जय भैरव देवा आरती — अर्थ सहित

भैरव जी भगवान शिव का उग्र रूप माने जाते हैं और काशी के कोतवाल कहलाते हैं। इस आरती में उनके बटुक (बालक) रूप का भी वर्णन है, जो पैरों में घुंघरू बाँधे और डमरू बजाते हुए भक्तों का मन प्रसन्न करते हैं। रविवार, मंगलवार और भैरव अष्टमी पर यह आरती गाई जाती है।

7 पद · लगभग 4 मिनट

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा। जय काली और गौरा देवी कृत सेवा॥

तुम्हीं पाप उद्धारक दुःख सिन्धु तारक। भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक॥

वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी। महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी॥

तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे। चौमुख दीपक दर्शन दुःख सगरे खोवे॥

तेल चटकि दधि मिश्रित भाषावलि तेरी। कृपा करिये भैरव करिये नहीं देरी॥

पाँव घुँघरू बाजत अरु डमरू डमकावत। बटुकनाथ बन बालक जन मन हर्षावत॥

बटुकनाथ की आरती जो कोई नर गावे। कहें धरणीधर नर मनवांछित फल पावे॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भैरव जी की आरती कब करनी चाहिए?

परंपरा में रविवार और मंगलवार, हर महीने की कालाष्टमी और विशेष रूप से मार्गशीर्ष की भैरव अष्टमी पर।

भैरव जी का वाहन क्या है?

भैरव जी का वाहन कुत्ता (श्वान) है। इसीलिए कई भक्त भैरव पूजा के दिन कुत्तों को रोटी खिलाते हैं।

बटुक भैरव कौन हैं?

बटुक भैरव भैरव जी का सौम्य बाल रूप हैं। यह आरती उन्हीं को 'बटुकनाथ' कहकर समर्पित है।

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