पितृ पक्ष: श्राद्ध कैसे करें, क्या करें और क्या नहीं

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संक्षेप में: पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक 15 दिन का होता है। इन दिनों पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान किया जाता है। परंपरागत मान्यता है कि इन दिनों पितृ पृथ्वी पर वापस आते हैं और परिवार का आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि पर या महालया अमावस्या (सर्व पितृ अमावस्या) को किया जाता है।

एक नज़र में

अवधि
15 दिन (भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या)
मुख्य दिन
महालया अमावस्या (सर्व पितृ अमावस्या)
कर्म
तर्पण, पिंड दान, ब्राह्मण भोज
भोजन
खीर, पूरी, सब्ज़ी, तिल मिश्रित
परहेज़
माँस, मदिरा, बैंगन, प्याज़-लहसुन (श्राद्ध भोजन में)

घर पर सरल तर्पण विधि

  1. सुबह स्नान करें और साफ़ वस्त्र पहनें — सफेद या पीले।
  2. पूर्व या दक्षिण दिशा में मुँह करके बैठें।
  3. तांबे के लोटे में जल, काले तिल, जौ और कुशा (या तुलसी) डालें।
  4. पितरों का नाम लेकर तीन बार जल अर्पित करें — 'अमुकनाम पितृ/मातृ तृप्यताम् इदं तिलोदकं ते'।
  5. ब्राह्मण को भोजन कराएं या ग़रीब को भोजन दान करें।
  6. गाय, कुत्ते और कौए को भी भोजन दें — ये पितरों के प्रतीक माने जाते हैं।

पितृ पक्ष में क्या करें

  • पितरों की याद में दान करें — अनाज, वस्त्र, जल।
  • घर में साफ़-सफाई रखें और तुलसी जलाएं।
  • परिवार में एकता बनाए रखें।
  • मंदिर जाएं और पितृ तर्पण करें।

पितृ पक्ष में क्या न करें

  • नई वस्तुएं न खरीदें — घर, वाहन, सोना (परंपरागत मान्यता)।
  • शुभ कार्य — विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यवसाय — न करें।
  • श्राद्ध भोजन में माँस, बैंगन, प्याज़-लहसुन न डालें।
  • झूठ, कलह और क्रोध से बचें।

श्राद्ध करने के लिए पुजारी की ज़रूरी नहीं — घर पर भी सरल तर्पण किया जा सकता है। गया, हरिद्वार और प्रयागराज में श्राद्ध विशेष फलदायी माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पितृ पक्ष 2024 में कब है?

पितृ पक्ष हर साल भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर अश्विन अमावस्या (महालया) तक 15 दिन होता है। यह सितंबर-अक्टूबर में आता है।

श्राद्ध में कौए को खाना क्यों देते हैं?

परंपरागत मान्यता है कि कौआ पितरों का प्रतीक है। कौए को भोजन देने से पितरों तक भोजन पहुँचता है।

क्या श्राद्ध घर पर हो सकता है?

हाँ, घर पर सरल तर्पण किया जा सकता है। तांबे के लोटे में जल, तिल और कुशा डालकर पितरों का नाम लेकर जल अर्पित करना ही तर्पण है।

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