अध्याय 11 · विश्वरूपदर्शन योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 11, श्लोक 49 — डरो मत
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्। व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥
mā te vyathā mā ca vimūḍhabhāvo dṛṣṭvā rūpaṃ ghoramīdṛṅmamedam | vyapetabhīḥ prītamanāḥ punastvaṃ tadeva me rūpamidaṃ prapaśya ||
अर्थ
मेरे इस भयानक रूप को देखकर तुम न डरो और न घबराओ। भय छोड़कर, प्रसन्न मन से फिर से मेरा वही रूप देखो।
आज के जीवन में
जब जीवन अपना डरावना रूप दिखाए, तब भी भक्त भरोसा रखते हैं कि ईश्वर का करुणा भरा रूप सदा पास है।