अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभाग योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 16, श्लोक 16 — मोह का जाल

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥

anekacittavibhrāntā mohajālasamāvṛtāḥ | prasaktāḥ kāmabhogeṣu patanti narake'śucau ||

अर्थ

अनेक विचारों से भटके, मोह के जाल में फँसे और भोगों में डूबे हुए ये लोग घोर नरक में गिरते हैं।

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