ॐ जय बृहस्पति देवा आरती — अर्थ सहित

बृहस्पति देव देवताओं के गुरु हैं और ज्ञान व धर्म के प्रतीक माने जाते हैं। गुरुवार (बृहस्पतिवार) का व्रत रखने वाले भक्त कथा सुनने के बाद यह आरती गाते हैं। इसमें उन्हें केले और मेवे का भोग लगाने की बात आती है, इसलिए इस दिन केले के पेड़ की पूजा और पीली चीज़ों का भोग प्रचलित है।

7 पद · लगभग 4 मिनट

ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा। छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा॥

तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी॥

चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता। सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता॥

तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े। प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े॥

दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी। पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी॥

सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारो। विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी॥

जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे। जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे॥

इसके बाद पढ़ें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बृहस्पति देव की आरती कब गाई जाती है?

गुरुवार के दिन, खासकर बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुनने के बाद पूजा के अंत में।

गुरुवार की पूजा में क्या चढ़ाया जाता है?

परंपरा में चने की दाल, गुड़, केला, पीले फूल और पीले वस्त्र। आरती में भी केले और मेवे का भोग बताया गया है।

बृहस्पति देव कौन हैं?

बृहस्पति देव ऋषि अंगिरा के पुत्र और देवताओं के गुरु हैं। नवग्रहों में वे गुरु ग्रह (बृहस्पति) के देवता माने जाते हैं।

इस बारे में कुछ पूछें

पढ़ने की सेटिंग

रंग

अक्षर का आकार