अध्याय 3 · कर्म योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 3, श्लोक 16 — चक्र को चलाते रहो
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥
evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ | aghāyurindriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati ||
अर्थ
हे पार्थ, जो इस चलते हुए चक्र के अनुसार नहीं चलता, वह इंद्रियों में ही रमने वाला पापमय जीवन जीता है और व्यर्थ जीता है।