अध्याय 2 · सांख्य योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 2, श्लोक 50 — योग: कर्मसु कौशलम्
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥
buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte | tasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam ||
अर्थ
समबुद्धि वाला व्यक्ति यहीं पुण्य और पाप दोनों से ऊपर उठ जाता है। इसलिए योग में लग जाओ; कर्म में कुशलता ही योग है।
आज के जीवन में
आपका काम जो भी हो, उसे सावधानी और ईमानदारी से, बिना स्वार्थी चिंता के करना ही अपने आप में साधना है।