अध्याय 2 · सांख्य योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 2, श्लोक 55 — भीतर से संतुष्ट

श्रीभगवानुवाच। प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥

śrībhagavānuvāca | prajahāti yadā kāmānsarvānpārtha manogatān | ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate ||

अर्थ

श्रीकृष्ण बोले: हे पार्थ, जब व्यक्ति मन की सभी कामनाओं को छोड़ देता है और अपने आप में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।

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