अध्याय 6 · आत्मसंयम योग · श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं

गीता अध्याय 6, श्लोक 5 — मन ही मित्र, मन ही शत्रु

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धु- रात्मैव रिपुरात्मनः॥

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet | ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ ||

अर्थ

मनुष्य को अपने द्वारा ही अपना उद्धार करना चाहिए, स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए; क्योंकि मन ही अपना मित्र है और मन ही अपना शत्रु।

शब्द-दर-शब्द

उद्धरेत्ऊपर उठाएआत्मनास्वयं सेआत्मानम्स्वयं कोन अवसादयेत्नीचे न गिराएआत्मा एवमन हीबन्धुःमित्ररिपुःशत्रु

आज के जीवन में

मोटिवेशन बाहर से नहीं आता। अपने मन को दोस्त बनाओ — छोटी आदतों से, रोज़।

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