अध्याय 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 13, श्लोक 17 — सबमें अविभाजित
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥
avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktamiva ca sthitam | bhūtabhartṛ ca tajjñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca ||
अर्थ
वह अविभाजित होते हुए भी प्राणियों में बँटा हुआ-सा दिखता है। उसे सब प्राणियों का पालन करने वाला, उनका संहार करने वाला और फिर से उन्हें रचने वाला जानो।