अध्याय 18 · मोक्षसंन्यास योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 18, श्लोक 21 — राजसी ज्ञान

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥

pṛthaktvena tu yajjñānaṃ nānābhāvānpṛthagvidhān | vetti sarveṣu bhūteṣu tajjñānaṃ viddhi rājasam ||

अर्थ

जिस ज्ञान से मनुष्य सब प्राणियों में अलग-अलग तरह के अलग-अलग भाव ही देखता है, उस ज्ञान को राजसी जानो।

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