आदित्य हृदय स्तोत्र — अर्थ सहित

आदित्य हृदय सूर्य देव की स्तुति है, जो वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में आती है। रावण से अंतिम युद्ध से पहले थके हुए श्रीराम को अगस्त्य ऋषि ने यह स्तोत्र सिखाया था। इसे सुबह सूर्योदय के समय, विशेषकर रविवार को, पढ़ना शुभ माना जाता है।

31 श्लोक · लगभग 10 मिनट

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्। रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥१॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्। उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥२॥

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्। येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥३॥

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्। जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम्॥४॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्। चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्॥५॥

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्। पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥६॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः। एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥७॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः। महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥८॥

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः। वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥९॥

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्। सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥१०॥

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्। तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान्॥११॥

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः। अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥१२॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः। घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥१३॥

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः। कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः॥१४॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः। तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥१५॥

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः। ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥१६॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः। नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥१७॥

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः। नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः॥१८॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे। भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥१९॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने। कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥२०॥

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे। नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥२१॥

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः। पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥२२॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः। एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥२३॥

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च। यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥२४॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च। कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥२५॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्। एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥२६॥

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि। एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम्॥२७॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा। धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥२८॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्। त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥२९॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्। सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥३०॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः। निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥३१॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

परंपरा के अनुसार सुबह सूर्योदय के समय, स्नान के बाद, उगते सूर्य की ओर मुख करके पाठ करना सबसे अच्छा माना जाता है। रविवार और छठ जैसे सूर्य से जुड़े पर्वों पर इसका विशेष महत्व है।

आदित्य हृदय का पाठ कैसे करें और कितनी बार?

स्वच्छ होकर पूर्व की ओर बैठें या खड़े हों, चाहें तो सूर्य को जल (अर्घ्य) दें, फिर शांत मन से पूरा पाठ करें। स्तोत्र में ही अगस्त्य ऋषि तीन बार जप की बात कहते हैं, पर रोज़ एक बार पाठ भी पर्याप्त माना जाता है।

आदित्य हृदय स्तोत्र किस ग्रंथ से है?

यह महर्षि वाल्मीकि की रामायण के युद्धकांड से है, जहाँ रावण से अंतिम युद्ध से पहले अगस्त्य ऋषि श्रीराम को यह स्तोत्र सिखाते हैं।

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