ब्रह्मार्पणं — भोजन मंत्र अर्थ सहित
भोजन से पहले बोली जाने वाली यह प्रार्थना भगवद्गीता के दो श्लोकों से बनी है (4.24 और 15.14)। इसमें भोजन को एक यज्ञ की तरह देखा गया है — अर्पण, भोजन और खाने वाला, सब में परमात्मा है। दूसरे श्लोक में भगवान कहते हैं कि वे ही हमारे भीतर अग्नि बनकर भोजन पचाते हैं।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥
अर्थ
पद 1
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
अर्पण करने की क्रिया ब्रह्म है, अर्पित वस्तु ब्रह्म है, अग्नि ब्रह्म है और अर्पण करने वाला भी ब्रह्म है। जो हर कर्म में ब्रह्म को देखता है, वह ब्रह्म को ही पाता है।
पद 2
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥
भगवान कहते हैं: मैं ही सब प्राणियों के शरीर में वैश्वानर (पाचन की अग्नि) बनकर रहता हूँ और प्राण-अपान वायु के साथ मिलकर चारों प्रकार के भोजन को पचाता हूँ।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भोजन मंत्र कब बोलना चाहिए?
भोजन शुरू करने से पहले, थाली सामने रखकर, हाथ जोड़कर। कई स्कूलों और आश्रमों में सब मिलकर इसे बोलते हैं।
यह मंत्र किस ग्रंथ से है?
दोनों श्लोक भगवद्गीता के हैं — पहला अध्याय 4 का श्लोक 24 और दूसरा अध्याय 15 का श्लोक 14।
'चतुर्विधम्' यानी चार प्रकार का भोजन कौन-सा है?
परंपरागत व्याख्या में — चबाकर खाने वाला, निगलने वाला, चाटने वाला और चूसने वाला भोजन।