अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभाग योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 17, श्लोक 20 — सात्त्विक दान
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
dātavyamiti yaddānaṃ dīyate'nupakāriṇe | deśe kāle ca pātre ca taddānaṃ sāttvikaṃ smṛtam ||
अर्थ
'दान देना कर्तव्य है' — इस भाव से जो दान सही स्थान, सही समय पर योग्य व्यक्ति को दिया जाए, जिससे बदले में कुछ पाने की आशा न हो, वह सात्त्विक दान है।
आज के जीवन में
ऐसे व्यक्ति की मदद करें जो बदले में कुछ लौटा न सके, और उसका ढिंढोरा न पीटें — यही सच्चा दान है।