अध्याय 11 · विश्वरूपदर्शन योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 11, श्लोक 32 — मैं काल हूँ
श्रीभगवानुवाच। कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
śrībhagavānuvāca | kālo'smi lokakṣayakṛtpravṛddho lokānsamāhartumiha pravṛttaḥ | ṛte'pi tvāṃ na bhaviṣyanti sarve ye'vasthitāḥ pratyanīkeṣu yodhāḥ ||
अर्थ
श्रीकृष्ण ने कहा: मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इन लोगों का अंत करने आया हूँ। तुम्हारे बिना भी विरोधी सेनाओं में खड़े ये योद्धा नहीं बचेंगे।
आज के जीवन में
काल हर व्यक्ति से बड़ा है; यह समझ हमें घमंड से और उन बातों के डर से मुक्त कर सकती है जिन पर हमारा वश नहीं।