अध्याय 11 · विश्वरूपदर्शन योग · अर्जुन कहते हैं
गीता अध्याय 11, श्लोक 30 — लोकों को निगलते हुए
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्- लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः। तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥
lelihyase grasamānaḥ samantāl- lokānsamagrānvadanairjvaladbhiḥ | tejobhirāpūrya jagatsamagraṃ bhāsastavogrāḥ pratapanti viṣṇo ||
अर्थ
अपने जलते मुखों से आप सब ओर से सारे लोकों को निगलते हुए होंठ चाट रहे हैं। हे विष्णु, आपकी उग्र किरणें पूरे जगत को तेज से भरकर तपा रही हैं।