रहीम के 15 प्रसिद्ध दोहे — अर्थ सहित
अब्दुर रहीम खान-ए-खाना (1556–1627) मुग़ल सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक थे। ब्रज भाषा में लिखे उनके दोहे व्यावहारिक जीवन-ज्ञान के अनमोल मोती हैं और सदियों से पाठ्यक्रमों में पढ़ाए जाते रहे हैं।
॥ दोहा ॥
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े जुड़े गाँठ परि जाय॥
॥ दोहा ॥
बिगरी बात बनै नहीं लाख करो किन कोय। रहिमन बिगरे दूध को मथे न माखन होय॥
॥ दोहा ॥
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे मोती मानुस चून॥
॥ दोहा ॥
जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग। चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग॥
॥ दोहा ॥
एकै साधे सब सधै सब साधे सब जाय। रहिमन मूलहि सींचिबो फूलै फलै अघाय॥
॥ दोहा ॥
रहिमन निज मन की बिथा मन ही राखो गोय। सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लैहैं कोय॥
॥ दोहा ॥
रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिए डारि। जहाँ काम आवे सुई कहा करे तलवारि॥
॥ दोहा ॥
वे रहीम नर धन्य हैं पर उपकारी अंग। बाँटनवारे को लगे ज्यों मेहंदी को रंग॥
॥ दोहा ॥
रहिमन ओछे नरन सो बैर भलो न प्रीति। काटे चाटे स्वान के दोउ भाँति विपरीति॥
॥ दोहा ॥
जे गरीब पर हित करे ते रहीम बड़ लोग। कहाँ सुदामा बापुरो कृष्ण मिताई जोग॥
॥ दोहा ॥
रहिमन वे नर मर गए जे कहुँ माँगन जाहि। उनते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहि॥
॥ दोहा ॥
धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पियत अघाय। उदधि बड़ाई कौन है जगत पियासो जाय॥
॥ दोहा ॥
रहिमन चुप हो बैठिए देखि दिनन के फेर। जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं देर॥
॥ दोहा ॥
खीरा सिर से काटिए मलियत नमक लगाय। रहिमन करुए मुखन को चाहिए यही सजाय॥
॥ दोहा ॥
अब रहीम मुश्किल परी गाढ़े दोऊ काम। साँचे से तो जग नहीं झूठे मिलें न राम॥
अर्थ
दोहा
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े जुड़े गाँठ परि जाय॥
रहीम कहते हैं — प्रेम के धागे को झटके से मत तोड़ो। टूट जाने पर वह फिर जुड़ता नहीं, और अगर जुड़ भी जाए तो गाँठ पड़ जाती है।
दोहा
बिगरी बात बनै नहीं लाख करो किन कोय। रहिमन बिगरे दूध को मथे न माखन होय॥
जो बात बिगड़ जाए वह लाख कोशिशों से भी नहीं बनती। रहीम कहते हैं — फटे हुए दूध को मथने से मक्खन नहीं निकलता।
दोहा
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे मोती मानुस चून॥
रहीम कहते हैं — मान-मर्यादा (पानी) को बनाए रखो, क्योंकि बिना इसके सब सूना है। पानी जाने पर मोती, मनुष्य और चूना — तीनों का मूल्य खत्म हो जाता है।
दोहा
जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग। चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग॥
जो उत्तम स्वभाव का हो उसे बुरी संगति बिगाड़ नहीं सकती। जैसे चंदन के पेड़ पर सांप लिपटे रहते हैं, फिर भी उसमें विष नहीं व्याप्त होता।
दोहा
एकै साधे सब सधै सब साधे सब जाय। रहिमन मूलहि सींचिबो फूलै फलै अघाय॥
एक काम साधने से सब सध जाता है; सब एक साथ साधने की कोशिश में सब चला जाता है। रहीम कहते हैं — पेड़ की जड़ सींचो, वह खूब फले-फूलेगा।
दोहा
रहिमन निज मन की बिथा मन ही राखो गोय। सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लैहैं कोय॥
रहीम कहते हैं — अपने मन की पीड़ा को मन में ही रखो। दूसरों को सुनाने पर वे मजाक बनाएंगे; कोई बोझ बाँटने नहीं आएगा।
दोहा
रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिए डारि। जहाँ काम आवे सुई कहा करे तलवारि॥
बड़ों को देखकर छोटों को मत भूलो। जहाँ सुई काम आती है, वहाँ तलवार क्या करेगी?
दोहा
वे रहीम नर धन्य हैं पर उपकारी अंग। बाँटनवारे को लगे ज्यों मेहंदी को रंग॥
रहीम कहते हैं — वे लोग धन्य हैं जिनका स्वभाव दूसरों का उपकार करना है। जैसे मेहंदी लगाने वाले के हाथों में भी रंग लग जाता है।
दोहा
रहिमन ओछे नरन सो बैर भलो न प्रीति। काटे चाटे स्वान के दोउ भाँति विपरीति॥
रहीम कहते हैं — नीच लोगों से न तो वैर करना ठीक है, न प्रेम। कुत्ते के काटने और चाटने, दोनों में ही हानि है।
दोहा
जे गरीब पर हित करे ते रहीम बड़ लोग। कहाँ सुदामा बापुरो कृष्ण मिताई जोग॥
रहीम कहते हैं — जो गरीबों का भला करे वे सच में बड़े लोग हैं। देखो, सुदामा गरीब थे, फिर भी श्रीकृष्ण ने उनसे मित्रता की।
दोहा
रहिमन वे नर मर गए जे कहुँ माँगन जाहि। उनते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहि॥
रहीम कहते हैं — वे लोग मर जाते हैं जो कहीं माँगने जाते हैं। लेकिन उनसे पहले वे मर जाते हैं जिनके मुँह से (देने के लिए) कुछ नहीं निकलता — यानी कंजूस।
दोहा
धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पियत अघाय। उदधि बड़ाई कौन है जगत पियासो जाय॥
रहीम कहते हैं — धन्य है कीचड़ का पानी, जिसे छोटे जीव पीकर तृप्त होते हैं। समुद्र की बड़ाई किस काम की, जब सारा जगत प्यासा ही रह जाए?
दोहा
रहिमन चुप हो बैठिए देखि दिनन के फेर। जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं देर॥
रहीम कहते हैं — बुरे दिनों में चुप रहो और समय का खेल देखते रहो। जब अच्छे दिन आएंगे, तो काम बनने में देर नहीं लगेगी।
दोहा
खीरा सिर से काटिए मलियत नमक लगाय। रहिमन करुए मुखन को चाहिए यही सजाय॥
खीरे का कड़वापन हटाने के लिए उसका सिर काटकर नमक मलते हैं। रहीम कहते हैं — कड़वा बोलने वालों के लिए यही सजा उचित है।
दोहा
अब रहीम मुश्किल परी गाढ़े दोऊ काम। साँचे से तो जग नहीं झूठे मिलें न राम॥
रहीम कहते हैं — अब तो बड़ी मुश्किल आ पड़ी है — दोनों काम कठिन हैं। सच बोलने से दुनिया नहीं मिलती, झूठ से राम नहीं मिलते।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
इसके बाद पढ़ें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रहीम कौन थे?
अब्दुर रहीम खान-ए-खाना (1556–1627) मुग़ल बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। वे महान सेनापति, कवि और विद्वान थे। ब्रज भाषा में लिखे उनके दोहे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
रहीम का सबसे प्रसिद्ध दोहा कौन सा है?
'रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय...' — प्रेम और रिश्तों पर यह दोहा सबसे अधिक उद्धृत किया जाता है। 'रहिमन पानी राखिए...' भी उतना ही प्रसिद्ध है।
रहीम के दोहे किस भाषा में हैं?
रहीम के अधिकांश दोहे ब्रज भाषा में हैं, जो उस काल की साहित्यिक हिंदी थी। उनके 'रहिमन' शब्द से शुरू होने वाले दोहे विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।