्म अरु दाना। धर्म मूल गंगाजल पाना॥

॥ चौपाई ॥

तव गुण गुणन करत दुख भाजत। गृह गृह सम्पति सुमति विराजत॥

॥ चौपाई ॥

गंगहिं नेम सहित नित ध्यावत। दुर्जनहूँ सज्जन पद पावत॥

॥ चौपाई ॥

बुद्धिहीन विद्या बल पावै। रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै॥

॥ चौपाई ॥

गंगा गंगा जो नर कहहीं। भूखे नंगे कबहुँ न रहहीं॥

॥ चौपाई ॥

निकसत ही मुख गंगा माई। श्रवण दाबि यम चलहिं पराई॥

॥ चौपाई ॥

महाँ अघिन अधमन कहँ तारे। भए नरक के बन्द किवारे॥

॥ चौपाई ॥

जो नर जपै गंग शत नामा। सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा॥

॥ चौपाई ॥

सब सुख भोग परम पद पावहिं। आवागमन रहित ह्वै जावहिं॥

॥ चौपाई ॥

धनि मइया सुरसरि सुखदैनी। धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी॥

॥ चौपाई ॥

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा। सुन्दरदास गंगा कर दासा॥

॥ चौपाई ॥

जो यह पढ़ै गंगा चालीसा। मिलै भक्ति अविरल वागीसा॥

॥ दोहा ॥

नित नव सुख सम्पति लहैं, धरैं गंग का ध्यान। अन्त समय सुरपुर बसैं, सादर बैठि विमान॥

॥ दोहा ॥

संवत भुज नभ दिशि, राम जन्म दिन चैत्र। पूरण चालीसा कियो, हरि भक्तन हित नेत्र॥

इसके बाद पढ़ें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गंगा चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

इसे किसी भी दिन सुबह स्नान के बाद पढ़ सकते हैं। परंपरा से गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, पूर्णिमा, अमावस्या और गंगा स्नान के दिन इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।

गंगा चालीसा किसने लिखी?

चालीसा की अंतिम चौपाइयों में कवि ने अपना नाम सुन्दरदास बताया है और ककरा गाँव तथा दुर्वासा ऋषि के आश्रम का उल्लेख किया है।

क्या गंगा से दूर रहकर भी गंगा चालीसा पढ़ सकते हैं?

हाँ। चालीसा स्वयं कहती है कि सौ योजन दूर से भी जो गंगा का ध्यान करता है, उसे पुण्य मिलता है। घर पर गंगाजल रखकर श्रद्धा से पाठ कर सकते हैं।

इस बारे में कुछ पूछें

पढ़ने की सेटिंग

रंग

अक्षर का आकार