अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभाग योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 17, श्लोक 25 — तत् — बिना फल की चाह

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥

tadityanabhisandhāya phalaṃ yajñatapaḥkriyāḥ | dānakriyāśca vividhāḥ kriyante mokṣakāṅkṣibhiḥ ||

अर्थ

'तत्' कहकर, फल की इच्छा छोड़कर, मुक्ति चाहने वाले लोग तरह-तरह के यज्ञ, तप और दान के काम करते हैं।

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