भैरव चालीसा — अर्थ सहित

भैरव चालीसा भगवान कालभैरव की स्तुति है, जो शिव के उग्र और रक्षक रूप हैं। वे काशी के कोतवाल और मृत्यु के देवता माने जाते हैं, फिर भी भक्तों पर वे सदा कृपालु हैं। भैरव अष्टमी, शनिवार और रात्रि-काल में इस चालीसा का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।

37 चौपाई, 3 दोहे · लगभग 8 मिनट

॥ दोहा ॥

श्री गणेश गुरुपाद नमूँ, नमूँ शारद माय। कालभैरव की महिमा, गाऊँ प्रेम लगाय॥

॥ दोहा ॥

जय कालभैरव दुःखहर्ता, जय काशी-कोतवाल। भव-बंधन से मुक्त करो, नमूँ तुम्हें तत्काल॥

॥ चौपाई ॥

जय कालभैरव शम्भु-स्वरूपा। नीलवर्ण तन रौद्र-अनूपा॥ चार भुजाएँ त्रिशूल-धारी। खप्पर-डमरू शत्रु-संहारी॥

॥ चौपाई ॥

नरमुंड माला गले सुहावे। सर्प-भुजंग तन को सजावे॥ श्वान-वाहन पर करो विहारा। रात्रि-काल के हो तुम रखवारा॥

॥ चौपाई ॥

भृकुटी चढ़ी नयन लाल भारी। जटाजूट पर चंद्र सुखकारी॥ भस्म-लिप्त तन दिव्य निराला। भूत-प्रेत दल संग तुम्हारा॥

॥ चौपाई ॥

काशी-पुरी के हो कोतवाला। जो आवे-जाये तुम्हीं सँभाला॥ देहांत-काल तारक-मंत्र देते। यही मोक्ष का मार्ग-अनंते॥

॥ चौपाई ॥

काशी में जो तन को त्यागे। शिव-ध्यान से उसके पाप भागे॥ कान में तारक-ध्वनि सुनाते। उसको मोक्ष-धाम पहुँचाते॥

॥ चौपाई ॥

ब्रह्मा के शिर पंचम काटा। ब्रह्म-हत्या का दोष लगा घाटा॥ भिक्षा-पात्र बन कपाल थामा। भटकत-भटकत काशी धामा॥

॥ चौपाई ॥

काशी की पावन भूमि पग रखा। कपाल भूमि पर गिरत वहाँ। ब्रह्म-हत्या से मुक्त हुए तब। काशी के तुम रक्षक बने तब॥

॥ चौपाई ॥

अष्ट-भैरव के तुम हो नायक। आठों दिश के रक्षक-सायक॥ असितांग रुरु चंड-कराला। क्रोध उन्मत्त कपाली ज्वाला॥

॥ चौपाई ॥

भीषण और संहार-भैरवा। आठों मिल करें जग-सेवा॥ आठों दिशा के हैं रक्षक ये। सकल जगत के पालक ये॥

॥ चौपाई ॥

रात्रि में तुम नगर भ्रमण करते। भूत-पिशाच को दंड देते॥ जो रात्रि-काल में तुम्हें सुमिरे। कोई बाधा उसको न घेरे॥

॥ चौपाई ॥

श्वान-रूप में तुम विचरते। भक्तों के द्वारे रक्षा करते॥ जो श्वान को भोजन कराए। वही भैरव-प्रसाद पाए॥

॥ चौपाई ॥

काले तिल और उड़द अर्पण। सरसों तेल से करे दीपन॥ नींबू-मिठाई भी चढ़ाएँ। भैरव-कृपा को वह पाएँ॥

॥ चौपाई ॥

शनिवार और कालाष्टमी-दिन। भैरव-पूजन का है शुभ निदिन॥ मार्गशीर्ष कृष्ण-अष्टमी। यही तिथि है शुभ भैरव-महिमी॥

॥ चौपाई ॥

तंत्र-मंत्र के तुम अधिपति। शत्रु-नाश और बाधा-हर्ती॥ संकट-मोचन भव-दुःख-हर्ता। भक्तों के सदा कारज-कर्ता॥

॥ चौपाई ॥

भय से त्रस्त जो साधक आए। भैरव-शरण में वह मुक्त पाए॥ बड़ी-से-बड़ी विपदा भी हर्ते। भैरव-कृपा से शुभ करते॥

॥ चौपाई ॥

संकट में जो तुम्हें पुकारे। भैरव तत्काल दुःख निवारे॥ रात को भी न होए डरना। जो भैरव को हृदय में धरना॥

॥ चौपाई ॥

रोग-शोक और दुर्भाग्य टले। भैरव-स्मरण से चित्त निर्मल मिले॥ उच्च-नीच का भेद न माने। भैरव सबकी पीड़ा पहचाने॥

॥ चौपाई ॥

प्रेत-बाधा और तंत्र-बाधा। भैरव-पूजन से हो निवाधा॥ जो बुरी नज़र से पीड़ित होए। भैरव-कृपा से वह मुक्त होए॥

॥ चौपाई ॥

यात्रा में जो तुम्हें सुमिरे। कोई बाधा उसको न घेरे॥ सफर में भैरव रक्षक बनते। खतरों से वह सदा बचते॥

॥ चौपाई ॥

शत्रु-नाश की जो कामना। भैरव-पूजन से पूर्ण करना॥ न्याय-देवता भी तुम्हीं हो। अन्याय-कर्म का दंड दो॥

॥ चौपाई ॥

शनि की पीड़ा हरते भैरव। राहु-केतु भय हरते भैरव॥ नवग्रह-पीड़ा से जो व्याकुल। भैरव-शरण में पाए वह विमल॥

॥ चौपाई ॥

संतान-हीन को संतान मिले। कर्ज़-ग्रस्त का कर्ज़ भी टले॥ जो माँगे श्रद्धा से आकर। भैरव पूरन करें मनोरथ-साकर॥

॥ चौपाई ॥

वीरता और बल के हो दाता। भक्तों के सब मनोरथ-पाता॥ शस्त्र-पूजन में तुम्हें मनाएँ। रण में वीर सुरक्षा पाएँ॥

॥ चौपाई ॥

गृह-प्रवेश और नई शुरुआत। भैरव-पूजन से शुभ हो बात॥ नई राह पर जो कदम रखे। भैरव-कृपा से शुभ-पथ लखे॥

॥ चौपाई ॥

क्रोध-ताप और द्वेष-भाव। भैरव-स्मरण से करे अभाव॥ मन में शांति और समता आए। जो भैरव-ध्यान नित्य लगाए॥

॥ चौपाई ॥

वज्र-देह और अटल मनोबल। भैरव-कृपा से मिलता है बल॥ रोग-शोक और दुर्भाग्य टले। भैरव-चरणों में जो मन लगाले॥

॥ चौपाई ॥

झूठ-कपट को कभी न सहते। सत्य-पथ पर भक्त को रखते॥ धर्म-मार्ग का पालन करने पर। भैरव देते फल मन-भरने पर॥

॥ चौपाई ॥

उज्जैन के कालभैरव-स्वामी। क्षेत्रपाल हो तुम अंतर्यामी॥ काशी-विश्वनाथ के द्वारपाल। शिव-लीला के हो तुम रखवाल॥

॥ चौपाई ॥

ब्रह्मा-विष्णु-शिव तुम्हें नमाते। देव और मुनि गुण-गान गाते॥ कोई न जाने तुम्हारी सीमा। अपरम्पार है तुम्हारी महिमा॥

॥ चौपाई ॥

कालाष्टमी पर जो पूजन करे। कालभैरव की कृपा को वरे॥ अभिषेक से करे संतुष्ट। भैरव प्रसन्न हों भक्त-जन-शिष्ट॥

॥ चौपाई ॥

प्रतिदिन करे जो स्तुति-पाठ। भैरव-कृपा से मिटे अभाव-आठ॥ वर्ष-भर के संकट दूर होते। जीवन में शुभ-मंगल होते॥

॥ चौपाई ॥

नित्य सुबह-शाम दीप जलाएँ। भैरव-चालीसा का पाठ करें॥ श्रद्धा-भाव से जो नमन करे। उसका संकट भैरव सदा हरे॥

॥ चौपाई ॥

श्वान को भोजन रोज कराएँ। गरीब-असहाय को भोजन खिलाएँ॥ यही भैरव-पूजन का सार है। यही भक्ति का उत्तम द्वार है॥

॥ चौपाई ॥

इक्कीस बार जो पाठ करे। भैरव-कृपा का वरण करे॥ संकट में पाठ नित करने से। शांति मिले, डर जाए हटने से॥

॥ चौपाई ॥

शिव के अंश हो तुम महाकाल। पर भक्तों के हो कृपाल॥ काल से डरे न जो तुम्हें भजे। भैरव-कृपा से मुक्त-पद सजे॥

॥ चौपाई ॥

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है भैरव सहाई॥ ऋनियाँ जो कोई पाठ करे। भैरव की कृपा को वह वरे॥

॥ चौपाई ॥

जय भैरव जय कालभैरव। जय काशी-पति जय महाभैरव॥ जय अष्टभैरव जय त्रिभुवन-पति। जय शिव-अंश जय जगत-विधाता-मति॥

॥ दोहा ॥

भैरव-चालीसा यह पाठ, नित पढ़े जो लाय ध्यान। भैरव-कृपा से उस जन को, मिले मोक्ष-कल्याण॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भैरव चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में शनिवार, कालाष्टमी और भैरव अष्टमी (मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी) विशेष शुभ माने जाते हैं। रात्रि में पाठ करना भी शुभ माना जाता है। अनेक भक्त मध्यरात्रि में या सूर्यास्त के बाद भैरव का पूजन करते हैं।

भैरव पूजन में क्या अर्पित करें?

परंपरागत रूप से काले तिल, उड़द की दाल, सरसों के तेल का दीप, नींबू और गुड़ अर्पित किया जाता है। कुत्ते को भोजन कराना भैरव को प्रसन्न करने का सरल उपाय माना जाता है। गरीब और जरूरतमंद को भोजन कराना भी भैरव-पूजन का हिस्सा माना जाता है।

भैरव का वाहन कुत्ता क्यों है?

परंपरा में कुत्ते को रात का जागरूक और वफादार रक्षक माना जाता है। भैरव रात के रखवाले हैं और कुत्ता उनके साथी और वाहन के रूप में उनकी नगर-रक्षा में सहायक है। कुत्तों को भोजन कराना इसीलिए भैरव की सेवा का रूप माना जाता है।

भैरव चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है?

भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर भय, शत्रु-भय और रात्रि-भय कम होता है, मन को शांति मिलती है और भैरव की सुरक्षा प्राप्त होती है। परंपरा में इसे काशी की यात्रा, शनि-पीड़ा और नवग्रह-बाधा में भी पढ़ा जाता है। सबसे ज़रूरी है सच्चा मन और नियमित पाठ।

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